लड़कियों के लिए सैनेटरी पैड मुख्य ज़रूरत,लेकिन राहत राशन के पैकेट से अभी भी दूर

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। 

मैंने अक्सर घर के राशन की लिस्ट माँ या चाची को बनाते देखा है मैंने देखा है कैसे वो एक भी सामान लिस्ट से बाहर ना चली जाए इसके लिए पूरी आलमारी छान दिया करतीं हैं। मैंने कभी उस लिस्ट में उनकी अपनी कोई ख्वाहिश ऐड करते हुए नहीं देखा मैंने नहीं देखा उन्होंने कभी अपनी तीन तह साड़ी के नीचे दबी उस पैड के पैकेट को उस लिस्ट में लिखते हुए।

मैंने माँ को घर का भार कम करने के लिए पैड की जगह अक्सर कपड़ा इस्तेमाल करते हुए देखा है। कितना अजीब है ना हमें किचन पकड़ा दिया जाता है और हम अपनी इकलौती सत्ता में से भी अपनी ख्वाहिशें मिटा दिया करतीं हैं।

अभी लॉकडाउन का वक़्त चल रहा है यानी काफी नाजुक दौर जहाँ लोग दाना-पानी को लेकर परेशान हैं वहीं कुछ महिलाओं ने समझौता किया है और कुछ के पास समझौता करने के लिए भी जरूरी सामान नहीं है। अब सुषमा को ही देख लीजिए उसके पास अब कपड़ा ही नहीं है कि वो उसे इस्तेमाल कर ये वक़्त काट ले।

एक कपड़े को अपने दो माहवारी महीनों में यूज़ किया


प्रतीकात्मक तस्वीर, फ़ोटो सोर्स- सोशल मीडिया



सुषमा जो मेरे घर काम करने आती थी अचानक बीते दिन फोन करती है। मैंने उसके कुछ बोलने से पहले ही पूछ लिया पैसे या राशन की दिक्कत है क्या? तो फोन की दूसरी तरफ से जवाब आता है दीदी अगर एक पैकेट पैड का मिल जाता तो ये महीना कट जाता। मैं ये सुन कर अवाक थी।

सुषमा आगे बताती है, “पहले जिस स्कूल में जाती थी वहां पर नियम से हर महीने पैड मिल जाता था। अगर एक महीना नहीं भी मिलता तो पॉकेट मनी से खरीद लेती थी। लेकिन अब तो बहुत मुश्किल हो गया है, हमारे घर से 4 किलोमीटर दूर एक दुकान पर मिलता है और पापा से बोलने में शर्म आती है, हमारे दुकान जाने पर भी रोक है।”

सुषमा आगे जो बताती है वो सुन कर आप विचलित हुए बिना नहीं रह पाएंगे। सुषमा  का कहना है, “मेरे पास कुल पांच कपड़े हैं जिनको मैंने अपने दो माहवारी में इस्तेमाल कर लिया है। जब लगा अब भी लॉकडाउन नहीं खुलेगा तो हिम्मत कर के दुकान तक पहुंची। दीदी 8 किलोमीटर चलने का हमको कोई फायदा नहीं मिला उस दुकान पर पैड का एक भी पैकेट उपलब्ध नहीं था। ऊपर से दुकानदार कहता है इस महामारी में अनाज ज्यादा जरूरी है या ये।”


प्रतीकात्मक तस्वीर, फ़ोटो सोर्स- सोशल मीडिया



सुषमा फोन पर आगे कहती है कि दीदी जब मुझे कहीं कोई रास्ता नहीं दिखा तो आपके पास फोन कर दिया। आपसे पहले  भी कई लोगों को किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।

हम खाने के साथ पैड भी बांट रहे


प्रतीकात्मक तस्वीर, फ़ोटो सोर्स- सोशल मीडिया



वहीं अपर्णा जो आज तक में एक पत्रकार के तौर पर काम करतीं हैं और एक एनजीओ भी चलाती हैं। इस एनजीओ का नाम ‘साहस’ है जो काफी समय से मेंस्ट्रुअल हाइजीन से लेकर पैड बनाने का काम करता आया है। अभी किसी कारण पैड बनाने का काम रुका हुआ है लेकिन जागरूकता फैलाना नहीं।

अपर्णा बताती हैं, “हमने इस पर पहले भी काम किया था तो हमें पता था कि कौशांबी के भूआपुर गांव में किस तरह की दिक्कत आ सकती है। क्योंकि जिस इलाके में हम काम करते हैं वो पूरी बस्ती कबाड़ बीनने से लेकर मजदूर परिवार के घर से घिरी हुई है। हमने अभी अपनी टीम के जरिए एक ही इलाके में पैड बांटने का काम किया है।”

अपर्णा आगे बताती हैं, “पहले पैड बांटने की समस्या नहीं थी क्योंकि तब वो खुद भी कमाते थे। केवल उन्हीं महिलाओं को दिया जाता था जिनको असल में जरूरत होती थी। लेकिन जबसे लॉकडाउन हुआ है तब से उनका काम भी बंद पड़ गया है। हमने राहत राशन के साथ पैड का पैकेट भी बंटवाया है। जब हमने पैड बांटने का निर्णय लिया तो कुछ महिलाएं आगे आयीं और कहा कि दीदी अभी खाने का कुछ इंतजाम करो हम तो कपड़ा लगा कर भी अपना काम चला सकते हैं।”

अपर्णा हॉटस्पॉट इलाके में फंसी थी जिसके कारण वो कौशाम्बी नहीं जा पाईं लेकिन उन्होंने अपनी टीम को नोएडा से ही लीड किया लगातार उन लोगों के संपर्क में भी रहीं जिनको पैड या राशन से संबंधित कोई दिक्कत आती।

सरकार खाना तो दे नहीं पा रही पैड क्या देगी

अफ़साना जो ‘साहस’ टीम की सदस्य हैं और घरों में बाई का काम करती हैं। वो बताती हैं, “हमने लगभग 80 घरों में पैड बांटे हैं। मेरे साथ और दो साथी शीला और संतोष ने मिलकर इस काम को किया है। जब हम पैड बांट रहे थे तो महिलाओं ने कहा कि इस वक़्त हम खाने की उम्मीद भी छोड़ रहे थे लेकिन आपलोगों ने दाना और हमारे निजी जरूरतों का ख्याल किया। वो लोग काफी दुआएं दे रहे थे।”


प्रतीकात्मक तस्वीर, फ़ोटो सोर्स- सोशल मीडिया



अफ़साना बताती हैं कि पूरे भूआपुर गांव में लगभग 3000 झुग्गी है। अपर्णा दीदी अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहीं हैं कि सबको खाना पानी मिलता रहे। अभी आज ही हमने सात घरों में राशन बांटा है। पैड की जरूरत तो छोड़िए सरकार तो राशन भी अभी तक नहीं दे पायी है। हम अपने आधार कार्ड की दसियों फ़ोटोकॉपी विधायक से लेकर सरकार ने जहां जहां बोला वहां अर्जी दी लेकिन विधायक का कहना है कि अभी तक कोई राशन नहीं आया है। वहीं हमें ये सुनने में आया कि विधायक ने अपनी तरफ कुछ दिखावे के राशन बंटवाये हैं लेकिन इस झुग्गी तरफ अभी तक एक दाना तक नहीं आया है।

अफ़साना अपनी लड़खड़ाती आवाज़ में आगे बताती है, “मैं घरों में बाई का काम करती हूँ अभी काम बंद है ऐसे में हमारा दाना पानी का सब साधन बंद हो गया अगर अपर्णा दीदी मदद नहीं करती तो यहां के लोग बीमारी से पहले भूख से मर जाते।”

जिस घर में राशन पहुंचा रहे उस घर में महिलायें नहीं हैं क्या?

नीलम (बदला हुआ नाम)जो उत्तरप्रदेश के एक सरकारी स्कूल की दसवीं की छात्रा है। नीलम के पिता सब्जी का ठेला लगाने का काम करते हैं। लेकिन जबसे लॉकडाउन हुआ है उनकी आमदनी कम हो गयी है बस गुजारे भर की कमाई हो पाती है। नीलम के पिता लल्लन का कहना है सरकार की तरफ से मदद आयी है।

नीलम अपने माहवारी के बारे में बताते हुए कहती है, “हमें पहले स्कूल से 2 रुपये में पैड मिल जाता था। आज से पहले हमारे घर में किसी ने सेनेटरी पैड यूज़ नहीं किया था। मैं अपने रिश्तेदारों के घर भी जाती तो अपनी बहनों को बताती कि मैं पैड का इस्तेमाल करती हूँ। उनकी माली हालत खराब है वो अभी भी एक कपड़े को कई बार इस्तेमाल करतीं हैं।”


प्रतीकात्मक तस्वीर, फ़ोटो सोर्स- सोशल मीडिया



नीलम अब की हालात पर आगे बताती है, “पहले स्कूल से पैड मिल जाता था लेकिन जब से लॉकडाउन हुआ है नहीं मिला। अब बाजार में पैड बहुत महंगा मिलता है तो साफ कपड़ा दो महीने से इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन अब उससे काफी दिक्कत हो रही है। पिछले महीने कपड़े के कारण इंफेक्शन हो गया था जिसके कारण काफी तकलीफ़ हुई थी।”

नीलम आश्चर्य से आगे बताती है कि मैम सरकार ने जब राहत पैकेट बांटा है तो उसमें सब जरूरी सामान था लेकिन पैड नहीं था क्या सरकार को ख्याल नहीं आता क्या कि हर घर में महिलाएं भी रहती हैं। कुछ एनजीओ भी खाने का सामान बांट रहे हैं लेकिन पैड का पैकेट या साफ कपड़े नहीं दे रहे। क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती एक पैड का पैकेट बांट दे।

सवाल बिल्कुल वाजिब है नीलम की सरकार से शिकायत भी। इस अवस्था से गुजरने वाली अकेले नीलम नहीं है इस कारवां में नीलम जैसी हजारों लाखों लड़कियां हैं जो हर महीने की इस परेशानी से जूझ रही हैं। ये वक़्त खराब है हालात अब बिगड़े हैं लेकिन ये परेशानी ना जाने लड़कियां कब से झेलती आ रही हैं।

मशीन साल भर से खराब है आला अधिकारी नहीं सुन रहे


प्रतीकात्मक तस्वीर, फ़ोटो सोर्स- सोशल मीडिया



आर.के टंडन जो शासकीय उच्चत्तर माध्यमिक शाला जर्वे के शिक्षक हैं बताते हैं, “हमारे स्कूल में पैड वाली मशीन है किसी भी लड़की को जब कभी पैड की आवश्यकता होती है तो इस मशीन में 2 रुपये का सिक्का डालने पर एक पैड निकलता है। लेकिन अब ये मशीन साल भर से खराब पड़ी हुई है, हमने उच्च अधिकारी से कई बार बात किया लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं आया है। अभी लड़कियां कैसे क्या कर रही हैं इसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।”

ये मुद्दा मेनस्ट्रीम में भी आ गया है, जिसको जब जरूरत होता है तो वो अपने तरीके से इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है लेकिन इसकी जमीनी हकीकत उतनी ही दयनीय है।

अगर आंकड़ों की बात करें तो इस मुद्दे से ज्यादा आंकड़े देख कर आप शर्मसार हो जाएंगे। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के रिपोर्ट अनुसार 57.6 प्रतिशत भारतीय महिला सैनिटरी पैड का उपयोग करती है जबकि 62 प्रतिशत अभी भी कपड़ा, राख, घास, जूट व अन्य सामग्रियों पर निर्भर हैं। 24 प्रतिशत किशोरियों अपने पीरियड्स के दौरान विद्यालय में अनुपस्थिति दर्ज कराती हैं। मासिक धर्म में बरती लापरवाही से भारत में सर्वाइकल, कैंसर की वृद्धि का होना भी देखा जा सकता है।

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