देखो, ओ दीवानों तुम ये काम न करो

सफ़दर शामी

कोरोना की जंग के ‘विश्वासघाती’

आज एक विनाशकारी महामारी ने दुनिया की रफ्तार रोक दी है। आकाश की बुलंदियों पर उड़ने वाला इंसान धरती पर चलने से भी महरूम है। आस्थाएं, प्राथमिकताएं, जीवन शैली सब कुछ बदल कर रख दिया है। इस विश्वव्यापी महामारी ने क़ुदरत की शक्ति और मनुष्य की बेबसी का शिद्दत से एहसास करा दिया है। इसने दुनिया के सारे उद्योग, कारोबार, यातायात ही बंद नहीं किए, धार्मिक स्थल भी बंद कर दिए।

धर्म स्थलों में मस्जिदों का बंद किया जाना मुस्लिम समाज में निरंतर चर्चा का विषय रहा। कुछ लोगों ने कहा कि इस कठिन समय में इबादतगाहों को बंद करने की बजाय उसमें जा कर इबादत और दुआ करनी चाहिए। किसी को शरीअत के ख़िलाफ़ भी लगा। ये सब अज्ञानता और भावुकता की बातें थीं। जिनकी पवित्र किताब क़ुरआन की अवतरित होने वाली पहली आयत का पहला शब्द ही है ‘इक़रा’ यानि पढ़ो और जिस की मशहूर हदीस में पैग़म्बर साहब ने कहा था कि ‘ज्ञान अर्जित करने के लिए चीन भी जाना पड़े तो जाओ’ उस क़ौम में बिना पढ़े और समझे धर्म का पालन किया जाए तो ग़लत छवि संभावित है ही।

हिंदुस्तान, पाकिस्तान और सऊदी अरब के अधिकतर उलेमाओं ने मस्जिदों का बंद करना वक्त की ज़रूरत बताया और घरों में ही नमाज़ अदा करने पर ज़ोर दिया है। मुसलमानों की आस्था के सबसे बड़े केंद्र मक्का-मदीना जाने पर और उमरा पर पाबंदी है तो इससे परिस्थिति की गंभीरता को समझ जाना चाहिए। आस्था के साथ अक्ल शर्त है। अक्ल के बग़ैर आस्था गुमराही और अंधविश्वास है और अक्ल का तक़ाज़ा यही है कि मस्जिद में इकट्ठा होकर कोरोना को फैलाने के गुनहगार न बनें। अगर हमारी कोई नेकी किसी के लिए जान का ख़तरा बने तो वो नेकी भी गुनाह से कम नहीं। डॉ. इक़बाल ने कहा था…

नाहक़ के लिए उठे तो शम्सीर भी फ़ितना//
शम्सीर ही क्या नार ए तकबीर भी फ़ितना//

कहीं एक जगह जमा होना, बीमारी और बीमारों को छुपाना मौजूदा परिस्थितियों में सामाजिक अपराध तो है ही, अपनी और दूसरों की जान को ख़तरे में डालना भी है। क़ुरआन के अनुसार दोनों बड़े गुनाह है। इंसान की अपनी जान अल्लाह की अमानत है और क़ुरआन कहता है… “अल्लाह के साथ अमानत में ख़यानत करना बड़ा गुनाह ह” इसी तरह जानते, समझते हुए भी किसी की जान के लिए ख़तरा पैदा करना और भी बड़ा पाप है। क़ुरआन कहता है… “जिस ने एक बेगुनाह की जान ली मानो उसने पूरी इंसानियत की जान ली।”

इंदौर में स्वास्थ्य विभाग की टीम के साथ बदसुलूकी की ख़बर निसंदेह दुखद है। ये वो लोग हैं जो अपना आराम त्याग कर और जोखिम उठा कर हमारी सेवा में लगे हैं। वे सहयोग ही नहीं, सम्मान के अधिकारी भी हैं। उनकी दृष्टि धर्म, जाति, छोटे, बड़े को नहीं देखती बल्कि दो ही वर्ग देखती है, स्वस्थ और संक्रमित। उनके इस कार्य में सहयोग करना नागरिकों की राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी भी है और नैतिक ज़िम्मेदारी भी।

राजनीति और मीडिया की गलबहियों के इस दौर में अपनी छवि को बनाने और बचाने की ज़िम्मेदारी आपकी अपनी ही है। बाद में औरों को ‌ज़िम्मेदार ठहरा कर कुछ नहीं होना है।

बहरहाल पूरी इंसानियत पर आए इस महा संकट से सब को मिल कर निपटना है। ये अंतरराष्ट्रीय नागरिकता वाला वायरस धर्म, जाति, अमीर, ग़रीब, राजा, प्रजा किसी में भेदभाव नहीं करता। हमें भी बिना भेदभाव के इस महामारी से मुक़ाबला करना है। ये मुसलमान की लापरवाही से भी फैल सकता है और हिंदू मज़दूरों की घरों की तरफ़ जाती हुई मजबूर भीड़ से भी।

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