तपती दोपहरी में बच्चों और महिलाओं को नंगे पैर चलते देख अपने चप्पल दे दिए

शैलेंद्र वर्मा | इंदौर

कर्मभूमि से जन्मभूमि का तकलीफदेह सफर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर आ रहे गरीबों और मजदूरों के जूते-चप्पल टूटे, पैरों में पड़ गए छाले, फिर भी अपने घर पहुंचने की चाहत में जारी है सफर

कोरोना वायरस संक्रमण से उपजे लॉकडाउन का सबसे भयावह असर देश के मजदूर और गरीब वर्ग पर कहर बनकर टूटा है। जब से लॉकडाउन शुरू हुआ तब से हजारों गरीबों ने अपनी कर्मभूमि भूख और बेरोजगारी के कारण छोड़ दी। चाहे इसके लिए उन्हें हजारों किलोमीटर पैदल भूखे और प्यासे ही क्यों न चलना पड़ रहा हो। यह सिलसिला पहला लॉकडाउन लागू होने के बाद से तीसरा लॉकडाउन शुरू होने के बाद भी जारी है। राऊ बायपास से लेकर शिप्रा बायपास देश का ऐसा जंक्शन है, जहां से उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम चारों दिशाओं में जाया जा सकता है। इसीलिए प्रतिदिन बायपास पर 1000 से 1500 लोग 24 घंटे गुजर रहे हैं, जिनमें बच्चे, बूढ़े, महिलाएं और युवा शामिल हैं। अब तक इन लोगों की आवश्यकता परिवहन, भूख-प्यास ही समझी जा रही थी, लेकिन इंदौर शहर के संवेदनशील नागरिकों ने उनकी उस मार्मिक जरूरत को भी समझने का प्रयास किया जो सैकड़ों किलोमीटर चलने के बाद उनके पैरों से छूट गई।

नंगे पैरों में जूते-चप्पल पाकर खुशी से झूम उठे

राजकोट से बनारस पैदल जा रहे रवि यादव ने बताया वे तीन भाइयों के साथ राजकोट में पीओपी मकान निर्माण का काम करते थे। लॉकडाउन के बाद काम बंद हो गया और जो जमापूंजी थी वह खत्म हो गई। लॉकडाउन कब खुलेगा यह निश्चित नहीं, इसीलिए वे अपने पूरे परिवार (महिलाओं और बच्चों) के साथ पैदल ही बनारस के लिए चल पड़े। रास्ते में जहां-जहां ट्रक मिला वहां ट्रक से यात्रा की। कोई साधन नहीं मिलने पर पैदल चले, ऐसे में चप्पलें पूरी तरह घिस चुकी थीं। बच्चे भी नंगे पैर चल रहे थे। यहां जब जूते-चप्पल का ढेर देखा तो बच्चे अपने नाप की चप्पल खोजने लगे। हमें उम्मीद नहीं थी कि इंदौर के लोग हम जैसे गरीबों की इन आवश्यकताओं का भी ध्यान रखेंगे। वरना बच्चों के साथ न जाने कितने मील नंगे पैर ही चलना पड़ता।

भोजन-भूख के बाद बगैर चप्पल चलना बड़ी पीड़ा

दरअसल, बायपास पर इन दिनों गुजरात से उत्तर प्रदेश जाने वाले मजदूरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। जब सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने के बाद पैरों में पहने जूते-चप्पल टूट गए और ये लोग नंगे पैर तपती धूप में भूख-प्यास की परवाह किए बगैर पैदल चलते दिखाई दिए तो बायपास पर ही रहने वाले कुछ नागरिकों ने उनके पैरों में जूते-चप्पल की आवश्यकता को भी भोजन की जरूरत जैसा ही माना और बायपास पर चलने वाले लोगों के लिए जूते-चप्पल के स्टॉल लगवाए।

पीड़ा देखी तो बायपास राऊ जंक्शन पर लगा दिए जरूरतमंदों के लिए जूते-चप्पलों के स्टॉल

अहम यह कि जिन लोगों ने यह पुनीत कार्य मां अहिल्या की प्रेरणा से किया, उन्होंने अपना नाम बताने से इनकार कर दिया। हालांकि इस संबंध में जानकारी देखते हुए स्ट्रक्चरल इंजीनियर सुरेश सेठ ने बताया कुछ लोग हैं जिन्होंने बायपास पर राऊ जंक्शन के आगे जूते-चप्पल के स्टॉल लगवाए हैं। वे इसके लिए अपना नाम नहीं बताना चाहते, लेकिन उन्होंने यह जरूर बताया कि वे एक माह से लगातार हजारों-लाखों लोगों यहां से पैदल निकलते 24 घंटे देख रहे हैं। चाहे घनी काली रात हो या तपती दोपहर, गरीब मजदूर अपनी मजबूरी और जीवन बचाने की लालसा लिए भूख-प्यास और पैरों के छालों की परवाह किए बगैर निकल रहे हैं। कई लोगों ने इनके लिए भोजन एवं पानी की व्यवस्था कर दी। इसीलिए 27 किलोमीटर के बायपास पर इनकी यह आवश्यकता तो पूरी हो रही है, लेकिन सैकड़ों किलोमीटर तक लगातार पैदल चलने के बाद उनके पैरों से चप्पल और जूतों ने साथ छोड़ दिया और पैरों में छाले पड़ गए हैं।

उनकी मजबूरी और पीड़ा देख पांच बोरे जूते-चप्पल जुटाए, जारी रहेगी मदद

अतुल सेठ ने बताया जब यहां छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लिए महिलाओं को नंगे पैर चलते देखा तो आंखें भर आईं। जो बच्चे पैदल चल सकते थे, वे भी नंगे पैर ही तपती दोपहरी में यहां से गुजरते नजर आए, जिसके बाद बायपास के कुछ रहवासियों ने सोमवार से यहां चप्पल-जूते का स्टॉल लगाने की शुरुआत कर दी। पहले दिन सभी बच्चों, महिलाओं और पुरुषों की छोटी-बड़ी साइज के एक बोरा जूते-चप्पल का स्टॉल लगाया गया, जो बुधवार को खत्म हो गया। इसके बाद पांच बोरे जूते-चप्पल एकत्रित किए गए, जो यहां से गुजरने वालों को नि:शुल्क दिए जा रहे हैं। फिलहाल पांच बोरों का स्टॉक हमारे पास है। इसके अलावा कुछ रहवासियों ने यहां 24 घंटे भोजन की व्यवस्था भी की है। यहां बैठकर भोजन-पानी और कुछ देर सुस्ताने के लिए टेंट भी लगाया गया है। प्रतिदिन खाने के एक हजार पैकेट बायपास पर ही बनाकर वितरित किए जा रहे हैं।

कई घरों से एकत्र किए जूते

इंजीनियर सेठ के मुताबिक पांच बोरे चप्पल-जूते यहां हैं, जो अलग-अलग सोसायटी और रहवासियों से इकट्‌ठा किए गए। इनमें नए और पुराने दोनों तरह के जूते हैं। इसके बाद यहां रबड़ की चप्पलें नहीं रखेंगे। जिस प्रकार से इन्होंने प्लास्टिक और मोटे सोल वाले चप्पल-जूतों की मांग की है उसके अनुरूप ही नि:शुल्क प्रदान किए जाएंगे। इसके लिए चप्पल-जूते व्यवसायियों और फैक्टरी मालिकों से भी बात की जा रही है।

रबड़ के बजाय अब प्लास्टिक के सोल वाले जूते या चप्पल रखेंगे स्टॉल पर

पैदल गुजरने वाले ऐसे गरीब मजदूरों को जब यहां जूते-चप्पल मिले तो उन्हें ऐसा लगा कि उनका बहुत बड़ा दु:ख दूर हो गया। अधिकांश लोगों ने प्लास्टिक और मोटे तले वाली चप्पलें व जूते उठा लिए। कई का कहना था कि अभी सैकड़ों मील पैदल चलना है। अगर प्लास्टिक और मोटे तले वाली चप्पलें हमें मिल जाएं तो हमारी मुश्किल आसान हो जाएगी। रबड़ की चप्पल पैदल चलने से जल्दी फट या टूट जाती है। इसीलिए दानदाता यहां मोटे और प्लास्टिक सोल वाली चप्पलें रखेंगे।

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