रायपुर: सभी निकायों में दाह संस्कार में गौ-काष्ठ एवं कण्डे के उपयोग को प्राथमिकता देने के आदेश

रायपुर छत्तीसगढ़ के सभी निकायों में दाह संस्कार में गौ-काष्ठ एवं कण्डे के उपयोग को प्राथमिकता देने के आदेश सरकार की तरफ से ज़ारी किए गए है,यही नहीं बल्कि चौक-चौराहों पर जलाए जाने वाले अलाव में गौ-काष्ठ, गोबर के कण्डे के उपयोग को अनिवार्य किया गया है।

नगरीय निकाय मंत्री की अनुसंशा पर राज्य शासन द्वारा इस संबंध में सभी निगम आयुक्त और नगर पालिका और नगर पंचायत के सीएमओं को निर्देश जारी कर दिए गए हैं।गोठानों से निकलने वाले गोबर और पशुपालकों से खरीदे जाने वाले गोबर का उपयोग जैविक खाद के अलावा गोबर काष्ठ बनाने में किया जाता है। प्रदेश के  नगरीय निकाय के अंतर्गत प्रदेश भर में 377 गोठान स्वीकृत है। जिसके अंतर्गत 169 स्व-सहायता समूह की महिलाएं कार्य कर रही है।

इन गोठानों में जैविक खाद के अलावा गौ-काष्ठ और कण्डे भी बनाए जा रहे हैं। कुल 141 स्थानों में गोबर से गौ काष्ठ बनाने मशीनें लग चुकी है। गोबर से निर्मित गौ-काष्ठ एक प्रकार से गोबर की बनी लकड़ी है। इसका आकार एक से दो फीट तक लकड़ीनुमा रखा जा रहा है। गौ-काष्ठ एक प्रकार से कण्डे का वैल्यू संस्करण है।

नगरीय निकाय क्षेत्रो में अलाव और दाह संस्कार में लकड़ी के स्थान पर गौ काष्ठ के उपयोग को बढ़ावा देने से वैकल्पिक ईंधन के उत्पादन में गति आएगी।रायपुर जैसे शहर में 12 से 30 दाह संस्कार प्रतिदिन होते हैं। एक दाह संस्कार में अनुमानित 500 से 700 किलो लकड़ी का उपयोग होता है। अलाव और दाह संस्कार में लकड़ी को जलाए जाने से भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन होता है, जो कि पर्यावरण के लिए अनुकूल नहीं है। यदि गौ काष्ठ का उपयोग लकड़ी के स्थान पर किया जाए तो महज 300 किलों में ही दाह संस्कार किया जा सकता है। इससे प्रदूषण भी नहीं फैलता है।प्रदेश के नगरीय निकायों में ठंड के दिनों में लगभग 400 अलाव चौक-चौराहों पर जलाए जाते हैं। चौक चौराहों में नगरीय निकाय द्वारा सूखी लकड़ी का उपयोग अलाव के लिए किया जाता था। अलाव के रूप में लकड़ी का उपयोग होने से पेड़ कटाई को बढ़ावा और पर्यावरण को भी नुकसान पहुचता था।अलाव में गौ-काष्ठ का उपयोग होने से इसके कई फायदे होंगे। गौ-काष्ठ से प्रदूषण का खतरा भी नहीं रहेगा और गोठानों के गोबर का सदुपयोग भी होगा।

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