रिपोर्ट में खुलासा : चीन ने माना, भारत की सैन्य क्षमता हमसे मजबूत

नई दिल्ली । पैन्गोंग झील के दोनों किनारों से पीछे हटने के बाद अब एलएसी के अन्य विवादित क्षेत्रों हॉट स्प्रिंग्स, गोगरा और डेमचोक से भी चीन ने विस्थापन पर सहमति जताई है। अगली सैन्य वार्ता में इन क्षेत्रों से सेनाओं को पीछे हटाने की कार्य योजना बननी है। करीब 10 माह तक चले गतिरोध के बाद एलएसी से चीनी सेना के लौटने के राज का खुलासा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की एक रिपोर्ट से हुआ है। इस रिपोर्ट में चीन ने माना है कि सीमा पर भारत की सैन्य क्षमता और तैनाती ज्यादा मजबूत है, इसलिए उनके वास्तविक युद्ध के अनुभव को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए।

दरअसल, गतिरोध के दौरान चीन सीमा पर हुई दोनों देशों की सैन्य तैनाती और क्षमता का आकलन करने के लिए चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने एक अध्ययन कराया था। यह रिपोर्ट पीएलए अकादमिक के सैन्य विज्ञान के ऑपरेशन थ्योरी एंड रिसर्च डिपार्टमेंट के विशेषज्ञ पान झिनमो ने तैयार की थी। इस रिपोर्ट का खुलासा अब उस समय हुआ है, जब भारतीय और चीनी सैनिक दस महीने तक एक सैन्य गतिरोध में बंद रहने के बाद पूर्वी लद्दाख में पैन्गोंग झील क्षेत्र से पीछे हटे हैं। अपने लम्बे विश्लेषण में सेना की तैनाती के संदर्भ में कहा गया है कि भारत ‘आक्रामक तैनाती’ पर जोर देता है। भारत ने अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को प्रदर्शित करते हुए पहली पंक्ति के सैनिकों को स्थिर करने, दूसरी पंक्ति के भंडार को मजबूत करने, अभियानों की गहराई बढ़ाने और रक्षात्मक लचीलापन बढ़ाने की नीति के तहत तैनाती की है।

भारतीय सेना ने ऊंचाई वाले क्षेत्रों में युद्ध के अनुभव से सीखने पर ध्यान दिया है। भारत की सेना ने लचीले ढंग से मारक रणनीति जैसे मारक क्षमता, कम्फ़र्टेड आर्म्स वॉरफ़ेयर, इंफ़ॉर्म वॉरफ़ेयर, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट आदि में महारथ हासिल की है। इसलिए भारतीय सेना के वास्तविक युद्ध के अनुभव को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। सीसीपी के आधिकारिक विश्लेषण में कहा गया है कि चीन सीमा पर भारतीय सेना की रणनीति पूर्वी भाग में अरुणाचल प्रदेश की सुरक्षा करने, मध्य में सिक्किम को स्थिर करने और पश्चिमी खंड लद्दाख में आक्रामक हमले करने की रही हैं। इसी वजह से भारत के साथ दशकों में सबसे गंभीर हालिया सैन्य गतिरोध है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय सेना के ज्यादातर मुख्य युद्धक उपकरण और जमीनी सैनिक नाइट विजन उपकरणों से लैस हैं, जिससे वे रात के हमले करने में भी माहिर हैं। इसीलिए उन्हें अपने दुश्मन के ठिकानों पर रात में भी हवाई कार्रवाई करने में क्षमता हासिल है। रिपोर्ट यह भी दावा सार्वजनिक किया गया है, जिसमें भारतीय सेना और वायु सेना की तैनाती के बारे में विस्तृत जानकारी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्वी क्षेत्र में लगभग 85,000 सैनिक, 21 लड़ाकू विमान, 33 परिवहन विमान और 36 हेलीकॉप्टर तैनात हैं। इसी तरह सिक्किम सेक्शन में 64,000 सैनिक, 30 फाइटर जेट, 39 बमवर्षक और 10 हेलीकॉप्टर हैं।

भारतीय वायु सेना की चेतावनी क्षमता के बारे में विश्लेषण में कहा गया है कि इसके अलावा तीन ए-50 शुरुआती चेतावनी वाले विमान और आठ पी-8 आई गश्ती विमान तैनात किए गए हैं। पी-8 आई विमानों सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी मजबूत करने के लिए गलवान घाटी में भेजा गया है। कुल मिलाकर भारतीय वायुसेना ने विभिन्न प्रकार के लगभग 320 लड़ाकू विमानों के साथ सीमा पर 10 लड़ाकू स्क्वाड्रन तैनात किए हैं। भारतीय सेना का मानना है कि पूर्वी लद्दाख खंड ‘सबसे असुरक्षित’ है और सिक्किम खंड ‘भारतीय रक्षा का सबसे संवेदनशील हिस्सा’ है, क्योंकि यह ‘रणनीतिक’ सिलीगुड़ी कॉरिडोर की अनदेखी करता है और जहां चीनी सेना पूर्वोत्तर भारत में प्रांतों (राज्यों) को अलग करके सिलीगुड़ी कॉरिडोर को जल्दी से काट सकती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने अपने 20% सैनिकों को चीन सीमा पर तैनात किया है जबकि अन्य 30% सैनिकों को ‘रणनीतिक क्षेत्रों’ में रिजर्व के तौर पर इकट्ठा किया गया है। भारतीय सेना की नीति के बारे में बताते हुए विशेषज्ञ ने कहा कि सीमा के पूर्वी खंड अरुणाचल प्रदेश को चीन दक्षिण तिब्बत के हिस्से के रूप में मान्यता देता है, जहां भारतीय सेना का ध्यान प्रमुख रूप से केंद्रित है। एलीट माउंटेन डिवीजन और इन्फैंट्री डिवीजन सहित पश्चिमी (लद्दाख) और मध्य (हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश) सेक्टरों में 1 लाख से अधिक सैनिकों को तैनात किया गया है। इसके अलावा अर्धसैनिक बलों की कई बटालियन शामिल हैं। इसलिए इनकी तैनाती पूर्वी खंड और सिक्किम खंड पर केंद्रित है, जहां चीन-भारत सीमा क्षेत्र में 70 प्रतिशत सैनिक तैनात हैं।

चीनी विशेषज्ञ के विश्लेषण के अनुसार वास्तविक नियंत्रण रेखा को तीन हिस्सों को बांटकर भारत ने तैनाती की है। पहले स्तर पर एलएसी से 10-20 किलोमीटर की दूरी पर अर्धसैनिक बल, दूसरे स्तर पर 50-100 किलोमीटर दूर मुख्य रक्षा क्षेत्र बनाने के लिए ब्रिगेड और बटालियन के सैनिक तैनात किये गए हैं। तीसरा स्तर एलएसी से 100-300 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जहां सेना, डिवीजन और ब्रिगेड की मुख्य टुकड़ियों ने एक गहन रक्षा क्षेत्र बनाया है। पीएलए विशेषज्ञ ने कहा कि भारत की सेना ने पर्वतीय क्षेत्रों में तैनाती में अपनी ताकत, पर्वतीय युद्ध पर ध्यान केंद्रित किया है। यहां आठ इन्फैन्ट्री डिवीजनों में से सात माउंटेन इन्फैन्ट्री डिवीजन तैनात हैं। 38 ब्रिगेड में से 30 माउंटेन ब्रिगेड और माउंटेन आर्टिलरी ब्रिगेड हैं।

चीनी विशेषज्ञ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 1962 के बाद भारतीय सेना ने अपने उच्च और ठंडे पहाड़ों में युद्ध के अनुभव को ध्यान में रखते हुए सेनाओं की तैनाती की है। दशकों से इस तरह के क्षेत्रों में वास्तविक युद्ध में महारथ हासिल करने के बाद तैयार की गई रणनीति के तहत गोलाबारी युद्ध, हवाई-जमीन एकीकृत युद्ध, सूचना युद्ध, रसद समर्थन और विरोधी समर्थन आदि में भारत के अनुभव को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। चीनी विशेषज्ञ ने यह भी कहा कि अधिकांश भारतीय सेना के मुख्य युद्ध उपकरण और जमीनी सेना नाइट विजन आपूर्ति से लैस हैं। वे रात के हमलों में अच्छे हैं, जो हवाई हमले, जमीनी घुसपैठ, दुश्मन के रियर पर हवाई कार्रवाई करते हैं।

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