सोशल मीडिया पर लक्ष्मण रेखा

– सुरेश हिन्दुस्थानी

सोशल मीडिया पर जो कुछ चल रहा है, उसमें अनियंत्रण के चलते बहुत कुछ ऐसा भी दिखता है जो सीधे तौर पर राष्ट्रीय अस्मिता पर खतरा होती हैं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया को मर्यादा में रखने के लिए एक ऐसी लक्ष्मण रेखा खींचने का प्रयास किया है, जो समय के हिसाब से बहुत आवश्यक था। सोशल मीडिया के चलते देश के युवाओं पर विपरीत प्रभाव भी देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर क्या जाना चाहिए और क्या नहीं, यह भी विचारणीय बिंदु है लेकिन फिलहाल सरकार ने जिस प्रकार से मर्यादित रहने की रेखा खींची है, उससे ऐसा लग रहा है कि अब सोशल मीडिया की ऐसी सामग्रियों पर नियंत्रण लगेगा।

हम जानते हैं कि हमारे देश में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश के टुकड़े करने तक की बात कह दी जाती है। इतना ही नहीं इनको राजनीतिक संरक्षण और संवर्धन भी प्राप्त हो जाता है। कश्मीर में जो पत्थरबाजी होती थी, उसमें भी कहीं न कहीं सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका होती थी। इसी प्रकार आतंकियों के समर्थन में भी इसी सोशल मीडिया पर स्वर मुखरित होते रहे हैं। वास्तव में इस प्रकार के कृत्य देश के विरोध में ही होते हैं। अगर अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि जिस देश में राष्ट्रीय मर्यादाओं का ध्यान नहीं रखा जाता, वहां विसंगतियां निर्मित होती हैं। किसी भी देश के नागरिक को राष्ट्रीय मर्यादाओं का पालन करना आवश्यक और स्वाभाविक माना जाता है। सोशल मीडिया के माध्यम से यही चरितार्थ होना चाहिए। लेकिन हमारे देश में कभी कभी ऐसा भी दिखाई दे जाता है जिसमें राष्ट्रीय मर्यादा तार-तार होती दिखाई देती है। दिल्ली के जेएनयू में यही दिखा, जब देश विरोधी नारे लगाए गए। शाहीन बाग आंदोलन में भ्रम फैलाकर आंदोलन खड़ा करने को अभिव्यक्ति की आजादी का नाम दिया गया। जबकि सच कुछ और था और आंदोलन में कुछ और दिखाई दिया।

एक कहावत है कि किसी एक झूठ को सौ या इससे अधिक बार बोला जाए तो वह सच जैसा प्रतीत होने लगता है। यह सच जैसा इसलिए भी लगता है, क्योंकि जो सच है उसके बारे में हम जानने का प्रयास नहीं करते। इस कारण देश में एक बड़े भ्रम की स्थिति बनती है, जिससे समाज का बहुत बड़ा वर्ग प्रभाव में आ जाता है। हम जानते हैं ऐसे भ्रम को विस्तारित करने में सोशल मीडिया का भी बड़ा हाथ होता है। सोशल मीडिया पर इस प्रकार के संदेश प्रसारित करने वाले व्यक्तियों के विरोध में भी बातें उठाई जाती हैं, लेकिन जब ऐसा ही संदेश बहुत व्यक्तियों द्वारा प्रसारित किया जाता है, ऐसी स्थिति में थोड़े से विरोध के स्वर कहीं दबकर रह जाते है और उन व्यक्तियों के मंसूबे सफल हो जाते हैं, जिन्होंने भ्रम फैलाने का प्रयास किया।

अभी कुछ समय पूर्व सोशल मीडिया पर ही देखा कि सरकार को अडानी और अंबानी का नाम लेकर घेरा जा रहा था। यहां प्रमुख सवाल यह आता है कि यह दोनों कांग्रेस के शासनकाल में भी बड़े-बड़े प्रोजेक्ट लेते थे। स्वाभाविक ही है कि देश में कोई बड़ा काम होगा तो उस काम को कोई बड़ा व्यक्ति ही हाथ में लेगा। इसलिए यह कथन पूरी तरह से भ्रम की स्थिति पैदा करने वाला ही कहा जाएगा कि सरकार उद्योगपतियों को सबकुछ बेचने जा रही है। यह भ्रम सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया। किसान आंदोलन के नाम पर भी हमने हिंसा का तांडव देखा। विसंगति यह है कि 26 जनवरी की देश विरोधी हिंसा को भी राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा गया। इसके बाद कुछ संस्थाओं ने इस घटना से ध्यान हटाने के लिए किसान आंदोलन को और ज्यादा धारदार बनाने का प्रयत्न किया। यहां एक सवाल यह भी उपस्थित होता है कि सोशल मीडिया को संचालित करने वाले लोग उस समय अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं, जब भारत विरोधी पोस्ट की जाती है। जबकि भारत भक्ति का परिचय देने वाली पोस्ट को हटा दिया जाता है।

सोशल मीडिया के अब कई प्लेटफॉर्म हो गए हैं। जिनमें कई ऐसे हैं जहां द्विअर्थी शब्दों का प्रचलन बढ़ रहा है। ये केवल द्विअर्थी ही नहीं, बल्कि ऐसे हैं जिन्हें सार्वजनिक तौर पर बोला नहीं जा सकता। इसी प्रकार अश्लीलता भरे दृश्य भी देखने को मिल रहे हैं। ऐसे दृश्यों को देखे जाने वालों की संख्या भी इसलिए बढ़ रही है क्योंकि चारों तरफ ऐसे ही दृश्य हैं। आज देश में जिस प्रकार से व्यभिचार बढ़ रहा है, उसमें सोशल मीडिया का बहुत बड़ा हाथ है। बच्चे क्या कर रहे हैं, इस पर समयाभाव के चलते परिजनों को भी यह पता नहीं चलता कि वह दिनभर क्या देख रहा है। इसलिए भी इस पर अंकुश लगाना बहुत आवश्यक हो गया था। अब सोशल मीडिया को नियमों के दायरे में काम करना होगा। नए प्रावधानों के तहत अब महिलाओं से संबंधित अश्लीलता परोसने वाली पोस्ट पर कानूनी कार्यवाही की जाएगी। यह सामग्री एक दिवस में हटानी होगी।

वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया को भी नियमों का पालन करते हुए अपनी कार्यवाही संचालित करना चाहिए। भारत सरकार ने जो प्रावधान किए हैं, उसे व्यवहार में लाने की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। हमें भी यह तय करना होगा कि सोशल मीडिया पर क्या देखना और क्या नहीं देखना चाहिए। अभिवावकों को भी इसपर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है। सरकार ने अपनी ओर से पहल कर दी है। हम भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करें, तभी एक अच्छे समाज और अच्छे वातावरण का निर्माण कर सकेंगे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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