राहत को राहत न मिली फिल्मी गीतों से

विनोद नागर

फिल्मों में गाने लिखने के लिए कवियों और शायरों का मुंबई रुख करना आम बात रही है। इस सिलसिले में कवि प्रदीप, पंडित नरेन्द्र शर्मा और नीरज से लेकर इन्दीवर, माया गोविन्द, विश्वेश्वर शर्मा, संतोष आनंद, योगेश, समीर, रानी मलिक और अभिलाष तक ढेरों नाम सामने आ जाते हैं। कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवीं, शकील बदायूँनी, हसरत जयपुरी, नक्श लायलपुरी जैसे गीतकार शायरी में नाम कमाने के बाद ही फिल्मों में गाने लिखने के लिए बम्बई पहुंचे थे। शायर के साथ उसके गाँव/ शहर का नाम जुड़ा होने से उस शहर/ कस्बे का इकबाल भी बुलंद होता है।

मायानगरी में कवि प्रदीप, असद भोपाली, जाँनिसार अख्तर, बालकवि बैरागी, दुष्यंत कुमार, विट्ठलभाई पटेल, निदां फाजली, नूर देवासी, सूरज उज्जैनी, स्वानंद किरकिरे जैसे स्वनामधन्य कलमकारों के अलावा जिस मकबूल शायर ने फ़िल्मी गीतों से बॉलीवुड में मध्यप्रदेश और खासकर इन्दौर का नाम रोशन किया उनमे डॉ. राहत इन्दौरी का नाम प्रमुख है। हालाँकि राहत को बॉलीवुड ज्यादा रास नहीं आया और एक दशक में ही वे शायरी की अपनी पुरानी दुनिया की खिदमत करने लौट आये।

शायद संगीतकारों की बनाई धुनों के मीटर पर गाने लिखने के बजाय उन्होंने शायरी के जरिये अवाम का दिल जीतना बेहतर समझा। अपने गृहनगर इन्दौर में दस अगस्त को कोरोना संक्रमित होने पर इलाज के लिए अस्पताल में दाखिल राहत इन्दौरी ने अगले ही दिन दिल का दौरा पड़ने के बाद इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया।
इन्दौर में जन्मे और पले बढ़े राहत इन्दौरी (असली नाम राहत कुरैशी) का बचपन अभावों में बीता था। प्रारंभिक दिनों में आजीविका के लिए वे पेंटर भी बने मगर शायरी का हुनर परवान चढ़ता रहा। पलासिया के आईकेडीसी (इस्लामिया करीमिया डिग्री कॉलेज) में जहाँ वे खुद पढ़े वहीं उन्होंने प्राध्यापक के रूप में विद्यार्थियों को पढ़ाया भी और विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि हासिल की।

इन्दौर के रानीपुरा झंडा चौक से इस्लामिया करीमिया में पढ़ाते हुए जब वे डॉक्टर राहत इन्दौरी हो गये तब भी हर दौर में उनका अक्खड़पन उनके मिजाज़ पर हावी रहा। उनका नाम राहत जरूर था, पर शायर के बतौर एक बेचैन आत्मा उनके अंदर समाई हुई थी। कभी यह बेचैनी फिरकापरस्ती को लेकर आग उगलती, तो कभी इन्सानियत के तकाजों के सन्दर्भ में बेबाकी से उभरकर सामने आती।

सामाजिक दुश्वारियों पर चोट करने की दबंगई आगे चलकर उनकी शैलीगत पहचान बन गई थी। इसी लिए जन सरोकारों के इस निर्भीक शायर को मुशायरों में पढ़ने के लिए दुनियाभर में पूरे ऐहतराम से बुलाया जाता था। हर उम्र के दीवानावार श्रोताओं की अपार भीड़ राहत इन्दौरी को उनकी खास फायरब्रांड शैली में सुनने के लिए उमड़ पड़ती थी।

दीगर शायरों की तरह राहत इन्दौरी ने भी अपने नाम के साथ शहर के नाम को हमेशा के लिए चस्पां कर लिया था। असद भोपाली और नूर देवासी की तरह राहत इन्दौरी ने भी बॉलीवुड में फिल्मों में गाने लिखकर मालवांचल के शहरों का नाम चमकाया। 90 के दशक में लोकप्रिय हुए मधुर फ़िल्मी गीतों में से कुछ गीत उन्हीं की कलम ने रचे थे।

पहली फिल्म सर (1993) से आखिरी फिल्म बेगम जान (2017) के दरम्यानी चौबीस सालों में उन्होंने छत्तीस फिल्मों में बहत्तर गीत लिखे। इसे संयोग ही माने कि दो फिल्मों मिशन कश्मीर और मीनाक्षी को छोड़कर शेष सभी फिल्मों में राहत इन्दौरी के गीतों को संगीत से सँवारने का काम बड़बोले संगीतकार अन्नू मलिक ने किया।

राहत इन्दौरी फाउंडेशन के सौजन्य से आने वाली पीढ़ियों को राहत इन्दौरी डॉट कॉम नामक उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर राहत के गौरवशाली अतीत से वाबस्ता होने का सुख मिल सकेगा। सत्तर वर्षीय राहत इन्दौरी के यूँ अचानक गुजर जाने से झन्नाटेदार शायरी का राहत युग समाप्त हो गया है। हाल के दशकों में मुशायरों का जबरदस्त आकर्षण रही बुलंद आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गयी है। जुदाई की भरपाई अब सिर्फ रि-प्ले के बटन से हो सकेगी..!

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