आसान नहीं कुशल गृहणी होना

– रंजना मिश्रा

आधुनिक नारियों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, एक तो वह जो गृहणी हैं, दूसरी नौकरीपेशा या बिजनेसमैन। आजकल नौकरी या बिजनेस करने वाली महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है और एक गृहणी जो केवल घर संभालती है, उसे बहुत ही साधारण दृष्टि से। किसी गृहणी से जब कोई पूछता है कि क्या करती हो? उस महिला को ये बताने में भी बड़ा संकोच होता है कि वह एक गृहणी है, लगता है कि सामने वाला यही सोचेगा कि उसमें कोई योग्यता नहीं होगी, तभी तो वह केवल गृहणी बनकर रह गई। वास्तव में एक गृहणी होना कितना कठिन है, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा पाता।

कठिनाइयां और संघर्ष तो हर स्त्री के भाग्य में लिखे होते हैं, चाहे वह गृहणी हो या नौकरीपेशा। नौकरी करने वाली स्त्रियों को भी घर और ऑफिस दोनों को ही संभालना पड़ता है, बहुत भागदौड़ करनी पड़ती है, अपने परिवार के साथ समय बिताने का भी समय नहीं होता उनके पास। फिर भी एक संतोष होता है, अपने सपने को पूरा कर पाने का, अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेने का और इसलिए वह घर-बाहर दोनों जगह जूझती हैं, अपनी कमाई का पैसा जब उनके हाथों में आता है तो उनके चेहरे पर आत्मसंतोष और आत्मविश्वास की एक अलग ही चमक होती है। उन्हें अपने खर्चों के लिए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता। पति या सास-ससुर की जली-कटी नहीं सुननी पड़ती, वे अपनी मर्जी से अपने ऊपर खर्च कर सकती हैं व अपने शौक पूरे कर सकती हैं।

किंतु गृहणी! वह बेचारी क्या करे? वह तो अपना पूरा समय अपने परिवार को संभालने में ही लगा देती है, फिर भी सराहना का एक शब्द नहीं मिलता। अपने खर्चे के लिए भी उसे अपने पति या सास-ससुर पर ही आश्रित रहना पड़ता है, वो जो दे दें उसी में उसे संतोष करना पड़ता है। एक पढ़ी-लिखी स्त्री को जब विवाह के बाद नौकरी करने से मना कर दिया जाता है और उसे यह समझाया जाता है कि अब घर संभालना ही उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, तब कई बार अपने सपनों को बलिदान कर स्त्रियां घर परिवार की जिम्मेदारी संभालने को ही अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लेती हैं।

घर को सजाना-संवारना, परिवार के सदस्यों के लिए पौष्टिक एवं स्वादिष्ट भोजन बनाना, घर को साफ-सुथरा रखना, घर के प्रत्येक सदस्य का ख्याल रखना, छोटे बजट में भी घर को सुचारू रूप से चला लेना, ये सब एक कुशल गृहणी के गुण होते हैं। किंतु नौकरीपेशा महिलाओं के पास घर को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर अधिक ध्यान देने के लिए समय ही नहीं होता, इसलिए अधिकांशतः ऐसी कामकाजी स्त्रियों का घर अस्त-व्यस्त ही पाया जाता है और बच्चे भी अपनी मां से दूरी का अनुभव करते हैं।

एक पढ़ी-लिखी सुशिक्षित गृहणी केवल अपने घर को ही सुव्यवस्थित ढंग से नहीं चलाती बल्कि अपने बच्चों को भी अच्छे संस्कार और शिक्षा देती है। इसलिए प्राचीन समय में जब स्त्रियां बहुधा घर में ही रहती थीं तो अपने बच्चों को रामायण, महाभारत आदि धर्म ग्रंथों में बताई गई अच्छी बातों की शिक्षा देती थीं। इसीलिए हमारे देश में मां को ही प्रथम गुरु माना गया है।

आजकल की पढ़ी-लिखी सुशिक्षित गृहणियां घर की जिम्मेदारी के साथ-साथ अपने बच्चों की शिक्षा पर भी पूरा ध्यान देती हैं। रात में जब घर के बाकी सदस्य गहरी नींद ले रहे होते हैं, उस समय ये स्त्रियां घर के सारे काम निपटाकर अपने बच्चों को पढ़ा रही होती हैं। जिन गृहणियों को बहुत ही साधारण समझा जाता है, उनमें कुछ उच्च शिक्षित गृहणियां भले ही बाहर कोई उच्च शिक्षिका न बन पाई हों या समाज के किसी प्रतिष्ठित पद पर आसीन होकर धन और प्रतिष्ठा न कमा पाई हों, पर वे घर में अपने बच्चों को ऊंची कक्षाओं की गणित और विज्ञान जैसे कठिन विषयों की भी पढ़ाई कराती हुई दिखती हैं। उनकी आंखों में एक सपना होता है कि जो वो नहीं कर पाईं, उनके बच्चे बड़े होकर कर पाएं। उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त कर देश के प्रतिष्ठित पदों पर आसीन हो सकें और अपने देश, समाज और परिवार का नाम रोशन करें। इसके लिए वे दिन-रात एक कर देती हैं, अपने दिन का चैन और रात की नींदें भी कुर्बान कर देती हैं। किंतु वही बच्चे जब बड़े होकर योग्य बन जाते हैं तो शायद कुछ ही अपनी मां के इस बलिदान को याद रख पाते हैं, वरना या तो वह स्वयं भूल जाते हैं या उन्हें भुलवा दिया जाता है।

इतना ही नहीं पति की सफलता में भी पत्नी के त्याग और समर्पण का बहुत बड़ा हाथ होता है, किंतु अधिकांश पुरुष इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं होते, उन्हें लगता है कि उनकी सफलता केवल और केवल उनकी मेहनत का फल है, क्योंकि पुरुषों का अहम् कभी यह स्वीकार ही नहीं कर पाता कि वह स्त्री को उसके कार्यों का उचित पारितोषिक प्रदान करें, उसकी सराहना करें, अपने और अपने बच्चों की सफलता में दिए गए उसके बहुमूल्य योगदान को स्वीकार करें। कोई श्रेय न मिलने पर भी एक पत्नी और मां की भूमिका अदा करने वाली स्त्री यह सोचकर सबकुछ सहज ही स्वीकार कर लेती है कि उसने तो अपने कर्तव्यों का पालन किया है और वह अपने परिवार के सदस्यों की सफलता और उन्नति में ही खुश रहती है।

एक पढ़ी-लिखी और कुछ बनने का सपना देखने वाली महिला जब मात्र गृहणी बनकर रह जाती हैं तो उसके मन में कहीं न कहीं एक टीस कुलबुलाती रहती है कि वह जीवन में कुछ नहीं कर पाई और बच्चों के बड़ा होने पर जब वह अपने सपनों को साकार करना चाहती है, अपने शौकों को पूरा करना चाहती है या अपनी प्रतिभा के द्वारा नाम कमाना चाहती है, तो भी परिवार के सदस्य उसमें रोड़े अटकाते हैं। उन्हें तो आदत पड़ी होती है उसके पूरे समय पर, उसके तन-मन पर अधिकार जताने की। हां! स्वयं पर कभी उसके अधिकार को महसूस करने की जहमत नहीं उठाते। यदि एक गृहणी अपने जीवन का कुछ समय अपनी पहचान बनाने में खर्च करना चाहे तो भी परिवार के स्वार्थी सदस्यों को बहुत नागवार गुजरता है। खुद तो उन्हें सपोर्ट करते नहीं और यदि वह अपने दम पर कुछ करे तो उसे हतोत्साहित ही करते रहते हैं। सभी ऐसे नहीं हैं पर बहुत कम ही पुरुष ऐसे होंगे जो अपनी पत्नी को पूरा सपोर्ट देते हों।

आज की महिलाएं जागरूक हो गई हैं। यदि वे विवाह के बाद एक परिपक्व समझदारी के साथ यह फैसला ले सकती हैं कि परिवार और बच्चों की देखभाल ही उनका प्रमुख उत्तरदायित्व है, तो बच्चों के बड़े होने के बाद अपने खाली समय का सदुपयोग करना भी उनको भली प्रकार आता है। समय और मौका मिलने पर वो अपनी छुपी हुई प्रतिभा को बाहर निकाल कर, उम्र के आखिरी पड़ाव में भी दुनिया को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकती हैं। एक स्त्री अगर पूरे परिवार को संभाल सकती है तो वह कुछ भी कर सकती है। बस उसे अपने अंदर छुपी हुई प्रतिभा को जगाने और पहचानने की जरूरत है। समय और सही अवसर मिलने पर, किसी की रोक-टोक पर ध्यान न देते हुए एक नारी को अपने जीवन में अपने लिए भी कुछ करना चाहिए, समाज में अपनी पहचान बनानी चाहिए। उन्हें केवल परिवार तक सिमटकर नहीं रह जाना चाहिए, क्योंकि योग्य और प्रतिभाशाली नारियों से ही भारतीय समाज मजबूत बनेगा। भारत की नारियां भारत का गौरव हैं।

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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