बुजुर्गों को कचरा समझने की बजाए सहेज कर रखने की जरूरत

एक सर्वेक्षण के अनुसार देश के 60 वर्ष से अधिक आयु वाले 52 प्रतिशत बुजुर्ग पारिवारिक उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं। 63 फीसदी बुजुर्ग स्वयं इस बात को मानते हैं कि उनका अपना ही परिवार उन्हें बोझ मानता है। जब अपने ही इस अधिकार में बाधा बन जाएं तो समाज को यह समझना चाहिए कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

-सोनम लववंशी, स्वतंत्र लेखिका

किसी ने सच ही कहा है कि हम सब कुछ बदल सकते है, लेकिन अपने पूर्वज नहीं। उनके बिना न ही हमारा वर्तमान सुरक्षित है और न ही भविष्य की नींव रखी जा सकती है। हमारे पूर्वज ही इतिहास से भविष्य के बीच की कड़ी होते हैं। इन सबके बावजूद अफसोस की आज हम अपने पूर्वजों का सम्मान तक नहीं कर पा रहे हैं और न ही उनकी दी हुई सीख पर अमल कर पा रहे हैं। मातृ देवों भवः, पितृ देवों भवः से अपने जीवन का आरम्भ करने वाला मनुष्य इतना स्वार्थी हो जाएगा कि वह अपने पहले गुरु यानी मां और पिता को ही वृद्धावस्था में दरकिनार कर देगा। इसकी कल्पना तो किसी माँ-बाप ने नहीं की होगी।

 मध्यप्रदेश की औद्योगिक नगरी इंदौर में घटित एक घटना ने पूरी मानव जाति को शर्मसार कर दिया। चार बार स्वच्छता में नंबर वन आने वाले इंदौर नगर निगम ने शहर के बुजुर्गों को जानवरों की तरह ट्रक में भरकर शहर के बाहर फेंक दिया। ऐसे में समझ नहीं आता कि कहां गई वह संस्कृति जिसमें हमें बड़ों का सम्मान करने की शिक्षा दी जाती है। भारतीय परंपरा में तो पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, जानवरों यहां तक कि पत्थरों की भी पूजा करने का विधान बताया गया है। फिर आज हमारे समाज ने अपने ही बुजुर्गों को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए कैसे छोड़ दिया है। यहां चंद पंक्तियां याद आ रही हैं। जो रामधारी सिंह दिनकर की कृति “कुरुक्षेत्र” से ली गई हैं, जिसमें युधिष्ठिर भीष्म पितामह के पास जाते हैं हैं। फिर भीष्म पितामह कहते हैं कि “धर्मराज यह भूमि किसी की, नहीं क्रीत है दासी, हैं जन्मना समान परस्पर, इसके सभी निवासी। सबको मुक्त प्रकाश चाहिए, सबको मुक्त समीकरण, बाधारहित विकास, मुक्त आशंकाओं से जीवन।”

अब ऐसे में अगर इस धरती पर जन्म लेने वाले सभी व्यक्ति के पास समान अधिकार है। फ़िर कोई सरकार या सरकारी मुलाजिम कैसे किसी को सिर्फ़ इसलिए भगा सकता क्योंकि वह बुजुर्ग और भिखारी है। क्या हम सिर्फ़ बातों में ही संस्कृति के खेवनहार बचे हैं। एक तरफ़ तो समाज मे बच्चे बड़े होकर अपने माता-पिता को दर-दर भटकने के लिए छोड़ देते हैं। ऊपर से अगर शासन-प्रशासन भी ऐसा करने लगे तो फ़िर कहाँ जाएंगे बुजुर्ग। वैसे हम तो वसुधैव कुटुम्बकम की भावना रखने वाले देश के लोग हैं। फिर आधुनिकता की दौड़ में इतना अंधे कैसे हो रहे कि अपने संस्कारों को ही तिलांजलि देने पर तुले हैं। क्या यही आधुनिकता है, जिसमें अपनों का सम्मान करना ही भूल जाएं? हम तो विश्वगुरु बनने की राह में आगे बढ़ रहे हैं फिर कैसे अपने जीवन के प्रथम गुरु के साथ बदसलूकी पर उतर आए? ये सच है कि भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अपने लिए ही समय नही निकाल पाते हैं, तो फिर अपनों की जिम्मेदारियों का ख्याल कैसे रखें? लेकिन जिस मां- बाप ने जन्म दिया उसकी जिम्मेदारी से मुंह तो मोड़ नहीं सकते। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि जिस माँ ने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द सहन कर हमें इस दुनिया में जन्म दिया है। जिस पिता ने हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाया। जिसने हमें इस लायक बनाया कि हम सही गलत का फर्क समझ सकें। फिर जिस वक्त उन्हें हमारे सहारे की ज़रूरत है फिर हम कैसे मुकर सकते हैं?

एजेबल नामक एक गैर सरकारी संगठन के सर्वे में यह बात सामने आई है कि देश में हर चौथा बुजुर्ग आदमी अकेले रहने को मजबूर है। 2018 में किए गए सर्वेक्षण की मानें तो देश के 60 वर्ष से अधिक आयु वाले 52 प्रतिशत बुजुर्ग पारिवारिक उत्पीड़न का शिकार हो रहे हैं। 63 फीसदी बुजुर्ग स्वयं इस बात को मानते हैं कि उनका अपना ही परिवार उन्हें बोझ मानता है। हमारे संविधान का अनुच्छेद- 21 प्रत्येक मनुष्य को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है। जब अपने ही इस अधिकार में बाधा बन जाएं तो समाज को यह समझना चाहिए कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। वैसे हमारे समाज की यह बहुत बड़ी बिडम्बना है कि हम बेटों की चाहत में इतने अंधे हो जाते हैं कि बेटियों को वह प्यार ही नही दे पाते जिसकी वे असल हकदार होती हैं। आज भी हमारे समाज में पुरुषवादी मानसिकता भरी हुई है। हम आज भी बेटे को कुलदीपक मानते हैं, तो वहीं बेटियों को पराया धन। यही कुलदीपक अपने ही जन्मदाता को वृद्धा आश्रम छोड़ कर चले जाते हैं। हमारे समाज मे भेदभाव की जड़ें भी समाज को खोखला कर रही हैं। जहां बेटियों को तो अपना समझा जाता है लेकिन बहुओं को वह सम्मान नही दिया जाता है। लोग तो यह तक भूल जाते हैं कि आज जो हमारी बहू है वह किसी ओर की बेटी भी होगी। लेकिन यही दोहरी मानसिकता समाज में कलह की सबसे प्रमुख वजह बन जाती है।

आज न केवल समाज को जागरूक होने की आवश्यकता है बल्कि बुजुर्गों पर हो रहे अत्याचार पर सरकार को भी कड़े कानून बनाना चाहिए। जिससे हमारे बुजुर्ग भी सम्मानपूर्वक अपना जीवन जी सकें। हमें समझना होगा कि हमारे बुजुर्ग हमसे क्या कहना चाह रहे हैं। आज हमने उन्हें सुनने की बजाए अपनी सुनाना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि आज समाज मे आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।  आज हम पुरानी इमारतों को तो सहेजकर रखना चाहते हैं, वहीं हमारे घर के बुजुर्गों को बेसहारा आंसू बहाने के लिए छोड़ रहे हैं, जो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

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