अंटार्कटिका के सूक्ष्मजीवों में भी मिला प्लास्टिक, वैज्ञानिक हैरान

अंटार्कटिका 

पहली बार वैज्ञानिकों को अंटार्कटिका की मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों के अंदर से माइक्रोप्लास्टिक मिला है। सागरों में प्लास्टिक का कचरा होने की जानकारी पहले से ही थी, लेकिन अंटार्कटिका जैसे इंसानी आबादी से दूर-दराज के इलाकों की धरती में भी इसका पाया जाना नई बात है। इससे हैरान वैज्ञानिक कहते हैं कि यहां भी प्लास्टिक पहुंचने का मतलब ये है कि इससे अंटार्कटिका के बेहद नाजुक संतुलन वाले इकोसिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है। ‘बायोलॉजी लेटर्स’ नाम के साइंस जर्मन में छपे शोध में इसका खुलासा हुआ है। इसके लेखक ने कहा है कि अंटार्कटिका की धरती पर मौजूद फूड चेन में प्लास्टिक के पहुंचने से “ध्रुवीय इकोसिस्टम पर और दबाव बनेगा, जो पहले से ही इंसानी दखलअंदाजी बढ़ने और जलवायु परिवर्तन की परेशानियां झेल रहा है।”

माइक्रोप्लास्टिक ऐसे कण होते हैं जिनका आकार 5 मिलीमीटर से भी छोटा होता है। दुनिया भर में नदियों और सागरों में इस समय करीब 15 करोड़ टन प्लास्टिक का कचरा घुला होने का अनुमान है। यह जब लहरों और अल्ट्रावायलेट किरणों के कारण टूट-टूट कर और छोटा हो जाता है तो माइक्रोप्लास्टिक बन जाता है। यह माइक्रोप्लास्टिक सागर के पानी के साथ फिर तलछटी, तटीय इलाकों और समुद्री जीवों में पहुंच जाता है।

इटली की सिएना यूनिवर्सिटी ने रिसर्च टीम का नेतृत्व किया। उन्होंने इलाके के किंग जॉर्ज आइलैंड से लाए गए एक सिंथेटिक फोम के टुकड़े की जांच की, जो लंबे समय से वहां पड़े होने के कारण मॉस और लाइकेन जैसे समुद्री जीवों से लिपटा था। इंफ्रारेड इमेजिंग तकनीक की मदद से रिसर्चरों ने पाया कि इनमें से एक जीव के भीतर पॉलीस्टाइरीन से बने फोम का अंश पहुंचा हुआ था। यह जीव स्प्रिंगटेल कहलाता है और इसका वैज्ञानिक नाम है क्रिप्टोपाइगस एंटार्कटिकस। यह सूक्ष्मजीव अंटार्कटिका क्षेत्र में लगभग उन सब जगहों पर पाया जाता है, जो हमेशा बर्फ से ढंके नहीं रहते। यह जीव लाइकेन और माइक्रो-एल्गी को खाता है। रिसर्चरों ने बताया कि अपने इसी भोजन के माध्यम से माइक्रोप्लास्टिक स्प्रिंगटेल के भीतर पहुंचा होगा। रिसर्चरों का मानना है कि प्लास्टिक इस रास्ते से अब तक अंटार्कटिका की जमीन पर पाए जाने वाले जीवों के पूरे सिस्टम में प्रवेश कर चुका होगा।

प्लास्टिक प्रदूषण से नुकसान

अंटार्कटिका का इलाका पहले से ही जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से अपने ग्लेशियर गंवा रहा है। इसके अलावा रिसर्च पोस्ट, मिलिट्री सेंटर और पर्यटन के कारण बीते सालों में यहां इंसानी गतिविधियां भी काफी बढ़ गई हैं। इसलिए हैरानी नहीं कि साउथ शेटलैंड के द्वीपों में से एक किंग जॉर्ज आइलैंड के आसपास का इलाका “पूरे अंटार्कटिका के सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में से एक” बन चुका हो।

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