स्वतंत्र भारत में प्रधानमंत्री नेहरू का देश को आह्वान

आनंद मोहन माथुर

पाकिस्तान गैर मुस्लिमों के साथ कितना भी बुरा व्यवहार करे, लेकिन हमको मुस्लिमों से सभ्य व्यवहार करना चाहिए। हमें उन्हें एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की तरह सुरक्षा और अधिकार देना चाहिए, अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमारा सारा समाज ज़हरीला हो जायेगा और ये ज़हर हमारा विनाश कर देगा।

जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री के तौर पर जब इस देश की कमान संभाली, उस समय पंजाब और बंगाल का विभाजन हो चुका था और उत्तर भारत बदहाल स्थिति में था। नेहरू ने इसको नियंत्रण में करने का प्रयास किया और अगर वो न करते तो हजारों मासूम लोगों की जिंदगी दंगो की भेंट चढ़ जाती, लाखों की सम्पत्ति बर्बाद हो जाती, संचार के माध्यम टूट जाते खाद्यान की सप्लाई अव्यवस्थित हो जाती और महामारी फैल जाती।

नेहरू ने विचार व्यक्त किए कि उन्हें ये मालूम है कि एक भावना इस देश में फैली है कि केन्द्र सरकार कमजोर है, और वो मुसलमानों तुष्टीकरण कर रही है। उनकी यह सोच पूरी बकवास थी, न कमज़ोरी का सवाल था न तुष्टीकरण का। इस देश में मुस्लिम अल्पसंख्यक इतनी संख्या में है कि यदि वो कहीं जाना भी चाहे, तो नहीं जा सकते, उन्हें इसी देश में रहना है। पाकिस्तान गैर मुस्लिमों के साथ कितना भी बुरा व्यवहार करे लेकिन हमको मुस्लिमों से सभ्य व्यवहार करना चाहिए। हमें उन्हें एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की तरह सुरक्षा और अधिकार देना चाहिए, अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमारा सारा समाज ज़हरीला हो जायेगा और ये ज़हर हमारा विनाश कर देगा। उस समय की परिस्थिति को देखते हुए यह बड़ा आवश्यक था कि नौकरशाही हिन्दू मुस्लिम भावना से ऊपर ऊपर उठे और नेहरू उसे कायम रखना चाहते थे। वो चाहते थे कि नौकरशाही सरकारी नीतियों का ईमानदारी से पालन करे और खासतौर पर अल्पसंख्यकों के साथ एक न्यायपूर्ण और निष्पक्ष व्यवहार करें।

उस समय महॅंगाई बढ़ रही थी और खुदरा कीमतें ज्यादा बढ़ रही थीं। इसका कारण यह नहीं था कि बाजार में मुद्रा चलन बढ़ गया था लेकिन इसका कारण यह था कि उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन घट गया था। नेहरू का यह कहना था कि हर संभव ऐसे प्रयास किये जाना चाहिए जिससे उत्पादन बढ़े और महॅंगाई की दर कम हो।

देश और नागरिकता : नेहरू का यह सपना था कि हिन्दुस्तान एक ऐसा देश हो जिसमें सभी व्यक्ति और सभी समाज बराबरी से रह सके। नेहरू सम्प्रदायिक राजनीति और सुद्र राष्ट्रवाद के खतरों को समझते थे। वर्गगत राजनीति चाहे वो धर्म या जाति या भाषा, किसी पर आधारित हो वो हानिकारक थी और देश की एकरूकता नहीं रख सकती थी, यदि एक छोटा सा वर्ग भी अपने आप को समाज से वंचित समझ ले। नेहरू को यह बात समझ में आ गई थी कि बहुत से पिछड़ा वर्ग का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। नेहरू ने मुस्लिम सम्प्रदायवाद पर भी यदाकदा टिप्पणी की है लेकिन उनका ज्यादा ध्यान हिन्दू और कुछ हद तक सिख सम्प्रदायिक ताकतों की तरफ था।

नेहरू का यह मानना था कि सरकार एक व्यक्तियों का समूह नहीं है बल्कि उसके कुछ आदर्श और नीतियाँ होती हैं, यदि कोई व्यक्ति या ग्रुप इनको चुनौती देता है तो हमको उसका मुकाबला पूरी ताकत से करना होगा।

देश को खतरा बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक है। अराज़क एवं सांप्रदायिक संगठन आजाद भारत के ढांचे को गिराना चाहते हैं वो इस बात को नहीं समझते हैं कि अगर ये गिरना शुरू हुआ तो हम सब उस ढांचे के नीचे दब जायेंगे।

आर.एस.एस. कुछ राज्यों में बड़े प्रदर्शन की सोच रहीं है जबकि धारा 144 लागू है। आर.एस.एस एक ऐसा संगठन है जो निजी फौज़ की तरह है और नाज़ियों के पदचिन्हों पर चल रहा है। हम नागरिक अधिकारों में हस्तक्षेप के विरूद्ध हैं किंतु यह भी बर्दाश्त नहीं कर सकते कि बड़ी संख्या में लोग हथियारों की टेनिंग लें जिससे वो ऐसे कामो में प्रयोग कर सकें जो देश नहीं चाहता।

कुछ राज्य सरकारों ने आर.एस.एस के ऐसे साहित्य जो दो सम्प्रदायों के बीच में नफरत फैलाते हैं उनके खिलाफ कार्यवाही की है। आर.एस.एस. के अखबार उतने ही दोषी हैं जितने पाकिस्तान के बाहर दूसरे अखबार।

नाजी आंदोलन जो ज़र्मनी से शुरू हुआ उसकी जानकारी मुझे है। यह आंदोलन उन लोगों के द्वारा शुरू किया गया जो निम्न मध्यम वर्ग के थे। ये लोग इतने बुद्धिमान भी नहीं थे कि वो इन लोगों के जाल में न फंसे। नाज़ी पार्टी के जो प्रोग्राम होते थे वो बड़े सादगी भरे। जिनमें दिमाग लगाने की कोई आवश्यकता नहीं होती थी। इसी नाजी पार्टी ने जर्मनी का सर्वनाश किया।

मुस्लिम सम्प्रदायवाद कमजोर हो चुका था। हमें हिन्दुस्तान में हिन्दू और सिख सम्प्रदायवाद से निपटना था जो अधिक से अधिक आक्रमक हो रहा था। जो भी भयावह कांड देश में हुए उसमें महत्वपूर्ण भूमिका आर.एस.एस की थी। आर.एस.एस के नेता कहते हैं कि हम राजनैतिक पार्टी नहीं हैं लेकिन अगर गौर से देखा जाए जो इनकी नीति और प्रोग्राम राजनैतिक है और सम्प्रदायिक तथा हिंसक गतिविधियों पर आधारित है।

वर्तमान सरकार पक्षपात कर रही है। जनरल रावत को जब सेनाध्यक्ष बनाया गया तब 4 या 5 लेफ्टिनेंट जनरल रावत से सीनियर थे। जनरल रावत के लिए चीफ ऑफ आर्मी स्टॉफ का नया पद सृजित किया गया और उनकी नियुक्ति की गई। वह इसलिए किया गया क्योंकि जनरल रावत प्रधानमंत्री की पसंद थे। फौज से यह छेड़छाड़ आजादी के बाद मेरी राय में पहली बार हुआ है। शायद खाड़ी देशों की तरह तख्तापलट भी हो सकता था।

फौज में हस्तक्षेप नहीं : एक प्रस्ताव आया कि फौज़ की जो बटालियंस है उनको प्रदेश का नाम दे देना चाहिए लेकिन इस देश में प्रादेशिक भावना काफी मात्रा में है। फौज़ को एक संगठित भारतीय फौज़ होना चाहिए न कि प्रदेशों की फौजो का एक संकलन। हमें फौज़ से छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। फौजी मामलों में निष्पक्षता एवं मारदर्शिता होना चाहिए।
देश के उस समय हालात : इस समय देश में जो हालात हैं वो ऐसे हैं कि हम ज्वालामुखी के मुंह पर बैठे हुए हैं और यदि बदला और उसका बदला लेना यही चलता रहा तो यह एक बुरा चक्र है, हम इससे कभी बाहर नहीं निकल सकेंगे।

हिंदू महासभा आर.एस.एस वगैरह अखंड भारत की बात करते हैं लेकिन क्या ये वर्तमान परिस्थिति में संभव है। ऐसा करने से नई और भयंकर समस्याएं पैदा नहीं होगी।
वफ़ादारी मोहब्बत और सद्भाव से पैदा होती है।

सांप्रदायिक संस्थाओं की तरफ से यह कहा जाता है कि भारत के मुसलमानों से निष्ठा की गारंटी ली जाए और उनमें से कुछ का जो पाकिस्तान की तरफ झुकाव है उसकी भर्त्सना की जाए। नेहरू समझते थे हिन्दुस्तानी मुसलमान की वफ़ादारी पर हमेंशा जोर देना गलत है, वफ़ादारी सरकारी आदेश निकालने से या उन्हें डर बताने से नहीं पैदा की जा सकती, वफ़ादारी अच्छे वातावरण की भावना का नाम है और भावना के साथ वफादार का फायदे का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। अतएव हमको ऐसे वातावरण और परिस्थितियों का निर्माण करना होगा, जिससे वफ़ादारी अपने आप पैदा हो। आलोचना या तंज़ कसने से कोई वफ़ादारी ज़बरदस्ती नहीं लाई जा सकती।

हमारी एक दीर्घकालीन नीति होना चाहिए जिसके द्वारा अल्पसंख्यकों को घरेलू वातावरण में बहुमत और अल्पमत का राजनीतिक जो फर्क है इसको मिटा दें तभी जाकर एक मज़बूत भारत बन सकता है। यदि अल्पसंख्यकों को अपना उचित स्थान इस देश में देना है और उनसे उनके फर्ज़ का पालन करवाना है तो उन्हें सरकार और निजी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व देना होगा। लोग कहते हैं कि साम्प्रदायिकता और अलगाववादी बड़े मसले नहीं है बल्कि सबसे बड़ी समस्या गरीबी और बेरोज़गारी की है। यह बात सच है, लेकिन इस समस्या को सुलझाने के लिए एकता की भावना आवश्यक है। यदि अलगाववाद और सांप्रदायिक विचारों का प्रसार हुआ तब मुख्य समस्या सुलझाना बड़ा मुश्किल है।

देश के कुछ लोग यह समझते हैं कि आदिवासी लोगों के रीति रियाज़ और रहन सहन का तरीका बाकी लोगों से अलग है और उन लोगों का एकीकरण शेष भारत के लोगों के साथ होना चाहिए। यह उचित नहीं है, इससे ज्यादा झगड़े और परेशानियां होंगी क्योंकि हजारों वर्षो से वो अपने आप को अपनी तरह से आये और उनकी इच्छा के अनुसार विकास करना चाहते है, उन लोगों को यह बताना है कि वो शासित है और बाकी लोग शासक है तो जो लोग हमारी सरहद पर रहते है वो अलग हो जायेंगे।

बँटवारे के बाद भाषा का प्रश्न मुख्य रूप से देश के सामने आया। बँटवारे के पहले पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश और कई प्रदेशों के कई जिलों में उर्दू बोली और लिखी जाती थी तथा सरकारी व अदालती काम काज उर्दू में होता था। उर्दू के प्रति नफरत सांप्रदायिक संगठन व नफ़रत राजनीतिक कारणों से शुरू की। लोग उर्दू के शैदाई थे गोपाल दास नीरज तभी मशहूर हुए जब उन्होनें हिंदी में गजल लिखना और पढ़ना शुरू किया गजल उर्दू की शहजादी है। उर्दू ने हिन्दुस्तान में अपना महत्वपूर्ण रोल अदा किया है। आजादी का आंदोलन, 1857 की क्रांति इसका प्रमाण है और अब ये प्रचारित किया जा रहा है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है इसलिए हिन्दू लोग उर्दू का विरोध करें। आनंद नारायण मुल्ला, कृष्ण बिहारी नूर, कृथनचंदर अनेक उर्दू हिन्दी की प्रतिद्वंद्वी नहीं है वरन हिन्दी को मजबूत करने वाली जबान है। बँटवारे के पहले यूपी में द्विभाषी फार्मूला चलता था जिसके अंतर्गत यदि पहली भाषा उर्दू ली है तो दूसरी भाषा हिन्दी लेना होती थी और यदि पहली भाषा हिन्दी होती थी तो दूसरी उर्दू लेना होती थी।

राष्ट्रवाद वो भावना है जो व्यक्ति और राष्ट्र को विशाल ह्रदय और सहनशील बनाता है, जब देश गुलाम होता है तो राष्ट्रवाद गुलामी से लड़ने के लिए एक एकता का काम करता है लेकिन आजादी के बाद एक ऐसी स्थिति आती है, जब राष्ट्रवाद सिकुड़कर रह जाता है। यूरोप को अगर देखें, तो यह तर्जुबा है कि राष्ट्रवाद आक्रमक होकर अपने आप को दूसरे देशों और लोगों से श्रेष्ठ समझता है। कई बार ऐसा हुआ है कि जब यह किया गया है तो ऐसे राष्ट्र अपने वजन के नीचे खुद की दब गए है और उनका विनाश हुआ है। ऐसे राष्ट्रवाद के दो नमूने हैं एक है जर्मनी औैर दूसरा है जापान। ऐसे राष्ट्रवाद का जन्म उस राष्ट्र में होता है जहां बहुसंख्यक ये सोचते हैं कि हम ही राष्ट्र हैं और अल्पसंख्यकों को अपने साथ रहने के प्रयास में उनको दूर कर देते हैं। हमें बहुत सावधान रहना है क्योंकि हमारी परंपरा हिन्दू धर्म की त्रासदी जातिवाद है। सांप्रदायिक संगठन इस विचार के स्पष्ट उदाहरण है जो राष्ट्रवाद के नाम पर संकुचित विचार रखते हैं और एकता के नाम पर वे एक दूसरे को अलग कर लेते हैं और विनाश की ओर चले जाते हैं।

यह अच्छा नहीं है कि बहुसंख्यक, अल्पसंख्यकों की आलोचना करते रहें और उनसे कहें कि वो ढंग से रहें और वही मानें जो वह चाहते थे। यह बहुसंख्यकों का कर्तव्य है कि वो अल्पसंख्यकों के साथ प्रेम और सदव्यवहार से उनकी सद‌्भावना अर्जित करे। भारत में बहुसंख्यक अल्पसंख्यको के साथ संकुचित व्यवहार करते हैं बिना यह सोचे हुए कि इसके बुरे परिणाम दूरगामी होंगे।

भारतीय नागरिकता कानून 1955 : नेहरू ने भारतीय नागरिकता कानून 1955 बनाया औैर इस एक्ट के अंतर्गत नागरिकता पैदाईश से, उत्तराधिकार से, रजिस्ट्रेशन से तथा अभूतपूर्व कार्यकाल से मिल सकती है। जो लोग 26 जनवरी 1950 से पहले पैदा हुए है, उत्तराधिकार से उसके कोई भी माता-पिता में से एक हिन्दुस्तान का नागरिक है, रजिस्ट्रेशन से नागरिकता की शर्तोँ के अनुसार व जिन्होंने ज्ञान, दर्शन, कला, साहित्य वगैरह में अभुतपूर्व कार्य किया है।

मोदी की भाजपा सरकार का जब दूसरा कार्यकाल आया तब 2019 का संशोधन आया और धारा 2 में ये जोड़ा गया कि मुस्लिम को छोड़कर अन्य कोई धर्म वाला अफग़ानिस्तान, बंग्लादेश या पाकिस्तान से 31 दिसम्बर 2014 के पहले भारत में आया है तो उसे नागरिक माना जाएगा। मोदी की भाजपा सरकार नेहरू के नीति के विपरीत कार्य करने पर उतारू है, वो चाहते हैं कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को अलग-थलग कर दिया जाए और बहुसंख्यक संप्रदाय तथा छोटे-मोटे अल्पसंख्यक संप्रदाय मुस्लिम संप्रदाय से अपने आप को अलग कर लें। मुस्लिमों को आतंकवादी की तरह भाजपा की बहुसंख्यक वर्ग की सरकार के लोगों ने पेश किया है। कश्मीर के लोग, जिनको सरदार पटेल ने धारा 370 संविधान में स्थापित करवा कर स्वायत्तता दी थी, उसे एक सबक सिखाने वाला कार्य किया है। इस सरकार ने जले पर बजाए मरहम लगाने के नमक छिड़का है। जर्मनी के नाज़ियों की तरह लगभग 90 लाख कश्मीर के बहुसंख्यक मुस्लिम सम्प्रदाय के लोगों को कर्फ्यू लगाकर घर में बंद कर दिया है। नेहरू की नीति थी कि प्रेम और सदभावना से बहुसंख्यक हिन्दू संप्रदाय, अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को विश्वास में ले उनका दिल जीते और अपनी तरह से उनको भी इस देश का नागरिक समझे लेकिन 2019 में जो संशोधन किए गए उसमें एक नेशनल रजिस्टर बनाने का नियम और प्रावधान किया गया और हर राज्य में लिस्ट बनाने का प्रावधान किया गया। इसमें जो सवाल हर एक नागरिक से पूछना थे उनका विवरण दिया गया है तथा अगर अधिकारी को उत्तरों से संतोष न हो तो संदिग्ध रजिस्टर में उसका नाम डाला जा सकता है और यदि इससे उसके नाम नहीं हटता है तो उसे डिटेंशन सेंटर में जेल में डाल दिया जायेगा। यह सब देश को तोड़ने की बात की जा रही है। देश के मुस्लिमों को भेदभाव, अलगाववाद, दंगा फसाद से परेशान किया जा रहा है औैर उनको प्रथम नागरिक के बजाए द्वितीय नागरिक बनाने की साजिश की जा रही है। नेहरू ने इस देश के प्रत्येक नागरिक को अपने कार्यो से यह भावना पैदा करने की सलाह दी कि मुस्लिम भी उतना ही देश का वफादार नागरिक है जितना हिन्दू है, लेकिन मोदी नेहरू के नीति के बिल्कुल उल्टा काम कर रहे है, यह जानते हुए भी कि ये देश मुस्लिम समुदाय के बिना न जीवित रह सकता है न विकास कर सकता है।

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