जो मोहरहित व साक्षी भाव से जीता है, वह जीवन्मुक्त

गुनो भई साधो
मन अशांत हो तो सदुपदेश का आश्रय लेना चाहिए। शुकदेवजी महाज्ञानी थे मगर उनके प्रश्न वही थे जो प्रायः आप-हम सबका मन मथते रहते हैं। तब शुकदेव की तरह जनक के सूत्र हमें भी मुक्ति का मार्ग बताते हैं। जनक ने कहा था जो बिना किसी फल की कामना किए कर्तव्य कर्म में रत रहता है, वही जीवन्मुक्त है।

00000

-डॉ.विवेक चौरसिया, पौराणिक साहित्य के अध्येता

ह मारे शास्त्र बार-बार कहते हैं कि मुक्ति ज्ञान से ही सम्भव है मगर यह भी विचित्र किन्तु सत्य है कि ज्ञान की अति हो जाए तो वह भी मनुष्य के मुक्ति मार्ग में रोड़ा बन जाती है। इसलिए कि अधिक ज्ञानी प्रायः दिग्भ्रमित हो जाता है और यह भ्रम उसे अशांत कर देता है। अद्भुत ही है कि आसन्न मृत्यु से डरे हुए राजा परीक्षित को जिन महामुनि शुकदेवजी ने श्रीमद्भागवत की महापौराणिक कथा सुनाकर मृत्यु भय से मुक्ति का महामंत्र दिया और राजा के सारे भ्रम भंग कर दिए, वे ही महामुनि एक समय स्वयं ज्ञानाधिक्य के कारण विचलित और अशांत हो उठे थे। तब पिता महर्षि वेदव्यास की आज्ञा से शुकदेवजी मिथिला नरेश जनक के पास पहुँचे थे और जनक ने उन्हें जीवन्मुक्तता का मंत्र सिखाया था।

यही जीवन सूत्र है। इसी बात को शब्दान्तर से वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और गीता सबने दोहराया है। शुकदेव इसे जानते थे मगर जानकर भी ज्ञानाधिक्य के कारण दिग्भ्रमित हो गए थे।

शुकदेवजी के जनक के पास जाकर उपदेश ग्रहण की कथा अनेकत्र उपलब्ध है लेकिन सबसे सुंदर कथा दो ग्रन्थों में है। एक महाभारत के शांतिपर्व के मोक्षधर्म पर्व में और दूसरी महोपनिषद् में। महाभारत में यह कथा 13 अध्यायों में विस्तार से कही गई है मगर महापनिषद् में केवल एक अध्याय में होकर भी बहुत सुंदर और सारगर्भित है। महाभारत की कथा में शुकदेवजी की उत्पत्ति से लेकर उनके जनक के पास जाने से लेकर ज्ञान प्राप्ति के बाद पुनः पिता के पास आने और फिर ऊर्ध्वगति पाने तक का वर्णन है। जिसमें शुकदेवजी का पिता के आश्रम से क्रमशः मेरु वर्ष, हरिवर्ष व हैमवत वर्ष को पैदल पार कर भारतवर्ष में प्रवेश करने का चित्रण अत्यधिक मनोहर है। महाभारत के अनुसार वे चीन व हूण जाति के लोगों से सेवित नाना प्रकार के देशों का दर्शन करते हुए आर्यावर्त पहुँचे थे। इससे यह संकेत भी मिलता है कि महर्षि वेदव्यास का आश्रम चीन के भी उस पार सुदूर मेरु पर्वत पर था जो पुराणों में देवताओं का आश्रय पर्वत बताया गया है।

परम् ज्ञान के बावजूद शुकदेवजी के मन में अनेक प्रश्न शेष थे जिनकी कथा महाभारत से कहीं अधिक सुंदर ढंग से सामवेदीय परम्परा से सम्बद्ध महोपनिषद् के दूसरे अध्याय में है। कुल छह अध्यायों वाले इस उपनिषद् में अपने नाम के अनुरूप अनेकानेक महत्वपूर्ण विषयों का इतनी कुशलता के साथ विशद विवेचन हुआ है कि अध्यात्म पथ के पथिक पूर्ण समर्पण से आश्रय ले तो इसके सूत्र सहज ही मार्गदर्शन करते जाते हैं। इस अनुपम उपनिषद् की कथा के अनुसार एक बार प्रज्ञावान् मनीषी शुकदेवजी ने अपने पिता वेदव्यासजी से पूछा कि ‘इस जगत रूप प्रपञ्च का प्राकट्य किस प्रकार हुआ और इसका विनाश कैसे होता है? यह क्या है? किसका है? और इसकी उत्पत्ति कब हुई?’ पिता ने उन्हें सब प्रश्नों के समुचित उत्तर दिए, लेकिन ये सभी बातें तो मुझे दीर्घकाल से पता ही है, ऐसा जानकर शुकदेवजी ने अपने पिता की बातों को विशेष सम्मान न दिया। तब उनके भावों को अनुभव कर पिता ने और गहरे से समाधान के लिए उन्हें अपने यजमान मिथिलापति जनक के पास जाने को कहा।

शुकदेव मुनि जब मिथिला के राजभवन पहुँचे तब द्वारपालों ने जनक को उनके आगमन की सूचना दी मगर उनकी परीक्षा के लिए जनक ने अवज्ञापूर्वक मात्र इतना ही कहा कि उनसे कहो ‘वे वहीं पर रुके’। इसके बाद जनक सात दिन तक शांत रहे। सप्ताह भर बाद शुकदेव को द्वार से राजप्रांगण में आमंत्रित कर जनक ने फिर सात दिन प्रतीक्षा कराई। तदनंतर उन्हें अन्तःपुर में बुला लिया मगर अगले सात दिन तक जनक उनके सामने न आए। अन्तःपुर में सुंदर स्त्रियों ने नाना सुस्वादु पकवानों से शुकदेव का सत्कार किया किन्तु वे भोग महामुनि के मन को वैसे ही न डिगा सके जैसे कि मंद पवन दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित पर्वत को गतिशील नहीं कर पाती है। अन्तःपुर में रहते हुए भी ज्ञानी शुकदेव असंग, समभावी, निर्मल और पूर्णचन्द्र के सदृश बने रहे। महाभारत में यह अवधि एक दिन की है मगर महोपनिषद् में 21 दिन जनक ने उनकी परीक्षा ली और धैर्य सहित चरित्र को आँककर अंततः शुकदेवजी को अपने समीप बुलाया। शुकदेवजी ने जनक के समक्ष ठीक वे ही प्रश्न दोहराए जो पिता से पूछे थे और कहा कि यह जगत जब सार रहित है तो यह जीवन आखिर क्या है? और कहा ‘त्वत्तो विश्रममाप्नोति चेतसा भ्रमता जगत्’। अर्थात् मेरा यह चित्त जगत के विषय में दिग्भ्रान्त हो रहा है अतः आपके सदुपदेश से ही शांति मिल सकती है। स्मरण रखिए, मन अशांत हो तो सदुपदेश का आश्रय लेना चाहिए। शुकदेवजी महाज्ञानी थे मगर उनके प्रश्न वहीं थे जो प्रायः आप-हम सबका मन मथते रहते हैं। तब शुकदेव की तरह जनक के सूत्र हमें भी मुक्ति का मार्ग बताते हैं। जनक ने कहा, ‘सर्वत्र विगतस्नेहो य: साक्षिवदवस्थित:। निरच्छो वर्तते कार्ये स जीवन्मुक्त उच्यते।।’ अर्थात् जो सर्वत्र मोहरहित होकर साक्षी भाव से जीवनयापन करता है तथा बिना किसी फल की कामना किए ही अपने कर्तव्य कर्म में रत रहता है, वही जीवन्मुक्त है।

साधो! यही जीवन सूत्र है। इसी बात को शब्दान्तर से वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और गीता सबने दोहराया है। शुकदेव इसे जानते थे मगर जानकर भी ज्ञानाधिक्य के कारण दिग्भ्रमित हो गए थे। पिता ने समझाया तो ‘स्वज्ञान’ का अहंकार आड़े आ गया, इसीलिए पिता ने जनक के पास भेजा और जनक ने सीधा सरल सुबोध जीवन सूत्र देकर शुकदेव को जीवन्मुक्तता का बोध करा दिया। मत भूलिए, ज्ञान की अति से बेहतर है, एक सूत्र साध लेना। सयानों ने ‘एक साधे सब सधे’ की सूक्ति इसीलिए गढ़ी है। जो मोहरहित व साक्षीभाव से जीता और फल की इच्छा के बगैर कर्म करने की कला सीख लेता है उसे जगत का सार समझ आ जाता है। फिर उसे ज़माने भर के ‘ज्ञान’ की जरूरत नहीं रह जाती।

admin