मुस्लिम बेटा बनेगा मठ का मुख्य पुजारी, पिता ने दान की थी जमीन

बेंगलुरू

एक मुस्लिम शख्स के कर्नाटक के प्रसिद्ध मठ के महंत बनने का रास्ता साफ हो गया है। 33 साल के दीवान शरीफ मुल्ला कर्नाटक के गडाग स्थित मुरुगा राजेंद्र मठ के महंत होंगे। उनको मठ के पीठाधीश्वर मुरुगजेंद्र कोरानेश्वर स्वामी ने नियुक्त किया है। इस सिलसिले में शरीफ ने कहा कि मुझे ऐसा करने के लिए किसी ने नहीं कहा। ईश्वर की प्रेरणा और मार्गदर्शन से ऐसा हुआ है। मुरुगजेंद्र कोरानेश्वर स्वामी ने कहा कि आप किस जाति के हैं, ये कोई मायने नहीं रखता। यदि ईश्वर ने आपको सद्भावना और त्याग के रास्ते पर भेजा है तो मनुष्यों द्वारा बनाए गए धर्म, जाति के बंधन बेमानी हो जाते हैं। फिर आप इन सबके बावजूद ईश्वर के बताए रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं।

उत्तरी कर्नाटक के गडग जिले में स्थित एक लिंगायत मठ ने परंपराओं को तोड़ते हुए एक मुस्लिम युवक को अपना मुख्य पुजारी बनाने का फैसला लिया है। इस पद पर 33 साल के दीवान शरीफ रहिमनसाब मुल्ला की तैनाती 26 फरवरी को होगी। मुल्ला ने कहा कि वह बचपन से ही 12वीं सदी के सुधारक बासवान्ना से प्रभावित हैं और सामाजिक न्याय और सद्भाव के उनके आदर्शों की दिशा में काम करेंगे।

बता दें कि शरीफ के पिता ने सालों पहले मठ के लिए दो एकड़ जमीन दान में दी थी। यह मठ कलबुर्गी के खजूरी गांव में स्थित 350 साल पुराने कुरानेश्वर संस्थान के मठ से जुड़ा हुआ है। चित्रदुर्ग के जगद्गुरु मुरुगराजेंद्र के 361 मठों में यह मठ शामिल है। जिसके देश के अन्य हिस्सों के अलावा कर्नाटक और महाराष्ट्र में लाखों अनुयायी हैं।

‘बासवा का दर्शन सार्वभौमिक है : खजूरी मठ के मुख्य पुजारी मुरुगराजेंद्र कोरानेश्वर शिवयोगी ने कहा, ‘बासवा का दर्शन सार्वभौमिक है और हम अनुयायियों को जाति और धर्म की विभिन्नता के बावजूद गले लगाते हैं। उन्होंने 12वीं सदी में सामाजिक न्याय और सद्भाव का सपना देखा था और उनकी शिक्षा का पालन करते हुए हमने सभी के लिए मठ के दरवाजे खोल दिए हैं।’ आसुति में शिवयोगी के प्रवचनों से प्रभावित होकर शरीफ के स्वर्गवासी पिता रहीमनसाब मुल्ला मे गांव में अपनी दो एकड़ जमीन मठ को दान में दी थी।

आसुति मठ 2-3 सालों से काम कर रहा है ।

शिवयोगी ने कहा कि आसुति मठ 2-3 सालों से काम कर रहा है और वहां पर निर्माण कार्य जारी है। मुख्य पुजारी ने कहा, ‘शरीफ बसवा के दर्शन के प्रति समर्पित है और तप करके अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनके पिता भी बहुत बड़े अनुयायी थे और उन्हेोंने हमसे लिंग दीक्षा ली थी। शरीफ ने 10 नवंबर, 2019 को हमसे दीक्षा ली। हमने उन्हें पिछले तीन वर्षों में लिंगायत धर्म और बासवन्ना की शिक्षाओं के विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षित किया है।’

बचपन से ही शिक्षाओं के प्रति आकर्षित थे।

शरीफ का कहना है कि वह बचपन से ही बासवा की शिक्षाओं के प्रति आकर्षित थे। उन्होंने कहा, ‘मैं पड़ोस के मेनासेंगी गांव में आटा चक्की चलाता था और खाली समय में बासवन्ना और 12वीं सदी के साधुओं द्वारा लिखे गए प्रवचनों को करता था। मुरुगराजेंद्र स्वामीजी ने मेरी इस छोटी सी सेवा को पहचाना और मुझे अपने साथ ले लिया। मैं बासवन्ना और अपने गुरु के रास्ते पर आगे बढ़ूंगा।’ शरीफ शादीशुदा हैं और तीन बेटियां और एक बेटा है।

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