बिना जूतों के 16000 फीट की बर्फीली चोटी पर चढ़ जाने वाले शहीद कैप्टन नीबू का आखिरी खत पढ़िए।

कर्नल गौतम राजऋषि

कारगिल विजय के 21 साल पूरे होने पर पढ़िए महावीर चक्र विजेता कैप्टन निकेजकौउ कैंगेरो का अपने परिवार के नाम आखिरी खत कैप्टन को प्यार से उनके साथी नीबू साहब भी कहते थे… और उनकी बहादुरी के किस्से तो ऐसे कि पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाएं…

आज इक्कीस साल हो गए कारगिल युद्ध को। स्मृतियाँ यूँ डसती रहती हैं जैसे बस कल की ही बात हो| युद्ध के दौरान एक सैनिक अपनी वर्दी और अपने रेजीमेंट की नाम-नमक-निशान के लिए लड़ता है। 1999 में मई के मध्य से जुलाई के आख़िर तक लगभग ढाई महीने चले इस कारगिल युद्ध में भी यही हुआ था। लोग मुझसे अक्सर कारगिल युद्ध की कहानियों के बारे में पूछते रहते हैं। मैं उदासी भरे लहजे में कुछ नाम ले लेता हूँ मनोज पाण्डेय, विक्रम बत्रा, अनुज नैय्यर, हनीफुद्दीन, वांगचुक, सौरभ कालिया, अमित भारद्वाज, विजयंत थापर, विश्वनाथन और नीबू। ये नाम भर नहीं हैं अपने आप में एक पूरी की पूरी दास्तान हैं।

आज मैं आपको एक बहादुर सैनिक का आख़िरी ख़त सुनाता हूँ। युद्ध के दौरान किसी भी ख़तरनाक मिशन पर जाने से पहले सैनिकों के अपने परिजनों के नाम चिट्ठी लिखकर रखने की पुरानी परिपाटी रही है। कारगिल युद्ध के दौरान और उसके उपरान्त भी ऐसे अनगिनत ख़त देश के जाने कितने घरों में पहुँचे…रोते-बिलखते परिवारों के पास। 21 साल पहले अगर कारगिल की बर्फ़ीली चोटियों पर युद्ध नहीं हुआ होता तो नीबू साब 45 साल के होते। नीबू साब यानी राजपूताना राइफल्स के कैप्टेन निकेजकौउ कैंगेरो। वे अपनी बटालियन में इसी नाम से पुकारे जाते थे। 28 जून 1999 की रात को दुश्मनों के कब्ज़े से अपनी चोटी को छुड़ाने के लिए सोलह हज़ार फुट की ऊँचाई और माइनस दस डिग्री तापमान में बिना जूता पहने रॉकेट-लांचर लेकर चोटी पर चढ़ गए। मातृभूिम पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने से पहले उन्होंने पाकिस्तान के सात बंकरों और 2 घुसपैिठयों का काम तमाम कर दिया। यह सारा कारनामा उन्होंने कमांडो कार्रवाई में घायल होने के बाद कर दिखाया। उन्हें बाद में मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। इस युद्ध में 527 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए और 1363 घायल हुए थे।

आख़िरी मिशन पर जाने से पहले नीबू साब का लिखा ख़त, जिसका भावनात्मक हिन्दी अनुवाद नीचे है। शुष्क से शुष्कतर संवेदनाओं को नम कर देने की क़ाबिलियत रखता है यह खत।

कैप्टन नीबू का आखिरी खत

20 जून 1999

मेरे प्यारे मम्मी-पापा

कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे ऐसी कोई चिट्ठी लिखने की आवश्यकता पड़ेगी। लेकिन आज यह ज़रूरी लग रहा है कि मैं अपना आख़िरी संदेश आप लोगों से साझा करूँ। पाकिस्तानियों ने घुसपैठ करके हमारे इलाक़े पर कब्ज़ा कर लिया था, इसलिए हमें इधर कश्मीर के द्रास और बटालिक सेक्टर में आना पड़ा है। मुझे पता है कि ईश्वर मेरे साथ है और वो मेरी रक्षा करेगा…लेकिन यदि ईश्वर की यही इच्छा है कि मैं अपने जीवन की क़ुरबानी दूँ, तो फिर मुझे आप लोगों से मुख़ातिब होने का दुबारा मौक़ा नहीं मिलेगा। मन बहुत उदास है कि मैं अब आप लोगों को कभी नहीं देख पाऊँगा। अगर मैं वापस नहीं आया तो चाहता हूँ कि आप लोग मेरे कुछ शब्द याद रखें। मेरे प्यारे मम्मी-पापा मैंने हमेशा से यही चाहा है कि आप लोग ख़ुश रहें। लेकिन अब लगता है कि शायद मैं अपने इस छोटे जीवनकाल में आपको खुश रखने के लिए कुछ नहीं कर पाउंगा।

कृपया मुझे मेरी ग़लतियों के लिए माफ़ कर दीजिएगा। आप दोनों ने मुझे इतना प्यार दिया है और इतना कुछ सिखाया है कि मैं जीवन के आखिर क्षणों तक एक अच्छा लीडर बना रहा हूँ। शुक्रिया आप दोनों का।

प्यारे पापा, छोटे भाई और बहन के बारे में सोचकर मुझे अभी रोना आ रहा है। आप उन्हें बेहतर मनुष्य बनने के लिए अच्छे से गाइड करना। उनसे । दादाजी, दादी माँ ,सारे रिश्तेदारों और दोस्तों को मेरा प्रणाम कहिएगा। मेरी ओर से कहिएगा कि अगर मैंने कभी भी उनका दिल दुखाया हो तो माफ कर दीजिएगा। जब मैं नहीं रहूँ तो आप मत रोना, लेकिन आप रोए बिना रहेंगे नहीं क्योंकि मुझसे बहुत प्यार जो करते हैं। लेकिन ख़ुश रहिएगा यह सोच कर कि मैं आप सभी की स्मृतियों में तो रहूँगा। मेरे सारे दोस्तों को खत लिख दीजिएगा।

पापा-मम्मी, आप दोनों से एक बहुत ही व्यक्तिगत बात बतानी थी। मेरी एक गर्लफ्रेंड है…उसका नाम कैर्मिला (बदला हुआ नाम) है। आप उसको जानते भी हैं। आप दोनों शायद उसको पसंद ना करें। लेकिन मैं उससे प्यार करता हूँ और वो भी मुझसे बहुत प्यार करती है। इस बार मई में जब मैं छुट्टियों में आया था तो हमने शादी करने का फैसला किया था। अगर मैं वापस नहीं आऊँ तो कृपया उसका भी ख़्याल रखिएगा। आप दोनों पर ईश्वर का आशीर्वाद हमेशा बना रहे और मैं आप दोनों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ।

आपका प्यारा बेटा
नीबू

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