लॉक डाउन में पोल्ट्री फॉर्म को नहीं मिल रहा मुर्गियों का दाना, हजारों को दफनाया

संतोष शितोले | इंदौर

लॉक डाउन का असर मुफ्त में भी नहीं ले रहे थे लोग, कई मुर्गियों को गांवों में छोड़ने को मजबूर हुए विक्रेता, अब पोल्ट्री हॉउसों पर मात्र 10 फीसदी ही मुर्गियां, कई पॉल्ट्री फार्म संचालकों के फार्म बंद होने की कगार पर

चीन से फैली महामारी का इंदौर में इतना व्यापक स्तर पर दुष्परिणाम होगा इसकी किसी को कल्पना नहीं थी। इंदौर में हमेशा शीर्ष पर रहा पोल्ट्री उद्योग कोरोना, लॉक डाउन व कर्फ्यू के चलते लगभग क्रैश हो गया है। लॉक डाउन में मक्का-सोया से बने मुर्गियों का भोजन सप्लाय नहीं होने से 12 लाख से ज्यादा मुर्गियां दाना-पानी को तड़पती रही। मुफ्त में भी जब लोगों ने नहीं लिया तो मुर्गियों को गांव व खेतों में छोड़ दिया। इंदौर, सांवेर, राऊ, महू व आसपास के पोल्ट्री संचालकों की मानें तो तीन महीने में अब तक हजारों मुर्गियों को काटकर दफना दिया। यह संख्या लाखों में भी हो सकती है। अब स्थिति यह कि पोल्ट्री फॉर्म हॉउसों पर मात्र 10 फीसदी (करीब सवा लाख) मुर्गियां ही बची हैं।

इंदौर पोल्ट्री फॉर्म फेडरेशन के अध्यक्ष इंद्रजीतसिंह नय्यर ने बताया कि दिसंबर से ही चमगादड़ और पक्षियों में संक्रमण के झूठी खबरों से धंधे पर असर पड़ गया था। अब मात्र एक-डेढ़ लाख मुर्गियां ही हैं जिनकी भी प्रोफेशनल लाइफ खत्म हो चुकी है। अब तो यह कहना भी मुश्किल है कि दोबारा यह उद्योग जल्द उबर पाएगा या नहीं क्योंकि लाखों का घाटा खा चुके अधिकांश पोल्ट्री फॉर्म हॉउस संचालक-किसान अब यह धंधा बंद कर दूसरा विकल्प खोज रहे हैं।

प्रोफेशनल लाइफ, कोरोना, दाना और घाटे का फण्डा

दरअसल हेचरी (चूजे तैयार होने वाला स्थान) से जब पोल्ट्री हॉउस को सप्लाय किए जाते हैं तो इनका वजन 40 ग्राम होता है। पहले ये 90 दिनों तक परिपक्व होकर एक से डेढ़ किलो वजनी हो जाते थे और फिर पोल्ट्री फॉर्म हॉउस का उक्त लॉट मार्केट में सेल कर फिर नए चूजे 90 दिन दिन तक रखे जाते थे। इस दौरान इन्हें तीन बार वैक्सिन (एक 8 रु. का) लगाए जाते थे। संचालकों के मुताबिक इनका फीड (भोजन) 3200 रु. क्विंटल है। समय के साथ इनके आहार में बदलाव आया और कंपनियों द्वारा तैयार किए जाने फीड 70 फीसदी मक्का, 20 फीसदी सोयाबीन और बाकी 10 फीसदी में मछली का पाउडर, केमिकल, मिनरल, विटामिन आदि से बनने लगा। इससे अच्छी खुराक होने से जो बायलर पहले 90 दिनों में बनता था अब 20-25 दिनों में 40 ग्राम चूजे से 1800 ग्राम तक वजन का बनने लगा। इस अवधि उसकी करीब तीन किलो खुराक होती है। इस तरह एक बायलर 100-125 रु. में तैयार होता है जो बाजार में 140 रु. से 170 रु. तक बिकता था।

इंदौर में रोजाना 55 हजार से ज्यादा मुर्गियों की खपत

इंदौर में छोटे-बड़े करीब 400 पोल्ट्री हॉउस हैं। नवंबर तक यह स्थिति थी कि सालों से हर रोज 50—55 हजार मुर्गा-मुर्गियों की सप्लाय इंदौर में होती थी। शनिवार-रविवार तक तो 90 हजार तक हो जाती थी। ये चिकन खण्डवा रोड, असरावद खुर्द, मोरोद, माचल, राऊ, सांवेर, महू, मांगलिया, गांधी नगर, अहीरखेड़ी स्थित फॉर्म हॉउसों से शहर के खेरची कारोबारियों, होटलों व ढाबों तक पहुंचते थे। इस तरह हर माह 15 लाख से ज्यादा चिकन की शहर की खपत होती थी।

दिसंबर से हो गए थे आधे दाम, अब उद्योग बंद करने की तैयारी

पोल्ट्री फॉर्म संचालक मो. अफजल, मो. नजीम व अकरम के मुताबिक यूं तो लॉक डाउन के पहले से ही मार्केट में उठाव नहीं था। यही कारण है कि 140 रु. प्रति किलो वाला चिकन दिसंबर में 70 रु. किलो तक बिका लेकिन फिर 15 रु. किलो और अब तक मुफ्त में भी लोग लेने को राजी नहीं हैं। इसके चलते उद्योग बंद कर दिया है।

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