खोजि होए तुरत मिल जाउं, इक पल की तलास में

भक्त कबीर कहते हैं ह्रदय का विश्वास ईश्वर के पास ले जाता है जबकि साक्षात् ईश्वर कृष्ण कहते हैं सत्संग और अनन्य प्रेमभक्ति भक्त को उनके पास लाती है। ख़ास बात यह कि ख़रा भक्त और ख़ालिस भगवान दोनों उन सभी उपायों को प्राप्ति में असमर्थ बताते हैं, जिन्हें समर्थ मानकर हम करते हैं।

-डॉ.विवेक चौरसिया, पौराणिक साहित्य के अध्येता
मेरे नगर उज्जैन में स्थित सेवाधाम नामक आश्रम 800 से अधिक दीन-हीनों का आश्रय है। इसमें देश भर से लाए गए रोगी, अनाथ, विक्षिप्त, समाज के सताए और अपनों के ठुकराए बच्चे, बूढ़े और महिलाएं एक छत के नीचे रहते हैं। कोई 32 बरस पूर्व स्थानीय समाजसेवी सुधीर भाई गोयल ने अपने बूते इसे स्थापित किया था जो आज पीड़ित मानवता की निःस्वार्थ सेवा का तीर्थ बन गया है। पिछले दिनों आश्रम के एक कार्यक्रम में प्रख्यात पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक व इंदौर के समाजसेवी अनिल भंडारी के साथ मैं भी उपस्थित था, जिसमें आश्रम के बच्चों ने संत कबीर के प्रसिद्ध भजन ‘मो को कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास रे’ पर आधारित एक अद्भुत लघु नाटिका प्रस्तुत की। सच कहूँ तो उस नाटिका के सन्देश की सुगंध ह्रदय में उस सौगन्धिक कमल की सुवास-सी बस गई है, जो पौराणिक कथाओं में उत्तर के दिग्पाल कुबेर के राजसी सरोवर में खिलता है और जिसकी सुगन्ध अजर अमर अखण्ड होती है।

नाटिका की प्रस्तुति, बच्चों का वस्त्र विन्यास और भावाभिव्यक्ति साधारण थी किन्तु सन्देश और उसे देने का तरीका अत्यधिक असाधारण। किशोरावस्था के कोई दस-बारह लड़के-लड़कियाँ मंच पर आए जिनमें एक इकतारा लिए मानो ‘ईश्वर’ रूप था और शेष ‘जीव’ या ‘मनुष्य’। मानव प्रतीक बच्चों में कोई योग करने लगा, कोई माला फेरने, कोई भक्ति करने तो कोई तप का अभिनय करता बैठ गया। सभी के यथास्थान बैठते ही पार्श्व में कबीर कृत भजन के स्वर गूंजने लगे…’मो को कहां ढूँढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में…! ना तीरथ मे ना मूरत में, ना एकान्त निवास में/ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना काबे कैलास में/ना मैं जप में ना मैं तप में, ना मैं बरत उपास में/ना मैं किरिया करम में रहता, नहिं जोग संन्यास में/नहिं प्राण में नहिं पिंड में,ना ब्रह्मांड अकास में/ना मैं प्रकुति प्रवार गुफा में, नहिं स्वांसों की स्वांस में/खोजि होए तुरत मिल जाउं, इक पल की तलास में/कहत कबीर सुनो भई साधो, मैं तो हूं विश्वास में/मो को कहाँ ढूँढे रे बन्दे मैं तो तेरे पास में…!’

हर ओर कथा-प्रवचनों का शोर है, कलश यात्राओं का दिखावा, जप-व्रत का ढोंग और तीर्थाटन-दान का पाखण्ड। केवल हिन्दू ही नहीं, इस्लाम हो या ईसाई, जैन हो या बौद्ध, क्रांतिकारी कबीर ने तो सबके ‘क्रिया-कर्मो’ की ख़बर ली है और ‘ईश्वर प्राप्ति के नाम पर’ इन सबको व्यर्थ साबित किया है।

भजन के बीच नाटिका कुल इतनी थी कि ‘ईश्वर’ रूप अभिनेता ने नाना विधियों से उसे भजते ‘मनुष्यों’ में प्रत्येक के पास जाकर उन्हें स्पर्श किया किन्तु सभी ने उपेक्षा से उसका हाथ छिटक दिया। ‘ईश्वर’ बारम्बार जप, तप, योग आदि क्रिया कर्मो में जुटे ‘मनुष्यों’ को उनके अपने ह्रदय में ही अपनी उपस्थिति का आभास कराता रहा मगर सब अपनी ही धुन में रमे रहे और ‘ईश्वर’ निराश लौट गया। बमुश्किल सात मिनट की प्रस्तुति का ‘क्लाइमेक्स’ परम् सन्देशदायी था, जिसमें अंत में जाकर ‘ईश्वर’ ने एक नन्हे बच्चे को स्पर्श किया और मानो निश्छल नयन और बाल मन के उस बच्चे ने ‘ईश्वर’ को पहचान लिया और उनसे लिपट कर ‘मुक्त’ हो गया। इधर मुक्ति घटी और उधर कबीर गाते रहे ‘खोजि होए तुरत मिल जाउं, इक पल की तलास में/कहत कबीर सुनो भई साधो, मैं तो हूं विश्वास में…!’

जिस घड़ी से यह प्रस्तुति दृष्टि पथ से गुज़री है, सोच में हूँ कि हम सब भी तो नाटिका के ‘मानव’ पात्रों जैसा ही आचरण और व्यवहार करते हैं। हर ओर कथा-प्रवचनों का शोर है, कलश यात्राओं का दिखावा, जप-व्रत का ढोंग और तीर्थाटन-दान का पाखण्ड। केवल हिन्दू ही नहीं, इस्लाम हो या ईसाई, जैन हो या बौद्ध, क्रांतिकारी कबीर ने तो सबके ‘क्रिया-कर्मो’ की ख़बर ली है और ‘ईश्वर प्राप्ति के नाम पर’ इन सबको व्यर्थ साबित किया है।

विडंबना ही है कि ईश्वर की अनुभूति इन क्रिया-कर्मो से नहीं होती मगर पंडे-पुरोहित, मौलवी-पादरी जैसे जगदीश और जीव के बिचौलिए संसार में जीवन संघर्ष से घबराए मनुष्य को बरगला कर इन क्रियाकलापों में उलझा देते हैं। ऐसा करके वे तो अपने स्वार्थ सिद्ध कर लेते हैं मगर मनुष्य सहज, सरल उपायों के सुलभ होते हुए भी ईश्वर प्राप्ति से वंचित रह जाता है। परिणामतः अपने दुःखों से दुःखी रह कर अशांत और रीता-सा बना रहता है। तब श्रीमद्भागवत महापुराण में उद्धवजी से कही भगवान श्रीकृष्ण की बात स्मरण हो आती है। कृष्ण ने कितना स्पष्ट कहा है कि ‘यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोSध्वरै:। व्याख्यास्वाध्यायसंन्यासै: प्राप्नुयाद् यत्नवानपि।।’ अर्थात् हे उद्धव! बड़े-बड़े प्रयत्नशील साधक योग, सांख्य, दान, व्रत, तपस्या, यज्ञ, श्रुतियों की व्याख्या, स्वाध्याय और संन्यास आदि साधनों से मुझे प्राप्त नहीं कर सकते परन्तु सत्संग के द्वारा मैं अत्यंत सहजता से सुलभ हो जाता हूँ।

साधो! भक्त कबीर कहते हैं ह्रदय का विश्वास ईश्वर के पास ले जाता है जबकि साक्षात् ईश्वर कृष्ण कहते हैं सत्संग और अनन्य प्रेमभक्ति भक्त को उनके पास लाती है। ख़ास बात यह कि ख़रा भक्त और ख़ालिस भगवान दोनों उन सभी उपायों को प्राप्ति में असमर्थ बताते हैं, जिन्हें समर्थ मानकर हम उन्हीं को करते और कर-करके इतराते जाते हैं। सच्चा खोजी इन मूर्खताओं में नहीं पड़ता। वह ह्रदय में ईश्वर के प्रति विश्वास रखता है और अनन्य भाव से भजता रहता है। ऐसे साधक को अनायास ईश्वर की अनुभूति हो जाती है। इसलिए कि वह मन्दिर, मस्ज़िद, चर्च, गुरूद्वारों में नहीं, हमारे ह्रदय में ही विराजमान हैं। वह रह-रहकर पुकारता है ‘मो को कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास रे…!’ बस हम सुने तो, सुनकर तनिक गुने तो…!

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