सुनील दत्त चाहते थे कि मधुबाला का नाम उनसे पहले आए

वीर विनोद छाबड़ा

यह किस्सा है मधुबाला और सुनील दत्त से जुड़ा हुआ। दोनों न केवल एक दूसरे के प्रशंसक थे, बल्कि आपस में बेहद सम्मान का भाव भी रखते थे। उस दौर में हीरो अपने नाम को सबसे आगे रखने के लिए आजकल की तरह छटपटाते नहीं थे और सार्वजानिक रूप से भी दरियादिली दिखाने में कभी पीछे नहीं रहते थे।

से आप मधुबाला को श्रद्धांजलि स्वरूप समझिए या उसकी मौत को भुनाने के लिए, ‘ज्वाला’ डिब्बे से बाहर आई। मधु की डुप्लीकेट के साथ बाकी फिल्म पूरी हुई। डबिंग भी कई नायिकाओं के सहारे हुई। ज्वाला के हीरो सुनील दत्त थे। सोहराब मोदी और प्राण की भी अहम भूमिकाएं थीं।

सुनील दत्त ने इससे पहले मधुबाला के साथ शक्ति सामंत की ‘इंसान जाग उठा’ में काम किया था। सुनील-मधु पर फिल्माए दो गाने बहुत मशहूर हुए थे-चांद सा मुखड़ा क्यों शरमाया…न ये चंदा रूस का है न ये जापान का…इस फिल्म की शूटिंग हैदराबाद से 100 किलोमीटर दूर कृष्णा नदी के ऊपर नागार्जुन सागर बांध के निर्माण के समय हुई थी। मधुबाला शायद पहली बार आउटडोर शूट पर थीं। उन्होंने सुनील दत्त को बताया – मुझे अपने मुल्क के मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम करना बहुत अच्छा लगा। मैंने अपने भारत को बनते देखा।

बहरहाल, ‘ज्वाला’ रिलीज होने को थी। सुनील दत्त के संज्ञान में आया कि प्रचार सामग्री में उनका नाम मधुबाला से पहले छपा है। यह ठीक है कि उस समय सुनील दत्त की पोजीशन बहुत अच्छी थी और दिवंगत मधुबाला को लोग लगभग भूल सा गए थे। और यह भी एक सच था कि मधुबाला की भूमिका का ज्यादातर हिस्सा डुप्लीकेट के सहारे पूरा हुआ था। लेकिन इन सबके बावजूद इस सच को झुठलाना मुश्किल था कि मधुबाला सुनील दत्त से सीनियर थीं।

‘इंसान जाग उठा’ में भी मधुबाला का नाम पहले था और दत्त साहब का बाद में। सुनील दत्त को यह बात अच्छी तरह याद थी। अत: उन्हें ‘ज्वाला’ में अपना नाम पहले देख बहुत तकलीफ हुई। अगर मधुबाला जिंदा होती तो यकीनन उसे भी नागवार लगा होता। यों भी सुनील दत्त एक भद्र पुरुष के रूप जाने जाते थे। समाज में उनका काफी रुतबा था। एक अच्छे फिल्मकार भी थे। दत्त परिवार के मधुबाला के बहुत अच्छे रिश्ते भी थे। जब मधुबाला की मृत्यु हुई थी तो सुनील दत्त किसी काम से दिल्ली गए हुए थे। जैसे ही उन्हें मधुबाला के गुजरने की खबर हुई तो सारे काम छोड़ कर तुरंत बंबई लौटे और फिर एयरपोर्ट से सीधे मधुबाला के घर पहुंचे थे।

इधर ‘ज्वाला’ काफी सामग्री पहले से ही मार्केट में जा चुकी थी। इसे वापस मंगाना मुमकिन नहीं था। फिर भी सुनील दत्त ने बची हुई प्रचार सामग्री में फौरन मधुबाला का नाम पहले रखवाया और पोस्टर्स में भी उनके चेहरे को प्रमुखता देने का अनुरोध किया। लेकिन फिल्म की नामावली में पहले सुनील दत्त का ही नाम रहा-‘सुनील दत्त इन ज्वाला’ और उसके बाद मधुबाला और बाकी कास्ट।

उन दिनों वरिष्ठको पहला स्थान दिए जाने का रिवाज था। जैसे अशोक कुमार की भूमिका भले कुल दस मिनट की हो, नामावली में उनका नाम सबसे पहले आता था। यश जौहर की ‘दुनिया’ में दिलीप कुमार के मुकाबले उनकी भूमिका बहुत छोटी थी, लेकिन सीनियर तो सीनियर ही है। अशोक कुमार पहले और दिलीप कुमार बाद में। वरिष्ठता को लेकर कई बार विवाद भी हुआ।

मनोज कुमार की ‘रोटी कपड़ा और मकान’ में अमिताभ बच्चन और शशिकपूर भी थे। शशि सबसे सीनियर थे। लेकिन उस समय भाव मनोज और अमिताभ का था। सबसे पहले नाम किसका आये? इसे सुलझाने का तरीका ईजाद किया गया- मनोज, अमिताभ…एंड अबव ऑल शशि कपूर।

शूटिंग हैदराबाद से 100 किलोमीटर दूर कृष्णा नदी के ऊपर नागार्जुन सागर बांध के निर्माण के समय हुई थी। मधुबाला शायद पहली बार आउटडोर शूट पर थीं। उन्होंने सुनील दत्त को बताया – मुझे अपने मुल्क के मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम करना बहुत अच्छा लगा। मैंने अपने भारत को बनते देखा।

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