सभी रैन बसेरे ठेके पर… भिक्षुकों को इंट्री नहीं, स्टूडेंट्स और श्रमिकों के लिए बने सरायखाना

करोड़ों के रैन बसेरे संभले नहीं, नए आश्रय की तैयारी में निगम

इंदौर (विनोद शर्मा ) करोड़ों रुपया लगाकर भिक्षुकों के लिए जो 13 रैन बसेरे बनाए गए थे लेकिन 19 हजार कर्मचारियों की भारीभरकम फौज होने के बावजूद निगम प्रशासन उनका संचालन नहीं कर सका। इसीलिए यह रैन बसेरे शहर के वजनदार नेताओं को ठेके पर दे दिए गए। ठेकेदारों ने कुछ रैन बसेरों में तो बेहतर व्यवस्था की, कुछ में हालत खराब है। अब जबकि भिक्षुकों को शिप्रा छोड़े जाने का मामला तूल पकड़ चुका है निगम अफसर कह रहे हैं कि डेढ़ करोड़ की लागत से भिक्षुकों के लिए आश्रय स्थल बनाएंगे।

नगर निगम ने 13 रैन बसेरे बना रखे हैं। सरवटे बस स्टैंड, किला मैदान, खजराना गणेश मंदिर, पिपल्याहाना, टीबी अस्पताल परिसर, सुखलिया, सुभाषनगर, सामाजिक न्याय विभाग, झाबुआ टॉवर, पलसीकर कॉलोनी, गाड़ी अड्‌डा, जिला अस्पताल और अरविंदों हॉस्पिटल। सभी ठेके पर हैं। आधे सफाईकर्मी नेता प्रताप करोसिया के संगठन के पास है। प्रजातंत्र की पड़ताल के दौरान सभी रैन बसेरे खाली थे। किला मैदान रैन बसेरे में एक युवक नियुक्त है जो 24 घंटे वही रहता है। ग्राउंड फ्लोर और फस्ट फ्लोर के बेड खाली थे। कर्मचारी ने बताया कि दहाड़ी श्रमिक रूकते हैं। भिक्षुक नहीं है। गंगवाल बस स्टैंड का रैन बसेरा पूरी तरह खाली है। सुपरवाइजर ने बताया कि स्टूडेंट्स और श्रमिक आईकार्ड देकर रूकते हैं। एक व्यक्ति दो दिन रूक सकता है लेकिन ठंड में किसी को मना नहीं करते। पलसीकर स्थित रैन बसेरा में भी एक कर्मचारी था। सभी बेड खाली थे। बताया गया कि यहां भी श्रमिक रूकते हैं। कभी-कभी नगर निगम फुटपाथी लोगों को ले आता है। गाड़ी अड्‌डा रैन बसेरा खाली था। स्टाफ भी कोई नहीं था। भोजन शाला वालों ने बताया कि भिक्षुक नहीं रूकते। न ही लाए गए हैं।

झाबुआ टॉवर रैन बसेरा वालों ने बताया कभी-कभी भिक्षुक आ जाते हैं। मना नहीं करते। 10 रुपए में संस्था भोजन कराती जो वह कर लेते हैं। इसके बाद फिर चले जाते हैं। भिक्षुकों को छोड़ने और उनकी पूछपरख के लिए दिनभर में पहुंचे 200 नेताओं के कारण शनिवार को चर्चा में रहे टीबी हॉस्पिटल रैन बसेरा में वही भिक्षुक थे जिन्हें शुक्रवार शाम छोड़ा गया था। इसके अलावा कोई नहीं था। यहां खाने की कोई व्यवस्था नहीं है।

सरायखाना बना दिया… रैन बसेरों का निर्माण भिक्षुकों या बेसहारा लोगों के लिए किया गया था लेकिन ठेकेदारों ने इन रेन बसेरों को सरायखाना बना दिया। जहां कोई भी जाकर रूक सकता है। स्टूडेंट या श्रमिक भिक्षुकों के साथ रूकना पसंद नहीं करेगा। इसीलिए बसेरों में भिक्षुक रखे भी नहीं जाते। एक रैन बसेरे में अनुबंध के अनुसार तीन कर्मचारी और एक सफाईकर्मी रखना जरूरी है। मतलब चार कर्मचारी/बसेरा। कुल 13 रैन बसेरे हैं मतलब 52 कर्मचारी चाहिए थे। 19 हजार से अधिक कर्मचारी होने के बावजूद निगम अपने ही बनाए रैन बसेरों को 52 कर्मचारी नहीं दे सका। व्यवस्था ठेके पर देकर जान छुड़ाने में अफसरों ने कोई देर नहीं की। बाद में रैन बसेरों की क्या गति-र्दुगति हुई? इसकी कोई मॉनिटरिंग भी नहीं है।

भोजन शाला बन गई, चालू जाने कब होगी?
पलसीकर रैन बसेरे में दयावती एजुकेशनल एंड चेरिटेबल सोसायटी ने दीनदयाल अंत्योदय रसोई योजना के तहत रसोई की व्यवस्था तो कर दी लेकिन संचाल नहीं हो सका। दो महीने से उद्घाटन टल रहा है। ऊपर हिससे को निगम ने कचरा पेटी स्टेशन बना दिया जहां नई कचरा पेटियां स्टोर की जा रही है।

यह आंतरिक विषय है.. निगम का
रैन बसेरों का संचालन ठेके पर देना या अपने पास रखना। यह नगर निगम की आंतरिक व्यवस्था है। जिसका निर्णय जनप्रतनिधि और अधिकारी मिलकर लेते हैं। पूर्व में जो निर्णय लिया गया था वह सही होगा।
-प्रतिभा पाल, आयुक्त नगर निगम

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