पाकिस्तानी क्रिकेट और तबलीगी जमात

सत्य व्यास

पाकिस्तानी क्रिकेट अपने प्रारम्भ के दिनों से ही अस्तित्व की लड़ाई लड़ती रही है। देश चूंकि मजहबी आधार पर बना था, इसलिए लाज़मी था कि खेलों पर भी इसका असर हो। हालांकि क्रिकेट अमीरों का खेल था इसलिए अब्दुल हफ़ीज़ कारदार, आसिफ़ इकबाल, माज़िद खान, इमरान खान, वसीम रजा जैसे अंग्रेज़ीदा लोगों ने इस खेल को धर्म से दूर रखा था। खेल खत्म होते ही पार्टियां यूं शुरू होती थी कि अंग्रेज़ खिलाड़ी बगले झांकने लगते थे।

वक्त बीता और बुरा वक्त आया। 1999 विश्व कप की फाइनलिस्ट पाकिस्तान की टीम 2003 विश्व कप में अपने पांच में से महज 2 मैच, वह भी नामीबिया और नीदरलैंड के खिलाफ जीत कर दौड़ से बाहर हो गयी थी। कोढ़ मे खाज यह कि एक बार फिर भारत के हाथों हार हुई थी।

किस्सा कोताह, वापसी पर कुछ पुराने खिलाड़ियों पर गाज़ गिरनी तय थी। मौके की नज़ाकत समझते हुए वसीम अकरम ने फौरन और वकार यूनिस ने एक साल बाद रिटायरमेंट की घोषणा कर दी। गाज फिर भी पुराने खिलाड़ियों पर गिरना थी। यूनिस खान, इंजमाम, युसूफ योहन्ना, सकलेन मुश्ताक़, मुश्ताक़ अहमद सरीखे खिलाड़ी अब भी बाकी थे और इन्हंे टीम में रहना था, इनकी उम्र रिटायरमेंट की नहीं हुई थी। यहीं से पाकिस्तानी क्रिकेट में जमात की दखल हुई। वह किस्सा तफसील मांगता है। कभी और लिखूंगा। फिलहाल एक मजेदार किस्सा याद आ रहा है।

सईद अनवर अपने निजी कारणों से जमात में पनाह पाने वाले पहले खेलते क्रिकेटर थे। सन् दो हजार एक के बाद जितने साल सईद खेले वह खेल को, अपने और टीम के प्रदर्शन को आसमानी करिश्मा ही कहते रहे। इसके पीछे उनके तजुर्बात थे।

खैर, टीम में दो खिलाड़ी ऐसे भी थे जो अब भी क्रिकेट को इन सब से दूर रखना चाहते थे। पहले युनूस खान जो खुद बहुत अधिक धार्मिक व्यक्ति हैं मगर बक़ौल युनूस धर्म प्रदर्शन की चीज नहीं है, इसलिए वह उसे मैदान तक नहीं लाते थे। दूसरे थे अंग्रेज़ीदां शोएब अख्तर।

एक रोज सईद अनवर को टीम मीटिंग में बुलाया गया। सईद बेमन से आए और कुछ सुनने के पहले ही कहा कि “इन सब मीटिंग से क्या होगा? पाक मन से उसको याद करो। कायनात का मालिक अगर चाहेगा तो परियाँ उतार देगा। वही जीत की बुनियाद तामीर करेंगी।” कहकर सईद टीम मीटिंग से चले गए।

हुआ यह कि पाकिस्तान वह मैच बुरी तरह हार गई। बाद में खाने की टेबल पर शोएब या युनूस ने चुहल करते हुए पूछ दिया कि ‘सईद भाई! हार हो गयी हमारी। वो परियां आयीं नहीं मैच जिताने!’
इतना कहते ही सईद अनवर ने तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया- ‘उसमें मैंने पाकीज़गी की भी बात की थी। तुम्हारा मन तो परियों में लगा था। जीत कहां से होती’!

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