अक्सर फिल्में ऐसे ही राजेश और नईम के बीच फंस कर रह जाती हैं

विभव देव शुक्ला

दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘छपाक’ का इंतज़ार लोगों को लंबे समय से था। फिल्म की कहानी एक एसिड अटैक पीड़िता के इर्द-गिर्द घूमती है इसलिए कहानी के प्रति लोगों की संजीदगी भी लाज़मी थी। लेकिन बीते दिन से फिल्म पूरी तरह विवादों में घिर चुकी है, दीपिका पादुकोण जेएनयू के छात्रों से हुई हिंसा के विरोध प्रदर्शन में शामिल हुई थी। जिसके बाद एक बड़ी आबादी ने फिल्म का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। लेकिन दूसरी तरफ एक बड़े हिस्से ने दीपिका के इस कदम का समर्थन भी किया।

धार्मिक पहचान छिपाने का आरोप
फिलहाल फिल्म एक नया पहलू सामने आ रहा है, दिन के बीच में सोशल मीडिया पर एक खबर चली कि जिस व्यक्ति ने पीड़िता पर एसिड अटैक किया था उसका नाम फिल्म में राजेश है। जबकि असल में उस व्यक्ति का नाम नईम है, लोगों का कहना है कि फिल्म में आरोपी की धार्मिक पहचान क्यों बदली गई? लोग फिल्म के निर्माताओं पर आरोप लगा रहे हैं कि आरोपी की पहचान बदलने से धार्मिक भावनाएँ आहत होंगी। लेकिन इस बहस के असर में आने के थोड़े समय बाद ही मामले का दूसरा पक्ष सामने आया।

ट्वीट्स की लड़ाई जारी
जब सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ लोगों ने दूसरी जानकारी देना शुरू किया। नेटिज़न ने बताया कि फिल्म में मुख्य आरोपी का नाम राजेश नहीं बल्कि बशीर उर्फ बबलू है। फिलहाल यह दोनों ही नाम ट्विटर पर ट्रेंड कर रहे हैं, राजेश और नईम। राजेश के नाम पर लगभग 75 हज़ार ट्वीट हो चुके हैं वहीं नईम के नाम पर लगभग 85 हज़ार ट्वीट हो चुके हैं। पूरा सोशल मीडिया फिलहाल इसी बहस में उलझा हुआ है और ताज्जुब वाली बात यह है कि इस तरह मामले पर समाज में बड़े पैमाने पर भ्रम के हालात बनेंगे।

जेएनयू जाकर किया था समर्थन
इसके अलावा भी ट्विटर पर तमाम हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। जिसमें छपाक, शेम ऑन बॉलीवुड, बायकॉट दीपिका और दीपिका एट जेएनयू शामिल है। नतीजा कुछ भी हो लेकिन फिलहाल के लिए सुर्खियों से लेकर खबरों तक हर कोने में छपाक मौजूद है। एक तरफ लोग इस फिल्म का बहिष्कार कर रहे हैं तो दूसरी तरफ लोग फिल्म के समर्थन में खड़े हैं।
विरोध करने वाले फिल्म को दीपिका के जेएनयू जाकर प्रदर्शन में शामिल होने से जोड़ कर देख रहे हैं। वहीं समर्थन करने वालों का कहना है कि फिल्म एक एसिड अटैक पीड़िता की ज़िंदगी पर आधारित है, इसलिए फिल्म का बहिष्कार सही नहीं है। लेकिन इस बात को किसी भी सूरत में नकारा नहीं जा सकता है कि सारे सवालों के जवाब फिल्म के आने के बाद ही मिलेंगे।

धर्म का ऐसे मसलों पर असर
धर्म हमारे देश का बेहद संवेदनशील मसला है, धर्म की ज़मीन पर सरकारें बन जाती हैं और धर्म की ढाल से न जाने कितने तख्त सलामत हैं। बात अच्छी से अच्छी क्यों ना हो धर्म से जुड़ा एक महीन सा शब्द पूरी बात की रंगत बदल देता है। हमारे देश में हर बड़ा क्षेत्र धर्म के प्रभाव से अछूता नहीं है, विचारों से लेकर राजनीति तक और नज़रिये से लेकर सिनेमा तक। धर्म की बूंदे हर पहलू के शीशे पर नज़र आ ही जाती है।

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