ट्रेड यूनियन की राजनीति को लेकर दुविधा में थे नेहरू

आनंद मोहन माथुर।

देश ने एक बार फिर करवट ली और क्रांतिकारी शक्तियां फिर जोर-शोर से उभरीं। मजदूर, किसान और नौजवान अपने अपने ढंग से संगठित हो रहे थे। जवाहरलाल ने इस परिस्थितियों का चित्रण किया है।

चीन में क्योमिन तांग पार्टी, भारत में कांग्रेस जैसी ही राष्ट्रीय संस्था थी, जिसमें आज़ादी के लिए लड़ने वाले सभी तत्वों का समावेश था, लेकिन डॉ. सनयात सेन ने 1919 के 4 मई आंदोलन के बाद, इसको ‘‘साम्राज्य विरोधी क्रांतिकारी विश्व मोर्चे’’ का अंग बना दिया था। यह पार्टी एक तरफ विदेशी साम्राज्यवादियों से लड़ रही थी और दूसरी ओर सदियों से जनता का खून चूसने वाले घरेलू सामंती ततत्वों का सफाया कर रही थी। इस कारण चीनी मेहनतकश जनता बड़ी तादाद में क्योमिनतांग पार्टी से जुड़ी। 1927 में चांग-काई शेक पूंजीवादी वर्ग जो दलालों का प्रतिनिधित्व करता था, जागीरदारों और सामंतों से जा मिला और नकली क्रांतिकारी बन गया। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी जो क्योमिन तांग का ही एक अंग थी, आज़ादी का झंडा ऊंचा उठाया और देश की शोषित जनता और प्रगतिशील तत्वों के साथ क्रांतिकारी संघर्ष को जारी रखा, साथ ही साम्राज्य विरोधी शक्तियों को सृढढ़ बनाया, क्योंकि यह क्रांति की सफलता के लिए बहुत ज़रूरी था। तो स्थिति यह बनी, कि हर उपनिवेशवादी राष्ट्र का स्वाधीनता संग्राम वाकई में वो ऐसा संग्राम था तो ऐसे साम्राज्यवाद का विरोधी था।

‘‘साम्राज्य विरोधी लीग’’ नाम की एक संस्था विदेश में कायम हुई और जवाहरलाल भारत से उसके सदस्य बने। ब्रुसेल्स में इसकी कई मीटिंग हुई और उसमें जवाहरलाल ने भाग भी लिया। इन मिटिंग्स के जरिये जवाहरलाल को औपनिवेशिक और उसके गुलाम उपनिवेश देशों की समस्याओं को समझने का एक मौका मिला।

जवाहरलाल 1927 में मोतीलाल नेहरू के साथ सोवियत रूस की यात्रा पर गये थे और उन्होंने रूस में भारी परिवर्तन स्वयं देखा था। इस प्रकार मानसिक रूप से बलशाली होकर नेहरू जब स्वदेश लौटे तो उन्होंने कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में गरम प्रस्ताव रखे। गांधी को यह प्रस्ताव पसंद नहीं आए और उन्होंने उसका विरोध किया, क्योंकि गांधी का फ़लसफ़ा था कि हिन्दुस्तानियों को अपनी भीतरी शक्ति का विकास करके आज़ादी हासिल करना चाहिए, किन्तु सच्चाई यह नहीं थी क्योंकि यह भीतरी शक्ति एक तरफ से साम्राज्यवादियों से लड़कर और दूसरी ओर घरेलू ज़मींदारों के विरूद्ध क्रांतिकारी संघर्ष से ही विकसित हो सकती थी। गांधी के प्रभाव के कारण नेहरू ने ‘साम्राज्यवाद विरोधी लीग’ में दिलचस्पी लेना बंद कर दिया। नेहरू बहुत दिनों तक लीग के सदस्य नहीं रह सके और जब उन्होनें 1921 में गांधी-इरविन समझौते का समर्थन किया तो लीग ने उन्हें निकाल दिया।

22 फरवरी 1928 को कलकत्ता में अखिल बंग छात्र सम्मेलन हुआ जिसके अध्यक्ष जवाहरलाल थे उन्होंने नौजवानों से कहा : ‘‘इस युग का विचार सामाजिक समानता है और दुनिया को बदलने के लिए इससे कोई बेहतर साधन नहीं है।’’

देश ने एक बार फिर करवट ली और क्रांतिकारी शक्तियां फिर जोर-शोर से उभरीं। मजदूर, किसान और नौजवान अपने अपने ढंग से संगठित हो रहे थे। जवाहरलाल ने इस परिस्थितियों का इस प्रकार चित्रण किया है। 1926 के शुरू में हिन्दुस्तान पहले जैसा सुप्त और निष्क्रिय बना हुआ था, शायद यह 1922 की थकान का नतीजा था, लेकिन 1928 में वह तरोताजा, क्रियाशील और नई शक्ति से भरा हुआ था। इस बात का सबूत हर जगह मिलता था, चाहे वह मज़दूरों में हो, चाहे किसानों में और चाहे नौजवानों में हो।

7-8 साल पहले बनी ‘‘आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस’’ के सदस्यों के संख्या में एक असाधारण वृद्धि हुई और उसके विचार ज्यादा लड़ाकू हो गये थे. मजदूर हड़तालें होती थी और उनमे वर्ग चेतना बढ़ रही थी। कपड़ा मीलों का एक संगठन था बम्बई में जिसका नाम था ‘‘गिरणी कामगार यूनियन’’ और रेलवे की एक यू नियन थी जिसका नाम था ‘‘जी.आई.पी रेलवे यूनियन।’’

इस प्रकार हमारे राष्ट्रीय आंदोलन पर अन्तर्राष्ट्रीय आंदोलनों का ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा। 1928 में जो क्रांति की लहर उठी उसमें 1921-22 की अस्पष्टता और धार्मिकता नहीं थी, देश की स्थिति बहुत बदल चुकी थी। वह मुक्कमल आजादी की तरफ बढ़ रहा था। ‘‘मुक्कमल आजादी’’ का मतलब यह था की विदेशी साम्राज्यवाद की गुलामी से मुक्ति पाना और साथ ही सामाजिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन कर धर्म और जाति के दमन और पैसे के शोषण को समाप्त करके समानता लाना। इस आंदोलन का रूझान समाजवाद की ओर था जवाहरलाल के कलकत्ता वाले भाषण में यह स्वर सुनाई देता हैः

‘‘हिन्दुस्तान में समाजवाद का डंका बजाने में कई लोग मुझसे बहुत आगे थे और मैं पिछड़ा हुआ था विचारधारा की दृष्टि से मजदूरों का ट्रेड यूनियन आंदोलन समाजवादी था। मैं व्यक्तिगत रूप से समाजवादी था। धीरे धीरे मार्क्स के समाजवादी सिद्धांतों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था युरोप और अमेरिका की तरह हिन्दुस्तान में भी सोवियत यूनियन में हुए परिवर्तन का प्रभाव पड़ रहा था और खासकर पंचवर्षीय योजनाओं का।

1928 में ही ‘‘साइमन कमीशन’’ हिन्दुस्तान यह मालूम करने आया कि हिन्दुस्तानी स्वशासन की ओर कितना आगे बढ़े हैं और माउंटे-ग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारो में कितना ओर अधिक पाने योग्य बन गए हैं । भारत की जनता ने इसे अपना अपमान समझा। साइमन कमीशन के विरोध में बड़े-बड़े जुलूस निकले, प्रदर्शन हुए जिनका दमन करने के लिए सरकार ने लाठी चार्ज किया, जिससे कई लोगो को गंभीर चोटें आई।

इन हालात में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कोलकाता में हुआ, जिसके अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे। मजे की बात यह है कि गांधी ने चोरी-चोरा आंदोलन को वहाॅं हुई हिंसा के बाद वापस ले लिया था और वह आंदोलन इस घटना के बाद समाज सुधार के रचनात्मक कार्यो में लग गया था किन्तु, इस अधिवेशन में राजनैतिक रूप से सक्रिय बन गया था। गांधी ने जब प्रस्ताव पेश किया था उसमें लिखा था कि अगर सरकार एक साल के भीतर अर्थात 31 दिसम्बर 1929 तक मुक्कमल आजादी की मांग स्वीकार नहीं करेगी तो कांग्रेस दोबारा असहयोग आंदोलन शुरू करेगी और यह आंदोलन करबंधी से शुरू होगा।

चूंकि इस प्रस्ताव के पीछे अपने ध्येय से पीछे जाना और दूसरे संघर्ष को एक साल के लिए टालना था, यह प्रस्ताव थोड़े मतो से गिर गया लेकिन जवाहरलाल खुद इस प्रस्ताव के विरोध में थे।


नेहरू जब स्वदेश लौटे तो उन्होंने कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में गरम प्रस्ताव रखे। गांधी को यह प्रस्ताव पसंद नहीं आए और उन्होंने उसका विरोध किया, क्योंकि गांधी का फ़लसफ़ा था कि हिन्दुस्तानियों को अपनी भीतरी शक्ति का विकास करके आज़ादी हासिल करना चाहिए।

सुभाषचन्द्र बोस और जवाहरलाल इस अधिवेशन में गरम दल के प्रमुख नेता थे।

सुभाष ने अपनी आत्मकथा ‘‘भारतीय संषर्घ’’ में लिखा है, ‘‘कलकत्ता कांग्रेस के गांधी इरविन समझौते पर इस प्रस्ताव का एक ही प्रयोजन था और वह था मूल्यवान समय नष्ट करना।कोलकाता के 50 हजार मजदूरों ने प्रदर्शन किया और राष्ट्रीय स्वाधीनता तथा स्वतंत्र समाजवादी गणतंत्र के पक्ष में नारे लगाये। ब्रिटिश सरकार ने इस अवसर का लाभ उठा कर गरम दल वालों पर दमन चक्र चलाया और मार्च 1929 में समाजवाद के समर्थक तमाम ट्रेड यू नियन नेताओं को गिरफ्तार कर मेरठ साजिश केस चलाया जो चार साल तक चलता रहा।’’

31 अक्टूबर 1929 को वायसराय ने ऐलान किया कि ‘‘भारत के विधान पर विचार करने के लिए लंदन में एक गोलमेज कॉन्फ्रेंस बुलाई जायेगी।’’ सभी नेताओं ने इसका हार्दिक स्वागत किया और एक बयान जारी किया कि हिन्दुस्तान की जरूरतों के मुताबिक डोमिनियन-विधान तैयार करने में कांग्रेस ब्रिटिश सरकार को पूर्ण सहयोग देगी। इस बयान पर गांधी, एनी बेसेंट, मोतीलाल नेहरू, सर तेज बहादुर सप्रू इत्यादि के हस्ताक्षर थे, सुभाष ने हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया। पहले जवाहरलाल ने भी इंकार किया था लेकिन बाद में गांधी के आग्रह पर हस्ताक्षर कर दिये। इस दस्तखत से नेहरू की क्रांतिकारी ख्याति को जबरदस्त धक्का पहुॅंचा और उन्होनें उनकी पीड़ा गांधी को 4 नवंबर 1929 के पत्र में बताई :
‘‘प्रिय बापू,

मैेंने दो रोज अच्छी तरह से विचार किया मेरा दिमागी बुखार अभी दूर नहीं हुआ हैं। परसों शाम को मेरे अंदर कुछ ऐसी बातें उठीं, जिनको मैं एक सूत्र में नहीं बांध पाया हूँ। कांग्रेस का प्रधानमंत्री होने के नाते मेरी वफ़ादारी कांग्रेस के प्रति होना चाहिए, किन्तु इसके अलावा मैं इंडियन ट्रेड यूनियन कांगे्रस का सदर हूॅं और इंडिपेन्डेंस फाॅर लीग का सेक्रेटरी हूँ। युवक आंदोलन से मेरा नजदीकी रिश्ता है। इन दूसरी जमातों से मेरा ताल्लुक है। मैं इस बात को पहले से ज्यादा महसूस करता हूॅं कि अपनी वफ़ादारी के लिए क्या करूँ? मैं उलझन में हूॅं कि कई घोड़ों पर एक साथ सवारी करना मुश्किल है। इन सब बातों पर विचार करने पर मुझे यक़ीन हो गया है कि परसों मैंने आपके निर्देश पर दस्तख़त तो कर दिये है। मैं बयान की अच्छाई के बारे में कुछ नहीं कहूॅंगा लेकिन मुझे डर है कि उस मसले पर हमारा बुनियादी मतभेद है और यह मुमकिन नहीं कि मैं आपकी राय बदल दूॅं, मैं सिर्फ इतना कहूॅंगा कि वह बयान नुकसानदेय है। मेरा ख्याल है कि हम एक खतरनाक जाल में उलझ गये हैं, जिससे निकल सकता आसान नहीं है।

मैं नहीं जानता कि ब्रिटिश सरकार क्या करेगी? मुमकिन है वह अपनी शर्तों को नहीं मानेगी और ज्यादातर हस्ताक्षर करने वाले आपको निश्चय ही छोड़कर चले जायेंगे और ब्रिटिश सरकार जो रद्दोबदल सुझाएगी। इस प्रकार कांग्रेस के भीतर मेरी हालत दिन-ब-दिन ज्यादा मुश्किल होती जाएगी। मैंने कांग्रेस की सदारत बड़े शक़ ओ सुबह के साथ मंजूर की थी लेकिन इस उम्मीद से कि अगले साल एक मसले को लेकर लड़ लेंगे। मुझे नेताओं के सम्मेलन से क्या फायदा ?इसलिए मुझे परेशानी है। मैं महसूस करता हूँ कि मुझे पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। अब मुझे यकीन हुआ कि मेरा चुनाव ग़लत था वास्तव में आपको सभापति बनाना चाहिए था।

एक दूसरा रास्ता है कि मैं ऐलान कर दूॅं कि मौजूदा हालात में मैं सदारत छोड़ दूॅं, मैं चेयरमेन के तौर पर काम करूॅंगा। आप चाहे तो दो में से एक रास्ता मेरी समझ में ज़रूरी है। मुझे शांति होनी चाहिए।
सप्रेम आपका,
जवाहरलाल

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