तिरपाल के नीचे हुआ नानूराम का अंतिम संस्कार, दलितों की पीड़ा कौन समझे

विनोद शर्मा | इंदौर

श्मशान को तरसे बजरंगपुरा में लकड़ी-कंडे गिले हुए तो टायर-प्लास्टिक-घासलेट से हुआ दाहसंस्कार

लगातार हो रही रिमझिम बरसात…। ‘राम नाम सत्य है’ की आवाज…। कंधे पर 95वें वर्षीय नानूराम चौहान की अर्थी…। श्मशान के नाम पर खुला जंगल…। जहां पहुंचते ही कंधे से शव को नीचे उतारकर रख दिया…। पहले झाड़ियां काटी…। जगह बनाई…। लकड़ी-कंडे जमाए…। तिरपाल के दो टूकड़ों को आठ लोगों ने छप्पर की तरह तान दिया…। ताकि लकड़ी-कंडे गिले न हो…। इसके बाद लकड़ी पर रखकर शवदाह किया…। तमाम प्रयासों के बावजूद जब नमी के कारण लकड़ी ने आग नहीं पकड़ी तो कोई घासलेट डालता रहा…। कोई पीसी हुई कपूर..। प्लास्टिक बिनकर डाली गई..। कभी पंक्चर की दुकान पर लटके टायर…। जब तक लकड़ियों ने ठीक से आग नहीं पकड़ी, कुछ लोग छप्पर ताने खड़े रहे।

यह दृष्य किसी दूर-देहात का नहीं है…। पीथमपुर चौपाटी से लगे महू तहसील के गांव बजरंगपुरा का है। महू से विधायक उषा ठाकुर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं। जहां लगातार संघर्ष के बावजूद सरकार एक श्मशान की व्यवस्था नहीं कर सकी। इसी का नतीजा है कि 74वां स्वतंत्रता दिवस मना चुके इंदौर जैसे गरीबों और दलितों को मौत के बाद हर बार ही खुली जमीन देखकर जला दिया जाता है। रविवार को भी यही हुआ। जब बरसात बंद होने के इंतजार में 48 घंटे तक घर में ही रखे रहे नानूराम के श्व को अंतिम संस्कार के लिए जंगल में लाया गया। बरसात के बीच शवदाह आसान नहीं था। मुक्तिधाम के लिए चिह्नित की गई जमीन तक पहुंचने के लिए भी कीचड़ में उतरना पड़ा। फावड़े से जंगली घास हटाकर लकड़ी-कंडे जमाने की जगह करना पड़ी। तब तक कुछ लोग शव को जमीन पर रखकर पास में बैठे रहे ताकि कुत्ते झपट्‌टा न मार जाएं।

529 दिन में भी अधूरा, 8 दिन में निराकरण का वादा

3 मार्च 2019 को बलाई समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज परमार और प्रदेश महिला विंग अध्यक्ष लता मालवीय के नेतृत्व में ग्रामीणों ने विधायक उषा ठाकुर को ज्ञापन सौंपकर श्मशान की मांग की थी। बताया भी गया था कि बरसात के दौरान किस तरह खुले में शव को जलाना पड़ता है। विधायक ने आठ दिन में समस्या के हल का आश्वासन दिया था। अब तक कुछ नहीं हुआ।

3 लाख मंजूर, श्मशान दूर

लगातार की जा रही मांग के बावजूद 2 साल पहले पंचायत में 3 लाख रुपए सरकार ने आवंटित किए थे। राशि आवंटन में पूर्व कलेक्टर और पूर्व एसडीएम की भूमिका अहम रही। हालांकि इसके बाद भी श्मशान तैयार होना तो दूर, काम तक शुरू नहीं हुआ। लोगों को अभी भी इसका इंतजार है।

मरने के बाद भी दुखी दलित

बलाई समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज परमार ने बताया कि आजादी के 74 साल बाद भी गांव में श्मशान नहीं बन सका। सरकारी जमीनें कब्जा हो रही है। सामाजिक तिरस्कार झेलकर जिंदगी काटने वाले दलितों की आत्मा भी इस तरह का शवदाह देखकर तड़प उठती है। गांव में 100 से अधिक परिवार रहते हैं। सभी दलित है, शायद इसीलिए साहब लोग उनके मुक्तिधाम में रुचि नहीं लेते।

 

admin