कई बीमारियों को दूर भगाए आयुर्वेद का ‘विरुद्ध आहार’

स्वास्थ्य

एक साथ खाने पर कुछ खाद्य पदार्थ ऐसे विषाक्त पदार्थ शरीर में पैदा करते हैं जिनका तुरंत असर एसिडिटी या गैस या सिरदर्द के रूप में दिखाई देता है। निरंतर ऐसे भोज्य पदार्थ खाने के दूरगामी परिणाम घातक हो सकते हैं। अब एसिडिटी गैस सिरदर्द तो आजकल लोगों को रोग ही नहीं लगते।

– गरिमा जोशी पंत, स्वतंत्र लेखिका

हमें बचपन में दूध और पपीता एक साथ कभी खाने नहीं दिया गया। हमारी नानी कहती थी, यह ज़हर होता है। तो हम कुछ डर से तो कुछ नानी की आज्ञा पालन के चलते इसे नहीं खाते थे। ऐसी कई चीज़ें थी जैसे दूध और नमक, दूध और दही, करेला और दही, सोयाबीन के साथ मीठा, या दूध दही ,भोजन के साथ फल आदि। फल खाने का समय अलग ही था। स्कूल में होने के कारण प्रायः यह समय सायंकाल का होता था किन्तु सूरज ढलने से पहले।

जब हम बड़े हुए तो जाना कि जूस की दुकानों में धड़ल्ले से पपीता शेक मिलता था जो कि पपीते एवं दूध से ही बनता था और लोग उतने ही धड़ल्ले से उसे पीते भी थे। और पता नहीं कैसा ज़हर था कि लोग मरना तो दूर उससे मूर्छित तक न होते थे। सफेद ग्रेवी की सब्जियों में दूध हमेशा ही दही या नमक के साथ प्रयुक्त होता। भोजन के साथ फ्रूट सलाद खाया जाता और सब भले चंगे रहते हैं।

 

हमें बचपन में दूध और पपीता एक साथ कभी खाने नहीं दिया गया। जब हम बड़े हुए तो जाना कि जूस की दुकानों में धड़ल्ले से पपीता शेक मिलता है जो कि पपीते एवं दूध से ही बनता है।

 

बड़े बूढ़े तो बड़ी विद्वता का परिचय देते हुए, आयुर्वेद का हवाला देते हुए इन्हें विरुद्ध आहार की श्रेणी में रखते आए थे तो क्या उनका यह ज्ञान खोखला था या स्वयं आयुर्वेद ही एक खोखला विज्ञान है बल्कि यूं कहें कि वह कोई विज्ञान ही नहीं। क्यूं आयुर्वेद इतना प्रचलित नहीं जबकि उसे प्राचीन और सम्पूर्ण चिकित्सा प्रणाली का दर्जा प्राप्त था?

इसका उत्तर मुझे तब मिला जब एक पारिवारिक मित्र जो कि बड़ी कम उम्र से उच्च रक्तचाप व हृदय रोग से जूझ रहे थे आयुर्वेद की शरण में चले गए। लाभ होने लगा। कुछ दिन पश्चात मिले तो हमने हाल चाल पूछा। बातों से पता चला कि वे आयुर्वेद छोड़ अब फिर से किसी एलोपैथी के जाने माने हृदय विशेषज्ञ की शरण में चले गए हैं। बोले बड़ा मुश्किल है आयुर्वेद। ये ना खाओ, वो ना पिओ। रात को ना खाओ, इसके साथ ये खाओ , वो ना कहो। वात है, पित्त है। तला भुना सब बंद करा दिया। रोज़ सैर पर जाने की सलाह। आचार पापड़ भी न खा सकते। अब ये तो हमें भी पता है कि परहेज़ करने से तो बहुत से रोग ठीक हो जाएंगे। फिर उनकी दवा किस काम की। हमने पूछा कि सैर, और परहेज़ तो एलोपैथी के डॉक्टर भी बताते हैं। बोले जी हां पर उनकी दवा बड़ी कारगर होती है। खाते पीते रहो और दवा खाते रहो , सब कंट्रोल में रहता है। एंटेसिड तो हमेशा मेरी जेब में ही रहती है। उस दिन पता चला कि विरुद्ध आहार क्या है, क्यूं कुछ चीज़ों को एक साथ खाना विष तुल्य माना जाता है। और क्यूं आयुर्वेद के इस सिद्धांत की अवहेलना होने लगी।

दरअसल एक साथ खाने पर कुछ खाद्य पदार्थ ऐसे विषाक्त पदार्थ शरीर में पैदा करते हैं जिनका तुरंत असर एसिडिटी या गैस या सिरदर्द के रूप में दिखाई देता है पर निरंतर ऐसे भोज्य पदार्थ खाने के दूरगामी परिणाम घातक हो सकते हैं। अब एसिडिटी गैस सिरदर्द तो आजकल लोगों को रोग ही नहीं लगते क्योंकि उसके लिए गोली फांक कर उन्हें कुछ मिनटों में ही उनसे निजात पा जाना आसान हो गया है। हम अब रोग का निदान चाहने लगे हैं, जीवन शैली, भोजन शैली में परहेज़ करके रोग मुक्त नहीं रहना चाहते। इसलिए आयुर्वेद, विरुद्ध आहार का ज्ञान, बड़ों की सीख को दरनिकार कर एक गोली गटक के तुरंत राहत पा जाना हमें अधिक आसान लगने लगा है। पर इन आसान राहों पर चलते हुए हम भूल रहे हैं कि हम रास्तों को और जटिल कर रहे है और कई अद्भुत महत्त्वपूर्ण ज्ञान कोष और उनके रखवाले पटरी से उतर किसी गर्त में समाने की कगार पर हैं। इन अभूतपूर्व प्राचीन खजानों को बचाने हेतु एक हाथ बढ़ाना तो लाज़मी है। है ना?

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