राजनीतिक विरोधी भी तय करें हदें

‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है’ इस मुहावरे का इस्तेमाल हम राष्ट्रनीति में नहीं कर सकते। राजनीतिक विरोधियों को भी तय करना होगा कि उनके विरोध की हदें और सरहदें क्या होंगीं? एक लोकतांत्रिक समाज में रहते हुए हमें राजनीतिक विरोध की सीमाएं देखनी ही चाहिए।

– प्रो.संजय द्विवेदी, महानिदेशक, भारतीय जनसंचार संस्थान

य ह चुनी हुई चुप्पियों का समय है। यहां कब बोलना और कब चुप रहना दोनों तय हैं। मीडिया से लेकर राजनीति और बौद्धिक कहे जाने वाले तबकों तक का एक जैसा हाल है, जहां सबने ‘अपने-अपने सच’ तय कर लिए हैं। सच के साथ बेईमानी और सच की मनमानी व्याख्या इस समय का सबसे बड़ा सच है। इस समय ने जमीन पर बहते हुए इंसानी खून के बारे में भी अलग-अलग राय बना दी है। अगर इंसान ‘ए’ है तो प्रतिक्रिया अलग होगी और अगर वह ‘बी’ है तो प्रतिक्रिया अलग होगी। इंसानी खून का बंटवारा कर देने वाला हिंसक समय शायद इस तरह से कभी जमीन पर उतरा हो। एक लोकतंत्र में होते हुए अलग- अलग आवाजों का होना जरुरी है और हमारे समय के साथ परिपक्व होते लोकतंत्र ने हमें यह सहूलियत भी उपलब्ध कराई है। लोकतंत्र में हम असहमति के अधिकार के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास करते हैं, यही लोकतंत्र की सार्थकता है।

खालिस्तान, पाकिस्तान, माओवाद, इस्लामी आतंकवाद जैसे अनेक रूप आज हमारे लोकतंत्र के सामने चुनौती की तरह हैं, क्या सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को पसंद न करने के कारण हम इनमें से किसी की गोद जाकर बैठ जाएंगे?

पहले भी घटनाएं होती थीं, उन पर प्रतिक्रियाएं भी होती थीं। लेकिन ये प्रतिक्रियाएं सहज थीं, स्वाभाविक थीं और मानवीयता के पहलू पर खरी तथा संवेदना के साथ होती थीं। सवाल यह है कि 2014 के बाद ऐसा क्या हुआ कि हम स्वाभाविक तौर पर प्रतिक्रिया करना भी भूल गए और हर मामले में चयनित दृष्टिकोण के साथ बात करने लगे हैं। क्या इससे हम अपने लोकतंत्र की स्वाभाविक भावधारा के साथ न्याय कर रहे हैं, या न्यायपूर्ण समाज बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। इस जमीन पर रहने वाला हर पंथ या मत का व्यक्ति भारतीय या भारतवासी है। उसके सुख-दुख हमारे अपने हैं। उसकी हंसी-खुशी हमारी अपनी है। किंतु ऐसा क्यों है कि हम मरने वाले का पंथ और जाति देखकर प्रतिक्रियाएं करते हैं। क्या इंसानियत की कीमत नहीं रही? क्या राजनीति, हमारी संवेदना और सोच को गुलाम बना चुकी है? कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रधानमंत्री से लड़ते हुए हम इंसानी रिश्तों और अपने जमीर से भी समझौता कर बैठे हैं?

कोई भी चीज पूरी तरह गलत या पूरी तरह सही नहीं होती। लेकिन राजनीतिक पक्ष लेते समय हम मान लेते हैं कि प्रतिद्वंदी गलत ही है। प्रतिद्वंदी को छल, बल या कैसे भी पराजित करना हमारा लक्ष्य बन जाता है। इसमें कुछ भी गलत नहीं। किंतु राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के मैदान अलग हैं, देश हित, देशवासियों के कल्याण और संवेदना के मंच अलग हैं। दोनों को मिलाना ठीक नहीं। ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है’ इस मुहावरे का इस्तेमाल हम राष्ट्रनीति में नहीं कर सकते। वरना हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरूद्ध अभियान चलाते हुए देशविरोधी शक्तियों, भारत विरोधी देशों का साथ ले रहे होंगे। राजनीतिक विरोधियों को भी तय करना होगा कि उनके विरोध की हदें और सरहदें क्या होंगीं? एक लोकतांत्रिक समाज में रहते हुए हमें राजनीतिक विरोध की सीमाएं देखनी ही चाहिए।

‘विरोध के लिए विरोध’ की राजनीति से बुरा कुछ भी नहीं है। सत्ता में रहते हुए जिन कानूनों और जिन मुद्दों का आप समर्थन कर चुके हैं या लागू करने का प्रयास कर चुके हैं, उसे ही सत्ता से बाहर होते ही जनविरोधी बताना एक रणनीतिक और राजनीतिक कार्रवाई के अलावा क्या है? इससे न सिर्फ विकास की राहें रुकती हैं बल्कि सरकारों के विकास संकल्प प्रभावित होते हैं। देशहित से बड़ी कोई कसौटी नहीं हो सकती और देशहित की कसौटी भी अंततः जनहित है। राष्ट्रहित और जनहित कभी अलग-अलग नहीं हो सकते। हमें पता है कि हमारा लोकतंत्र संवाद के सुअवसरों से ही सार्थक होता है। सार्थक संवाद की दिशाएं तय करना और संवाद को तार्किक परिणिति तक ले जाना हमारे लोकतंत्र की विशेषता है। संसद से लेकर नीचे पंचायतों तक यही आदर्श कल्पना हमारा मार्गदर्शन करती रही है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, डॉ. भीमराव आंबेडकर, डॉ.राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी तक हमारे अनेक राष्ट्रनायक ऐसे ही महान जनतंत्र को संभव होते देखना चाहते थे, जिसमें जनता के सवालों पर संसद से लेकर पंचायतों तक बहस हो और उससे एक सुंदर समाज की रचना संभव हो। यहां बहस एक अनिवार्य तत्व है और उसकी कसौटी है राष्ट्रहित। हमें राजनीति को सवालों से बचाना नहीं बल्कि सवालों से टकराने और उनके ठोस और वाजिब हल तलाशने की ओर ले जाना है। यह तभी संभव है जब अंधविरोध, चयनित दृष्टिकोण और विरोध के लिए विरोध की भावना से बचा जा सके। हमारा लोकतंत्र एक लोककल्याणकारी राज्य की कल्पना से संयुक्त है। जिसे महात्मा गांधी ‘राम राज्य’ की अवधारणा से जोड़ते हैं। जिसमें राज्य एक आदर्श की तरह हमारे सामने हैं। गोस्वामी तुलसीदास इसी राम राज्य की व्याख्या करते हुए लिखते हैं-दैहिक, दैविक, भौतिक तापा, राम राज काहुंहिं नहीं व्यापा/सब नर चलहिं परस्पर प्रीती, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति। इस तरह राज्य में समाजवाद, समता, समरसता, सुशासन के गुण जुड़े हुए दिखते हैं। समाज को न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में लगातार हमारी संस्थाएं काम कर रही हैं। इसलिए सर्वे भवंतु सुखिनः का मंत्रघोष दरअसल एक कल्याणकारी राज्य का उद्धोष भी है। यह भी विचार का विषय है कि लोकतंत्र में होते हुए हमारा उद्देश्य अंततः लोकमंगल है। लोकमंगल शब्द में ही समावेशी और सर्वग्राही विचार हैं। यहां चयन की आजादी नहीं है। न ही चयनित दृष्टिकोण को यहां मान्यता है।

अंध विरोध और अंध समर्थन दोनों गलत है। हमारी संस्कृति कहती है अति सर्वत्र वर्जयेत्। 2014 के बाद का भारत एक अलग तरह का भारत है। इसे हम ‘आकांक्षावान भारत’ भी कह सकते हैं। जिसमें भारतीय समाज नई तरह से करवट ले रहा है। तेज गति से बदलता हुआ भारत अब अपने सपनों में रंग भरना चाहता है। हमारी विविधता और बहुलता को व्यक्त करने और स्थापित करने के लिए हमारी आध्यात्मिक चेतना का साथ जरूरी है। हमें यह सत्य समझना होगा कि भारत भले भौगोलिक रूप से एक न रहा हो, किंतु वह एक सांस्कृतिक धारा का उत्तराधिकारी और सांस्कृतिक राष्ट्र है। आज के समय में जब पूरी दुनिया एक सांस्कृतिक और वैचारिक संकट से गुजर रही है, तब भारत का विचार ही उसे दिशा दे सकता है। क्योंकि यह अकेला विचार है, जिसे दूसरों को स्वीकार करने में संकट नहीं है। शेष सभी विचार कहीं न कहीं आक्रांत करते हैं और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों से भरे-पूरे हैं। भारत दुनिया के सामने एक मॉडल की तरह है, जहां विविधता में ही एकता के सूत्र खोजे गए हैं। स्वीकार्यता, अपनत्व और विविध विचारों को मान्यता ही भारत का स्वभाव है। इस देश को जोड़ने वाली कड़ी ही ‘लोक’ है। यह अध्ययन करने की जरूरत है कि आखिर वह क्या तत्व हैं, जिन्होंने इस देश को जोड़ रखा है। वे क्या लोकाचार हैं, जिनमें समानताएं हैं। वे क्या विचार हैं जो समान हैं? समानता के ये सूत्र ही अपनेपन का कारण बनेंगे। भारतीयता की वैश्विक स्वीकृति का कारण बनेंगे। इससे अलग तोड़ने के भी अनेक सूत्र हैं। समाज को खंड-खंड में बांटकर देखा जा सकता है और उसके बीच मतभेद और वैमनस्य पैदा किए जा सकते हैं। इससे लाभ क्या है? अपने समाज को लड़ाकर, अपनी व्यवस्थाओं से भरोसा उठाकर, अपने तंत्र को नाकाम बनाकर हम किसकी मदद कर रहे हैं? एक पूरा तंत्र जिसका स्वयं लोकतंत्र में भरोसा नहीं है, आम लोगों में लोकतंत्र के प्रति अविश्वास पैदा कर भारतीय गणतंत्र को कमजोर करना चाहता है। विदेशी धन, विदेशी विचार, राजनीतिक षड्यंत्रों के आधार पर काम करना और पकड़े जाने पर लोकतंत्र व मानवाधिकार की दुहाई देना एक फैशन बन गया है। हालात यहां तक हैं कि गंभीर अपराधों की जांच के पहले ही व्यक्ति को तथाकथित बौद्धिक तबकों से समर्थन मिलना प्रारंभ हो जाता है। क्या व्यक्ति की आयु, वंश, जाति, भाषा देखकर उसे उसके किए गए अपराधों से मुक्त कर दिया जाना चाहिए, यह प्रश्न भी व्यवस्था के सामने हैं। एक मित्र ने कहा कि यह तो ऐसा ही है कि पति की हत्या के आरोप में जेल गयी स्त्री को यह कहकर सहानुभूति का पात्र बताया जाए कि वह बेचारी विधवा है, उसका उत्पीड़न गलत है।

खालिस्तान, पाकिस्तान, माओवाद, इस्लामी आतंकवाद जैसे अनेक रूप आज हमारे लोकतंत्र के सामने चुनौती की तरह हैं, क्या सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को पसंद न करने के कारण हम इनमें से किसी की गोद जाकर बैठ जाएंगे? नागरिकता कानून से लेकर दिल्ली दंगों तक एक पूरी क्रोनोलाजी साफ दिखती है, जिसमें सरकार के नहीं, सत्ता के नहीं- इस महान राष्ट्र और उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं को निशाना बनाने के प्रयास नजर आते हैं। मोदी से राजनीतिक मैदान में जीतने की शक्ति नहीं है तो क्या हम देशतोड़क अभियानों में शामिल हो जाएंगे, यह सवाल हम सबके सामने है, पूरे देश के सामने। चयनित चुप्पियों और चयनित हंगामों के बीच लोकतंत्र और मूल्यों की रक्षा की जिम्मेदारी हम सबकी है। हर एक नागरिक की है, जिनका भरोसा आज भी लोकतंत्र और इस देश की महान जनता के ‘सहज विवेक’ पर कायम है।

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