कबाड़ के भाव बेची गयीं संविधान को पहली बार छापने वाली मशीनें

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। एक दिन बाद गणराज्य के तौर पर भारत और उसका संविधान, दोनों को 70 साल के हो जाएंगे। इन सालों में बहुत कुछ बदला है और बना है लेकिन हमारे देश की एक ख़ास बात है कि हमें अपनी पुरानी धरोहरों से खासा लगाव है। होनी भी चाहिए और तब तो और जब उन मशीनों से हमारे संविधान की पहली प्रतियां छपी हों।

दरअसल चौंकाने वाली बात यह है कि दो लिथोग्राफ मशीनें, जिनका इस्तेमाल प्रिंटिंग के लिए हुआ था, अब कबाड़ के भाव बेच दी गई हैं। ये मशीनें करीब डेढ़ लाख रुपये में बिकी हैं। सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारियों के मुताबिक, संविधान को छापने के लिए जिन लिथोग्रैफिक प्लेट्स का इस्तेमाल हुआ था, उन्हें पहले ही नीलाम किया जा चुका है।

ऐसे में यह कम लोगों को ही पता होगा कि भारतीय संविधान की शुरुआती एक हजार प्रतियों का प्रकाशन देहरादून के सर्वे ऑफ इंडिया ने कराया था और इसकी एक प्रति अभी भी उसके पास सुरक्षित है। बाकी सभी प्रतियां छपने के बाद दिल्ली भेज दी गई थीं।

सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारियों ने बताया कि दोनों मशीनों को खोलकर पिछले साल स्क्रैप डीलर को करीब डेढ़ लाख रु. में बेच दिया। सॉव्रिन और मोनार्क नाम की इन दोनों प्रिंटिंग मशीन के मॉडल का निर्माण क्रैबट्री कंपनी ने किया था।

26 नवंबर 1949 इस दिन को संविधान दिवस के तौर पर मनाया जाता है क्योंकि इस दिन संविधान को अपनाया गया था। जब संविधान बनकर तैयार हो गया तो सबके सामने ये प्रश्न था कि इसे लिखा कैसे जाए। तब पंडित नेहरू पहुंचे प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा के पास जहां संविधान की पहली कॉपी हाथ से लिखी गई।

इसे अपने हाथों से अंग्रेजी में लिखा प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ने तथा हिंदी कॉपी लिखी थी वसंत कृष्ण वैद्य ने। खूबसूरत कैलिग्राफी के लिए प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ने एक भी पैसा मेहनताना में नहीं लिया था। शांतिनिकेतन के प्रोफ़ेसर नंदलाल बोस और उनके स्टूडेंट्स ने संविधान की कॉपी पर तस्वीरें उकेरी। और इस तरह संविधान की पहली कॉपी तैयार की गयी।

दो हस्तलिखित प्रतियों से संविधान की एक हजार कॉपियां छापी गई थीं। सर्वे ऑफ़ इंडिया की स्थापना ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1767 में की थी। ये संस्था सर्वे और नक्शे से संबंधित काम करती है।

सॉव्रिन और मोनार्क नामक इन दोनों प्रिंटिंग मशीन के मॉडल का निर्माण क्रैबट्री कंपनी ने किया था। करीब सौ साल तक सर्वे ऑफ इंडिया के छापेखाने में मौजूद रहीं दोनों मशीनें अब अपनी जगहों पर नहीं हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि जिन दो मशीनों से पहली बार देश का संविधान छापे गए थे, उन्हें बेचने की जरूरत क्यों पड़ी। सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) गिरीश कुमार इसका जवाब देते हुए कहते हैं कि लिथोग्रैफिक मशीनें अब आउटडेटेड हो चुकी हैं और इनका रखरखाव भी काफी महंगा है। उन्होंने कहा कि आज के दौर आप इन मशीनों का इस्तेमाल प्रिंटिंग के लिए नहीं कर सकते हैं क्योंकि यह बहुत महंगा पड़ता है।

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