इंदौर का नर्मदा आन्दोलन,जिसमें न पुतले फूंके,न पथराव हुआ,न गोली चली

कीर्ति राणा।

5 जुलाई से 23 अगस्त 1970 तक 49 दिनी आंदोलन के बाद नर्मदा योजना मंजूर करने की घोषणा हुई थी। 50 वर्ष हो गए इस आंदोलन को, यह कैसे सफल हुआ पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा की रिपोर्ट-

जिस तरह राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या कर गंगा नदी को पृथ्वी पर आने के लिए राजी किया था। कुछ उसी तरह छह लाख की आबादी वाले शहर इंदौर और महू की एकजुटता से 49 दिन चले गांधीवादी आंदोलन के तप के सम्मुख राज्य सरकार को झुकना पड़ा था। इंदौर में आंदोलन तो बहुत हुए और होते भी रहेंगे लेकिन नर्मदा को इंदौर लाने का यह आंदोलन ऐसा था जिसमें न पुतले फूंके, पथराव हुआ न गोली चली लेकिन इस गांधीवादी आंदोलन की एकजुटता के आगे सरकार को झुकना ही पड़ा।
शहर की 50 वर्ष से कम उम्र वाली पीढ़ी को तो इस बात का अंदाज ही नहीं है कि आज उन्हें आसानी से पीने का जो पानी मिल रहा है उसके लिए 1970 के दौरान कितना संघर्ष करना पड़ा था। 5 जुलाई से 23 अगस्त 1970 तक 49 दिनी आंदोलन के बाद जब नर्मदा योजना मंजूर करने की घोषणा हुई तो आंदोलन की सफलता का श्रेय देने की अपेक्षा अन्य जिलों के लोग यह कहने से भी नहीं चूके थे कि मुख्यमंत्री ने दामाद वाली उदारता दिखा कर इंदौर की मांग मंजूर कर ली। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल का विवाह वैद्य ख्यालीराम द्विवेदी की पुत्री पद्मिनी से हुआ था इस वजह से एससी शुक्ल को इंदौर का दामाद भी कहा जाता था।

जिस नर्मदा के पानी से महू, इंदौर (नर्मदा-क्षिप्रा लिंक योजना के बाद) उज्जैन तक के गांवों की प्यास बुझरही है, उस नर्मदा को जलूद से इंदौर तक लाना भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं रहा। इस 70 किमी के मार्ग में एक तरह से पहाड़ों को मोटे पाइपों से बांध कर वॉटर सप्लाय का काम आसान किया गया।जलूद से इंदौर के बीच विंध्याचल के पर्वतों की जो श्रृंखला है उन पर से इन पाइपों को लाया गया है। इंदौर के लिए नर्मदा योजना की मंजूरी जन आंदोलन की सफलता के साथ इंदौर के तत्कालीन सांसद (जो केंद्र में मंत्री, मप्र के सीएम भी रहे) प्रकाशचंद्र सेठी का इंदौर के मतदाताओं से किए वादे को पूरा करने का प्रमाण भी है।यही वजह है कि आंदोलन समिति से जुड़े सदस्य जितना श्रेय एससी शुक्ला को देते हैं उतना ही पीसी सेठी और शुक्ल मंत्रिमंडल में इंदौर का प्रतिनिधित्व करने वाले कृषि मंत्री (स्व) भागवत साबू को भी देते हैं। साबू ने सरकार तक इंदौर की जनभावना पहुंचाने के लिए सेतु का काम करने के साथ ही शुक्ल का मंजूरी देने के लिए मानस भी बनाया।

50 साल पहले ही बापना ने कहा था नर्मदा से ही आएगी इंदौर में समृद्धि

इन्दौर नगर के विकास की अनेक कठिनाइयों में सबसे प्रमुख कठिनाई पर्याप्त मात्रा में पानी का नहीं होना है। मालवा के पठार में भूमि के अन्तर्गत जल स्त्रोत बहुत कम है। जो नदियां हैं वे भी अधिक বিश्वसनीय नहीं हैं । जब जब इस क्षेत्र में वर्षा का अभाव हुआ है तब तब मालवा की नदियां पानी की दृष्टि से निर्रथक हो जाती हैं ।इस क्षेत्र के आसपास जो दो बड़ी नदियां है उनमें एक है नर्मदा और दूसरी चंबल ।चंबल राजस्थान के निकट जाकर व्यापक रूप ले लेती है और नर्मदा निमाड़ ओर ओंकारेश्वर के निकट अपने विशाल दर्शन प्रदान करती है ।इंदौर शहर के जल प्रदाय के लिये सन् 1916-17में बिलावली तालाब का निर्माण किया गया था किंतु कुछ ही वर्षो में वह अपर्याप्त होने तगा।अत: सन् 1929-30 में गंम्भीर नदी पर बांध बनाकर যशवन्त सागर की योजना बनाई गई. जिससे शहर को सन् 1938 से पानी मिलने लगा ।

इस योजना का लक्ष्य यह था कि शहर की व्यवस्था 1.50 लाख हो तब तक 40 गैलन प्रति व्यक्ति, प्रति दिन के हिसाब से पानी मिलता रहे इस योजना के बाद जैसा कि अनुमव सिद्ध है शहर का विकास और तेजी से होने लगा व यहां की आबादी 1961 की जनगणना में 3.93 लाख हो गई । इस आबादी के लिये पानी का यह स्त्रोत जो करीब 20 वर्ष तक करीब करीब पर्याप्त था कम महसुस होने लगा और धीरे धीरे यहां के नागरिकों को पानी के लिए भयंकर कठिनाई का सामना करना पड़ा। सन् 1965-66 और ‘67 में लगातार वर्षा की कमी के परिणामस्वरूप जल संकट व्यापक रूप से बढता गया। शासन ने समय समय पर पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से वर्तमान जल यंत्रालय को विकसित करने के प्रयास किये किन्तु उन सब प्रयासों के पश्चात एक सत्य सबने स्वीकार किया कि ‘जब तक इन्दौर के लिये यशवन्त सागर के अलावा एक और स्थायी स्त्रोत और नहीं खोज लेते तब तक जल समस्या का हल नहीं किया जा सकता ।

तृतीय पंचर्षीय योजना काल से शासन द्वारा कई योजनाओं का सर्वेक्षण किया गया। इन सब योजनाओं में तीन योजनाओं पर विचार-विमर्श प्रारंभ हुए । एक तो यह योजना थी जो मौजूदा यशवंत सांगर योजना का ही एक अंग था।शहर की आबादी डेढ़ लाख से ज्यादा होने पर यशवंत सागर के ऊपर कलारिया गांव में एक और बांध बनाकर य 60-70 लाख गेलन पानी प्रतिदिन और दिया जा सके, इसकी व्यवस्था रखी गई थी। यह थी कलारिया योजना। दूसरी योजना इन्दौर से लगभग 25 किमी दूरी पर चम्बल नदी पर बांध का निर्माण कर करीब 150 लाख गैलन पानी प्रतिदिन इन्दौर शहर को प्रदाय करने की योजना थी। तीसरी योजना नर्मदा नदी से इन्दौर के लिए १५० लाख गैलन पानी प्रतिदिन लाने की थी। इन योजनाओं के बारे में राज्य शासन में व इन्दौर के नागरिकों में शुरुआत में काफी मतभेद रहे। कलारिया के पक्ष के लोगों का मत था कि इस योजना से दूसरी दोनों योजनाओं की तुलना में पानी आधे से भी कम मिलेगा तब भी यह कम खर्चीली होगी व जल्द कार्यान्वित हो जाने से इन्दौर शहर को शीघ्र राहत मिल सकेगी।

अभ्यास मंडल के तत्वाधान में बनाई गई थी 14 सदस्यीय समिति

नर्मदा लाओ आंदोलन 49 दिन चला था।पत्रकार कमलेश पारे के मुताबिक युवा बुद्धिजीवियों मुकुंद कुलकर्णी, सीपी शेखर, महेंद्र महाजन ने 14 लोगों की समिति बनाई इसमें महेश जोशी, सुभाष कर्णिक, पं कृपाशंकर शुक्ला, शशिकांत शुक्ल, विद्याधर शुक्ल, राकेश शर्मा, डॉ प्रकाश खराटे, उपेंद्र शुक्ल अप्पा, ओम प्रकाश साबू, कैलाश खंडेलवाल और शलभ शर्मा भी शामिल थे।

इंजीनियर आप्टे ने किया ‘जलूद’ का चयन

सुप्रसिद्ध इंजीनियर वीजी आप्टे ने एक माह से अधिक समय नर्मदा किनारे रह कर खोजबीन के बाद जलूद को हर तरह से उपयुक्तपाया जहां बीते सौ वर्षों में भी जलस्तर एक समान रहा था। यहां से पानी भी पर्याप्त मिलता रहेगा और खर्च भी कम लगेगा यह उन्हीं का आंकलन था। उनके जलूद चयन की ही तरह भाप्रसे के सेवानिवृत्त अधिकारी पीएस बाफना ने तकनीकी-वैज्ञानिक आधार पर एक ‘फीजिबिली’ और प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी बनाई। बाद में राज्य सरकार ने इन्हीं बाफना की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जिसने भविष्य की ‘सस्टेनेबिलिटी’ पर रिपोर्ट सौंपी थी।इनके साथ ही कामरेड होमी दाजी, राजेंद्र धारकर, सत्यभान सिंघल, कल्याण जैन, आदि विभिन्न दलों के नेता अपने राजनीतिक मतभेद भुलाकर आंदोलन के समर्थन में खड़े थे।

 

admin