नेहरू समझते थे कि असली ‘जय हिन्द’ का अर्थ क्या है

आनंद मोहन माथुर

लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा तिरंगा फहराना, भाषण देना और बच्चों के बीच में जाना यह परंपरा जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1948 को डाली।
15 अगस्त 1948 के भाषण में नेहरू ने कहा था कि हमने और आपने बहुत से ख़्वाब देखे, हिन्दुस्तान की आजादी का ख्वाब क्या था? वह यह कि हिन्दुस्तान में करोड़ों आदमियों की हालत अच्छी हो, उनकी गरीबी दूर हो, उनकी बेगारी दूर हो, उनकी बेकारी दूर हो, उन्हें खाना मिले, रहने को घर मिले, पहनने को कपड़ा मिले, सब बच्चों को पढ़ाई मिले और हर शख्स को मौका मिले कि हिन्दुस्तान में वह तरक्की कर सके और मुल्क की खिदमत करें। नेहरू अपने हर भाषण के बाद ‘‘जय हिन्द’’ का नारा लगाते और लगवाते थे।

‘‘जय हिन्दू’’ का नारा सुभाष चन्द्र बोस ने 1945 के दौरान दिया था, जब आजाद हिंद फौज का गठन उन्होंने बर्मा में किया था और अपने फौज में 3 सेनापति नियुक्त किये थे। कर्नल ढिल्लों, कैप्टन शाह नवाज, कैप्टन सहगल तथा जो महिलाओं की फौज थी उसकी सेनापति बनाई गई थी कैप्टन लक्ष्मी।

जब सुभाष बोस की सेना आगे बढ़ कर हमला करती थी तो ‘‘जय हिंद’’ का नारा लगाती थी। 1945 में जापान ने आत्मसमर्पण किया और आजाद हिंद फौज के तीनों सिपहसालार ढिल्लों, शाह नवाज, और सहगल पकड़े गए और उन पर देशद्रोह का मुकदमा लाल किले में चलाया गया, जिसकी पैरवी करने में जवाहरलाल भी वकील की तरह शामिल थे। सुभाष बोस का ‘‘जयहिंद’’ का नारा नेहरू ने अपना लिया क्योंकि कांग्रेस के आंदोलन और आजाद हिंद फौज का मकसद था आजादी और जहां- जहां भी वह भाषण देते अंत में ‘‘जयहिंद’’ का नारा लगवाते। हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई का परिणाम, पाकिस्तान छोड़ कर, बचे हुए हिन्दुस्तान में सिमट कर रह गया, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ने हर जगह सुभाष बोस के नारे को प्रचलित और प्रसिद्ध कर दिया था।

यह नारा 65 वर्ष तक भारत के प्रधानमंत्री ने लाल किले से लगवाया और अचानक भाजपा का शासन आने के बाद नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने और प्रधानमंत्री की पोषाक और जयहिन्द का नारा बदल डाला। इसी लाल किले से नेहरू अपनी चिरपरिचित पोषाक शेरवानी चूड़ीदार पजामा और सिर पर गांधी टोपी लगाए अपने भाषण का समापन ‘‘जयहिंद’’ से करते थे। अब यह पोषाक बदली जा चुकी थी। प्रधानमंत्री मोदी ने नया कुर्ता और नया चूड़ीदार पजामा और उस पर चमकदार लहरायादार राजस्थानी स्टाइल का साफा बांधा जैसे कोई किसी शादी ब्याह में जब राजस्थान या मालवा जाता है तो ऐसा साफा पहन लेता है। ‘‘जयहिंद’’ का जो नारा था उसको त्याग दिया गया और उसके स्थान पर ‘जय भारत’ का नारा लगाया और लगवाया। बड़े आश्चर्य की बात है कि प्रधानमंत्री पद पर पर बैठा हुआ आदमी इन छोटी-छोटी बातों को बदल कर नेहरू से महान बनने की कोशिश कर रहा है। सुभाष बोस जिसने इस नारे को इजाद किया उसका अपमान भी कर दिया। वजह यह थी कि नरेन्द्र मोदी का न तो 1942 के कांग्रेस आंदोलन से कोई लेना देना था न ‘आजाद हिंद फौज’ के आक्रमण से।

अपने 15 अगस्त 1948 के भाषण मे नेहरू समझाते हैं कि असली ‘‘जयहिंद’’ क्या है और वो कहते हैं थोड़े से आदमियों की हुकूमत की ऊॅंची कुर्सी पर बैठने से मुल्क नहीं उठते हैं मुल्क उठते हैं जब करोड़ो आदमी खुशहाल होते हैं और तरक्की कर सकते हैं। नेहरू आगे कहते हैं कि हम झगड़ों, फसादों में मुब्तला हो गए हैं, फंस गए हैं लेकिन उस काम को हमें पूरा करना है, जब तक हमारा काम पूरा नहीं होता तब तक आजादी भी पूरी नहीं होती और उस वक्त तक हम दिल खोलकर ‘‘जयहिन्द’’ भी नहीं बोल सकते। अगर आप आजाद कौम हैं तो खाली ऐतराज करने से काम नहीं चलेगा। उस बोझे को उठाना है, सहयोग करना है, मदद करनी है और अगर हम सब इस तरह से करेंगे तो बड़े से बड़े मसले हल हो सकते है।

नौजवानों का उन्होंने आव्हान किया कि आप याद करें कि एक जमाने से जहां तक हममें ताकत थी, कूवत थी, हिन्दुस्तान की आजादी की मशाल को उठाया, हमारे बुर्जुगों ने हमें दिया था लेकिन हमारा जमाना भी अब हल्के-हल्के खत्म होता है और उस मशाल को उठाने और जलाए रखने का बोझा आप पर होगा। वह मशाल है आजादी की, अमन की और सच्चाई की। याद रखिए लोग आते हैं जाते हैं और गुजरते हैं लेकिन मुल्क और कौमें अमर रहती हैं वे कभी गुजरती नहीं हैं।

अगर आप बड़े देश के बड़े नागरिक है तो आपको और हमको बड़े दिल का, बड़े दिमाग का होना है। छोटे आदमी बड़े काम नहीं करते, न हम शोरगुल मचाकर समस्याओं का हल कर सकते हैं, न नारों से, शिकायतों से, न एतराज से, न दूसरों को भला बुरा कहने से। अगर एक एक आदमी और औरत अपना फर्ज अदा करे तो देश का भला होगा। असली स्वतंत्रता वह नहीं है, जो और देशों की तरह और ताकतों की तरह और फौजों की तरह और पैसों की तरफ देखकर अपने को बचाने की कोशिशं करे।

उस समय भी विपक्षी दल कम्युनिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी, भारतीय जनसंघ, हिन्दू महासभा और आर.एस.एस थी, नेहरू ने पूरे भाषण में एक शब्द विपक्षी दल के लिए नहीं कहा। उन्होंने यह नहीं कहा कि हम भारत को कम्युनिस्ट विहीन या जनसंघ विहिन कर देंगे। नेहरू की मानसिकता इतनी छोटी नहीं थी। किसी को गिराकर अपने आप को उठाना, यह नेहरू का दर्शन नहीं था। उन्होनें देश का विकल्प नहीं समझा। कांग्रेस और देश उनके लिए अलग-अलग थे लेकिन अभी यह सोच है कि भाजपा ही देश है और भाजपा ही इस देश का विकास कर सकती है और वहीं देश को बचा सकती है और इस देश को कांग्रेस विहिन करना है। कुछ लोग होते हैं जो दूसरे की बड़ी लाइन को छोटा करते है और कुछ लोग होते हैं कि दूसरों की छोटी लाइन के संबंध में कुछ नहीं बोलते। अपनी लाइन बड़ी करते हैं, क्या ये देश कांग्रेसी विचारधारा मानने वाले, समाजवादी विचारधारा मानने वाले, कम्युनिस्ट विचारधारा मानने वाले लोगों का नहीं है? क्या ये समझा जाये कि सारा देश केवल भाजपा के विचारधारा को ही मानेगा? भाजपा का 7 बरस का शासन क्या हुआ, प्रधानमंत्री मोदी से लेकर छोटा कार्यकर्ता भी यह मानने लगा है कि जो भाजपा की विचारधारा मानते हैं वो देशभक्त हैं और जो नहीं मानते है वो देशद्रोही हैं। ये सोच बड़ी खतरनाक है और हिटलरवादी सोच है क्योंकि हिटलर की भी यहीं सोच थी कि जर्मन जाति ही श्रेष्ठ जाति है और वे ही केवल आर्य हैं। सारी दुनिया को रौंदने वाला हिटलर आखिर मारा गया और जर्मनी को आत्मसमर्पण करना पड़ा। यह नतीजा हुआ हिटलर के गुरूर और घमण्ड का।

जागीरदारी जमींदारी पहला संविधान संशोधन 1951 के द्वारा समाप्त हो गई और खेत जोतने वाला खेत का मालिक हो गया। नेहरू ने प्रधानमंत्री बनने के पहले भी कई विदेश यात्रा की वे पहली बार 1927 में सोवियत रूस गए तथा नेहरू यूरोप में अपनी पढ़ाई के अलावा 21 महीने यूरोप रहे। नेहरू केवल भ्रमण के लिए ही विदेश नहीं गए बल्कि उन्होनें वहां की आर्थिक नीतियों और संस्थाओं का अध्ययन किया।

नेहरू को पता था कि इतने बड़े और गरीब देश में एक -एक संसाधन का किफायत और योजनाबद्ध तरीके से इस्तेमाल करना होगा। किसी तरह की उच्च श्रंखला की कोई गुंजाइश नहीं है। उनके दिमाग में प्लानिंग का एक खाका था। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में सोवियत रूस और यूरोप की यात्रा के बारे में लिखा है कि मेरे सोच का दायरा बड़ा हो गया है मुझे राष्ट्रवाद एक संकीर्ण और दकियानूसी लगने लगा, सियासी आजादी बहुत जरूरी है लेकिन कोई इंसान या मुल्क तब तक तरक्की नहीं कर सकता जब तक कि वहां सामाजिक आजादी न हो और समाज एवं सरकार को ढांचा समाजवादी न हो। नेहरू ने केवल अपनी सनक से काम नहीं लिया बल्कि सामाजिक और आर्थिक आजादी से संबंधित कई किताबों का गहन अध्ययन किया, जिनमें कालमार्षल का अर्थशास्त्र शामिल था। सैंकड़ों लोगों से विचार-विमर्श किया।

नेहरू ने मार्च 1950 में प्लानिंग कमीशन की स्थापना की और खुद उसके अध्यक्ष बने। 15 महीने तक इस संस्था ने देश की आर्थिक स्थितियों, क्षमताओं और ज़रूरतों का अध्ययन किया और अपनी मदद के लिए बहुत से एडवाजरी बोर्ड और समितियां बनाई। बड़े गहन अध्ययन और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर 1951 में पहली पंच वर्षीय योजना का ड्राफ्ट बनकर तैयार हुआ जो 300 पन्ने में छपा हुआ था। इसे पूरे देष में बांटा गया ताकि इस पर बहस हो और लोग अपनी राय रख सके। 18 महीने बाद जनता की आलोचना और टिप्पणियों को मद्दे नजर रखते हुए इसका संशोधित मसोदा तैयार हुआ। जिसके आधार पर पहली पंचवर्षीय योजना तैयार हुई और जिसका लक्ष्य हासिल करने की तारीख 1 अप्रैल 1956 रखी गई। यह योजना आयोग का पहला प्रदर्शन था।

चूंकि नेहरू का कद छोटा करना ही लक्ष्य बना हुआ है इसलिए ‘‘योजना आयोग’’ को समाप्त कर दिया गया और उसके स्थान पर ‘‘नीति आयोग’’ लाया गया, जिसमें सभी भाजपा विचारधारा के लोग शामिल किए गए। 7 वर्ष में इस आयोग का कोई काम नजर नहीं आया। कोई आयोग समाप्त किया जाता है तो उसके स्थान पर उससे बेहतर आयोग स्थापित किया जाता हैं लेकिन यहां तो योजना आयोग जो अच्छा काम कर रहा था लेकिन उसे नेहरू ने स्थापित किया था इसलिए उस आयोग को समाप्त करना ही एकमात्र ध्येय था। मोदी की नकल करने वाले एक उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, उनका काम शहरों के नाम बदलना है। कुछ सदियों से जो नाम चला आ रहा था इलाहाबाद, जहां के मशहूर शायर थे अकबर इलाहाबादी और अमरूद मशहूर है इलाहाबादी अमरूद के नाम से, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का उत्तर भारत में अपना एक नाम था। इन सब को बदलकर ‘प्रयागराज’ कर देना कौन सा विकास है केवल एक मुख्यमंत्री की सनक का हिन्दूवादी विचारधारा का प्रदर्शन है।

पंच वर्षीय योजना पूरे देश मे लागू की गई, इस योजना में अलग अलग राज्य और इलाकों के बारे में अलग से विचार किया गया। इस प्लान के द्वारा समाज सेवा करने के इच्छुक लोगों को ज्यादा से ज्यादा काम करने का मौका मिला, इसमें सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र दोनो की भूमिकाएँ थी। निजी क्षेत्र पर एक सीमा तक पंचवर्षीय योजना से कन्ट्रोल था और प्लान को ज़रूरतों के हिसाब से ढालना इसलिए जरूरी था क्योंकि इस परियोजना में खेती, उद्योग और सामाजिक सेवाओं को आपस में सामंजस की पूरी कोशिश की गई थी। खेती पर इस प्लान में ज्यादा जोर दिया गया क्योंकि अच्छी खेती की स्थाई बुनियाद पर ही औद्योगिक प्रगति की जा सकती है।

यदि कृषि का विकास करना है तो उसके लिए एक उचित नीति जरूरी है और उसके लिए बिचैलियों का खात्मा और प्रति किसान खेती की सीमा तय करना जरूरी है। नेहरू ने जमींदारी, जागीरदारी, ईनामदारी, गल्लुकेदारी सब प्रकार के बिचैलिये को खत्म किया और खेती में सिलिंग सीमा लेकर आए, जो 15 एकड़ प्रति परिवार थी। पहले प्लान में खाद्यान उत्पादन का लक्ष्य 8 मिलियन टन बढ़ाने का रखा गया था ताकि अनाज के लिए किसी देश के सामने हाथ न फैलाना पड़े। इस उत्पादन को बढ़ाने के लिए बड़े सिंचाई परियोजनाएं जो 8 मिलियन एकड़ जमींन पर बनाई गई और 11 मिलियन एकड़ जमींन लघु सिंचाई परियोजना के लिए रखी गई। इन सब के लिए आवश्यकता थी विशाल नदी-घाटी परियोजनाओं की। यह परियोजनाएं सिंचाई के अलावा लाखों किलोवॉट बिजली पैदा करने की क्षमता रखती थी।

कपास का उत्पादन 12 लाख गांठ और जूट का उत्पादन 20 लाख तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया, हेण्डलुम का उत्पादन 8 मिलियन गज से बढ़ाकर 17 मिलियन गज करने का लक्ष्य रखा। इसी प्रकार स्टील और सीमेंट का उत्पादन बड़ी मात्रा में बढ़ाने का लक्ष्य भी रखा। खेती के लिए फर्टीलाइजर (खाद) की अहम आवश्यकता होती है इसलिए सिंदरी में एक बड़ी फर्टीलाइजर फैक्ट्री शुरू की गई। इस फैक्ट्री से निर्मित फर्टीलाइजर जब किसानों को मिला तो उत्पादन का लक्ष्य पूरा होना ही था। योजना आयोग का पहले प्लान में यह सबसे महत्वपूर्ण योगदान था। नेहरू का एक ख़्वाब इस तरह पूरा हुआ।

 

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