यूपी में चुनावी मुद्दों की तलाश हुई तेज

उत्तर प्रदेश के चुनाव करीब आते-आते योगी सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था का सवाल प्रमुख सियासी मुद्दा बनकर उभरे इसकी पूरी गुंजाइश बनने लगी है। अपराधियों के धड़ाधड़ एनकाउंटर को लेकर विपक्ष और मीडिया ने भी सवाल उठाए हैं।

-कुमार भवेश चंद्र, वरिष्ठ पत्रकार
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मौजूदा कार्यकाल का आखिरी बजट सोमवार को पेश किया। बजट सत्र के पहले दिन ही राज्यपाल के अभिभाषण के जरिए सरकार ने अपने एजेंडे को सामने रखा है। इसमें प्रदेश में निवेश का माहौल बनाने के साथ ही 3 लाख करोड़ की नई परियोजनाओं को जमीन पर उतारने की बात कही गई है। सरकार ने कानून व्यवस्था के मोर्चे पर बड़ी कामयाबी का दावा करते हुए माफियाओं की 1000 करोड़ की संपत्ति को जब्त करने को भी प्रमुखता से रखा है। कई शहरों में मेट्रो परियोजनाओं के विस्तार की चर्चा भी है। किसानों को भी दूसरी सहायता के साथ सरकारी खरीद केंद्रों से अनाजों की खरीद का वादा दोहराया गया है। लेकिन इन सबके बीच अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की तैयारियों के साथ प्रदेश में सांस्कृतिक पर्यटन की संभावनाओं पर किए गए काम का खास उल्लेख भी है।

सवाल ये भी उठ रहे हैं क्या बीजेपी आखिरी वक्त में सभी मुद्दों को राम मंदिर की दिशा में मोड़कर अपने पक्ष में एक बार फिर माहौल बनाने की कोशिश करेगी। राम मंदिर के निर्माण में योगी सरकार की कोई सीधी भूमिका नहीं लेकिन योगी आदित्यनाथ ने शुरू से ही इस मामले में इतनी रुचि दिखाई है कि वे इसका श्रेय लेने की कोशिश करें तो हैरानी नहीं होगी?

राज्यपाल के इस अभिभाषण में उठाए गए मुद्दों को आने वाले चुनाव में सत्ता पक्ष के मुख्य फोकस के रूप में देखा जा रहा है। योगी सरकार का दावा रहा है कि उसने प्रदेश में कानून व्यवस्था के मोर्चे पर बहुत ही मजबूती से काम किया है। कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिशें हुई हैं। माफियाओं की गतिविधियों पर लगाम कसा गया है। यह बात सही भी है कि प्रदेश सरकार ने बसपा विधायक मुख्तार अंसारी और कभी सपा सांसद रहे बाहुबली नेता अतीक अहमद और उनसे जुड़े लोगों की अवैध संपत्तियों के कब्जे हटाने, अवैध निर्माण को ढहाने की कार्रवाई को प्रमुखता से किया है। लखनऊ, प्रयागराज समेत कई जगहों पर दर्जनों ईमारतों को बुलडोजरों से ढहाए जाने की तस्वीरें सोशल मीडिया से लेकर अखबारों की सुर्खियां बनीं। लेकिन विपक्ष के आरोपों में भी उतना ही दम दिखता है कि सरकार ने ढेर सारे माफियाओं के ऊपर कार्रवाई करने से इसलिए परहेज किया क्योंकि सत्तापक्ष के प्रति उनका समर्थन जगजाहिर है। उत्तर प्रदेश के चुनाव करीब आते-आते योगी सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था का सवाल प्रमुख सियासी मुद्दा बनकर उभरे इसकी पूरी गुंजाइश बनने लगी है।

एक तरफ अपराधियों के धड़ाधड़ एनकाउंटर को लेकर विपक्ष और मीडिया ने सवाल उठाए हैं तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्य मंत्री केशव प्रसाद मौर्य के ऊपर पिछली सरकारों के कार्यकाल में दर्ज मुकदमे वापस कर लिए गए। योगी सरकार ने 2017 में सत्ता संभालते ही साल के आखिरी महीने में बाकायदा नियम बनाकर 20 हजार सियासी मामलों की वापसी का रास्ता साफ कर दिया था। वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेता आजम खान, उनकी पत्नी तज़ीन फातिमा और बेटे अब्दुल्ला के खिलाफ दर्जनों आपराधिक मामले चल रहे हैं। आजम और उनके बेटे पिछले एक साल से जेल में ही हैं। तज़ीन फातिमा को जरूर हाल ही में जमानत मिल गई है। कांग्रेस नेता नसीमुद्दीन और बसपा नेता राम अचल राजभर भी पिछले महीने जेल भेज दिए गए थे। इन दोनों पर प्रदेश की मंत्री स्वाति सिंह सिंह के परिवार के लोगों के खिलाफ अभद्र और आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल का आरोप है। योगी के कार्यकाल में हाथरस कांड और विकास दुबे कांड को लेकर भी कई तरह के सवाल हैं। हाथरस कांड के जरिए जहां दलितों के साथ सरकार का कठोर रवैया सामने आया वहीं विकास दुबे कांड में प्रदेश में प्रशासनिक अधिकारी- पुलिस-अपराधी के त्रिकोण को लेकर सवाल उठे। इन दोनों ही मामले में सरकार की साख को लेकर सवाल खड़े किए थे।

2017 के चुनाव में प्रदेश की कानून व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा इसलिए भी बना था, क्योंकि अखिलेश सरकार के कार्यकाल में मुजफ्फनगर दंगों में तत्कालीन सरकारी तंत्र की भूमिका को लेकर सवाल उठे थे। कानून व्यवस्था के दूसरे मोर्चे पर भी अखिलेश सरकार के कार्यकाल में कई दिक्कतें थीं। इसलिए सपा सुप्रीमो योगी सरकार के कार्यकाल में कानून व्यवस्था का सवाल तो उठाते हैं लेकिन उसकी दिशा महिला सुरक्षा को लेकर अधिक रहती है। अखिलेश यादव लगातार योगी सरकार के कार्यकाल में बने एंटी रोमियो स्वायड को लेकर तीखे सवाल करते हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने इस स्वायड को महिलाओं की निजता पर हमले के रूप में भी देखा गया। दूसरी तरफ अखिलेश सरकार ने अपने कार्यकाल में फोन पर महिलाओं के आपराधिक उत्पीड़न के लिए 1090 हेल्पलाइन शुरू कर उन्हें बड़ी राहत दी थी। अपराध नियंत्रण की तमाम कोशिशों के दावे के विपरीत मौजूदा सरकार के कार्यकाल में कई बड़ी आपराधिक वारदातों ने सरकार की साख पर बट्टा लगाया है। जाहिर है यहां विपक्ष के लिए इस मोर्चे पर बड़ी संभावनाएं भी दिखती हैं लेकिन खासतौर पर सपा और बसपा इस मुद्दे पर चुनावी युद्ध तेज करने से इसलिए भी बचती हैं क्योंकि उनके कार्यकाल में विवादास्पद मामलों की लंबी फेहरिस्त है। ऐसे में सपा-बसपा अपराध के मुद्दे उठाते हुए दलित और महिला उत्पीड़न तक ही बात को सीमित रखती है।

वैसे भी 2022 में विपक्ष को किसान असंतोष के रूप में बैठे बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। विपक्ष को लगने लगा है इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष को घेरकर वह सत्ता की सीढ़ी आसानी से चढ़ सकती है। देशव्यापी किसान आंदोलन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की सक्रियता से विपक्ष के हौसले बुलंद हैं। बजट सत्र के पहले दिन समाजवादी पार्टी ने किसानों की मांग का समर्थन करते हुए लखनऊ में विधान भवन के सामने जोरदार प्रदर्शन किया था। ट्रैक्टर पर सवार सपा विधायकों ने विधान सभा के सामने प्रदर्शन किया। कांग्रेस ने भी इस मौके को खूब भुनाया। किसानों के समर्थन में तख्तियों के साथ प्रदर्शन कर उन्होंने भी जता दिया है कि वे इस मुद्दे को चुनावी रंग में ढालने मन बना लिया है। कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी इन दिनों लगातार पश्चिम उत्तर प्रदेश में सक्रिय दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू भी किसान सभाओं में शरीक हो रहे हैं।

समाजवादी पार्टी के मुखिया अपनी किसी भी प्रेस कांफ्रेंस में किसानों के एमएसपी की मांग का समर्थन करने और गन्ना किसानों के बकाये के भुगतान नहीं होने का मुद्दा उठाना नहीं भूलते। महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे नरेश टिकैट ने सार्वजिनिक रूप से आरएलडी नेता चौधरी अजीत सिंह को 2019 में हराने का अफसोस जाहिर कर उनकी पार्टी में उम्मीदें जगा दी है। पश्चिमांचल में केवल कुछ सीटों पर अपना प्रभाव को लेकर सिमट चुके आरएलडी के नेता जाटलैंड में फिर से उभरने के ख्वाब देखने लगे हैं। यह बात और है कि वे किसी दल को साथ लिए बगैर कुछ खास करिश्मा दिखा नहीं पाते। पिछले दशकों में उनकी राजनीति कांग्रेस, सपा और बसपा में से किसी न किसी के सहारे ही चलती रही है। 2017 के चुनाव में बीजेपी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के बीच नए नेतृत्व को उभार कर अच्छी कामयाबी हासिल की थी। किसान आंदोलन से हुए नुकसान की भरपाई करने की कोशिश में जुटी बीजेपी कैसे इस इलाके में अपनी ताकत हासिल कर पाएगी, ये बड़ा सवाल है।

सवाल ये भी उठ रहे हैं क्या बीजेपी आखिरी वक्त में सभी मुद्दों को राम मंदिर की दिशा में मोड़कर अपने पक्ष में एक बार फिर माहौल बनाने की कोशिश करेगी। राज्यपाल के अभिभाषण में राम मंदिर का विशेष उल्लेख यह संकेत तो करता ही है। राम मंदिर के निर्माण में सीधे योगी सरकार की कोई सीधी भूमिका नहीं लेकिन योगी आदित्यनाथ ने शुरू से ही इस मामले में इतनी रुचि दिखाई है कि वे इसका श्रेय लेने की कोशिश करें तो हैरानी नहीं होगी? प्रदेश सरकार के बजट से अयोध्या के विकास की रूपरेखा तय करने से लेकर वाराणसी, मथुरा, प्रयागराज में सांस्कृतिक पर्यटन के विकास पर काम कर सरकार ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाया है। लंबे समय तक प्रदेश सरकार और बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडा का चेहरा बनकर योगी ने अपनी एक छवि तो गढ़ी ही है। देखना दिलचस्प रहने वाला है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सत्तापक्ष और विपक्ष अपने एजेंडे की ओर कैसे आगे बढ़ते हैं। और प्रदेश की जनता किन मुद्दों पर किसके समर्थन का मन बनाती है?

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