यूपी में जो रहे, सो यूपी का होये!

समाजवादी पार्टी के पुरोधा अखिलेश यादव ने कह डाला कि ”यूपी के सीएम यूपी के नहीं हैं।” हालांकि एक यूरेशियन अधेड़ आज प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री हो सकता है। अखिलेश यादव का उद्गार 20 फरवरी 2021 का है।

-के. विक्रम राव, वरिष्ठ पत्रकार
विश्वयारी में दृढ़ आस्थावान, समाजवादी पार्टी के पुरोधा अखिलेश यादव ने कह डाला कि ”यूपी के सीएम यूपी के नहीं हैं।” हालांकि एक यूरेशियन अधेड़ आज प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री हो सकता है। अखिलेश यादव का उद्गार 20 फरवरी 2021 का है। इसी दिन 1848 में लंदन में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिख एंजेल्स ने कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो जारी किया था। उसका नारा था ” दुनिया के मजदूरों एक हो, तुम्हें केवल अपनी जंजीरें तोड़नी हैं।” सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना 1956 में हैदराबाद में डॉ. लोहिया ने की थी तो पहला सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि ” मानव केवल एक राष्ट्र में ही नहीं, वरन् दुनिया के समस्त राष्ट्रों में समान हैं।” गीत भी था ”इस दुनिया से हम जब अपना हिस्सा मांगेंगे। एक बाग नहीं, एक खेत नहीं, हम पूरी दुनिया मांगेंगे।”

यह अखिलेश यादव के जन्म के दो दशक पूर्व की बात है। इसीलिये शायद इस लोहियावादी आस्था से वे अनभिज्ञ रह गये। अब पहेली बूझें कि योगी आदित्यनाथ आखिर हैं कहां के? यूपी के उत्तरी भूभाग (गढ़वाल हिमालय) के पचूरी गांव (पौढ़ी जनपद) में जन्मे, अजय मोहन सिंह बिष्ट उत्तराखण्ड की स्थापना (9 मार्च 2000) तक तो यूपी के ही थे। जैसे पश्चिम पंजाब में जन्मे इन्दर गुजराल और सरदार मनमोहन सिंह पाकिस्तानी रहते, मगर दिल्ली में बसे तो भारतीय हो गये। बात हो रही थी मुलायमपुत्र अखिलेश यादव की। ययाति के पुत्र यदु के वंशज अखिलेश यादव तो ब्रह्मलोक के थे। भूलोक के ब्रज मंडल में अवतरित होने के पूर्व। हालांकि उनके स्वजनों की एक शाखा द्वारका (वासुदेव कृष्ण) की दूसरी शाखा देवगिरी (राजा रामदेव यादव) की थी। इसी गणित के अनुसार तो जहीरुद्दीन बाबर फैजाबादी कैसे कहलायेगा? वह तो उजबेकी लुटेरा था।

अब घटनायें कुछ निकट की तारीखों की। आवास की सीमावाला नियम राजनीतिकों पर कभी भी लागू नहीं हुआ। बापू मूलत: काठियावाड़ी थे पर कार्यक्षेत्र पहले यूपी, बिहार और बाद में भारत रहा। जवाहरलाल नेहरु तो अखिलेश के मानदंड में फिर भारत के ही नहीं होंगे। कश्मीरी पंडित नस्ल के, एक कोर्ट मुहर्रिर के कुटुंब में, लाल रोशनीवाले मोहल्ले (गृहनंबर 77) मीरगंज में पैदा हुये थे। तो नेहरु कहां के कहलायेंगे? कश्मीर के अथवा यूपी के? अब कुछ देशव्यापी राष्ट्रवादी वाकयों का जिक्र हो। सहारनपुर में जन्मे, लखनऊ में पढ़े, यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष, केरल के राज्यपाल और केन्द्रीय मंत्री रहे, अजित प्रसाद जैन तुमकुर, मैसूर प्रदेश (आज का कर्नाटक), से तीसरी लोकसभा (1962) का चुनाव जीते थे। किसी ने नहीं पूछा जैन साहब से कि आप पश्चिम यूपी के हिन्दीभाषी हैं तो हमारे (कर्नाटक के) आंगन में आपका क्या काम है? ऐसा ही प्रश्न अखिलेश ने योगीजी से पूछा है। तुर्रा यह कि सैफई के अखिलेश तुमकुर में शिक्षित हुये थे।

थोड़ा और पिछले युग में चलें। ययाति के आत्मज यदु (चन्द्रवंशी) के वंशज चंबल (केन-बेतवा क्षेत्र) के शासक रहे। इसी यदु की ये संतानें आधुनिक मध्य प्रदेश से इटावा के सैफई में बस गये। लेकिन हैं तो दूसरे ही प्रान्त के! मसलन कश्मीरी पंडित, प्रयागवासी डॉ. कैलाशनाथ काटजू मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। भारत के गृहमंत्री और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल भी। किस भूभाग के कहलायेंगे? तार्किक रुप से अर्थ यही होगा कि आस्ट्रेलिया महाद्वीप में शिक्षित अखिलेश यादव क्यों योगी की जन्मस्थली देवभूमि को अवध-ब्रजभूमि क्षेत्र के लिये विदेशी समझते हैं? उत्तर प्रदेश के बाहरी राज्यों में कहावत भी है कि ”इंडिया, देट इज भारत, देट इज यूपी।” इस पर गर्व करने के बजाये अखिलेश यादव यूपी को खेमों में बाट रहे हैं। कल ही बांग्लावासियों ने ”जय श्रीराम” के जवाब में नारा लगाया है : ”आमार मेयेटी” (हमारी बेटी) है ममता बनर्जी, जो कल तक ”दीदी” थी। तो क्या अखिलेश यादव हमारे बांग्ला भाषियों को यूपी से बाहर निकालेंगे? केवल इसीलिये कि उनके पूर्वज बंगाल के हैं?

फिर बांग्लाभाषी किरणमय नंदा को क्यों यूपी से राज्यसभा में समाजवादी पार्टी ने भेजा? जवाब देंगे अखिलेश यादव कि क्यों यूपी के समाजवादी राजनेता वंचित कर दिये जायें? वैसे भी बाहर के हैं गोरखपुरवाले मधुकर दिधे (मराठी), सरदार बलवंत सिंह रामूवालिया (पंजाबी, सिख), कपिलदेव सिंह (बिहार), आजमगढवाले अबूहसन आजमी (महाराष्ट्र सपा के अध्यक्ष) और खासमखास अकबरपुर-टांडा के डॉ. राममनोहर लोहिया (राजस्थानी-मारवाड़ी) इत्यादि फिर अखिलेश यादव की धर्मपत्नी तथा अनुज की भार्या भी तो गढ़वाली हैं। योगीजी की पड़ोसन हैं?

गनीमत थी कि अखिलेश यादव ने द्वारका पर दावा नहीं ठोका कि उनके पूर्वज वासुदेव कृष्ण और यदुवंशियों की वह जायदाद थी। सैफई के यदुवंशी की जायदाद है। यूपी के महाधिवक्ता थे शांति स्वरुप भटनागर मुझे बताते थे कि कानून में ”सैनिक विजय” का कानून है। इसके तहत जो जीता वही मालिक होता है। वर्ना सारे सूर्यवंशी क्षत्रिय अवध और यदुवंशी मथुरा-द्वारका पर मिल्कियत का दावा पेश करते। इसी मापदण्ड पर उर्दूभाषी, अरब मतावलम्बी मिल्लतवाले जो अखिलेश के वोट बैंक हैं, क्या यूपी अथवा भारत के कहलायेंगे?

यह पोस्ट मैं आत्मरक्षण में लिख रहा हूं। नई दिल्ली में जन्मा और लखनऊ में परवरिश पाकर, मैं चेन्नई, सेवाग्राम तथा पटना में शिक्षित हुआ। नौ राज्यों में ”टाइम्स आफ इंडिया” का संवाददाता रहा। सात जेलों में रहा। कर्मचारी यूनियन में हूं। अत: मेरा अधिकतम तबादला हुआ। सात भाषाओं को जानता हूं। छह महाद्वीप के 51 राष्ट्रों में गया। विप्र हूं। दुर्भाग्य से पिछड़ा नहीं हूं। अर्थात अखिलेश की नजर में मैं भी यूपी का नहीं हो सकता! मैं होना भी नहीं चाहता, क्योंकि मैं पूरे भारत का हूं। लोहियावादी के नाते बिना पासपोर्ट-वीजा की दुनिया देखना चाहता हूं।

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