ठग्गू बाई के दुःख ने रमाबाई को भारत की पहली लिबरल फेमिनिस्ट बना दिया

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर।

औरतों ने हमेशा से ही लोगों को आकर्षित किया है, उनपर गहरा प्रभाव डाला है। औरतों ने जब भी अपनी बुद्धिमत्ता से काम लिया है वो आम से महान की कैटगरी में शामिल हुईं हैं। अगर ढंग से याद किया जाए और किसी से पूछा जाए, खुद औरतों से भी कि औरत का अस्तित्व क्या है? तो शायद मौन के अलावा हमारे पास कोई जवाब नहीं होगा। लेकिन हर बार औरतों ने एक इतिहास रचा है। वहीं एक स्त्री ने 19वीं शताब्दी में पतृसत्ता को चैलेंज करते हुए पहली लिबरल फेमिनिस्ट बनी थी।

गुलाम भारत में स्त्री समाज की दशा बेहद ही दयनीय थी, परंतु कुछ समाज सुधारक जैसे राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती के अलावा एक स्त्री थीं पंडिता रमाबाई जिन्होंने इनके साथ मिलकर नारी उत्थान और स्त्री अस्मिता की लड़ाई लड़ रहे थे।

जब अपने गांव से भी किया गया बेदखल

रमाबाई को 12 साल की उम्र में संस्कृत के सैकड़ों श्लोक रटे हुए थे, जो इनके पिता ने इन्हें सिखाए थे। जब पिता का सान्निध्य रमाबाई को उम्दा भविष्य की ओर प्रेरित कर रहा था, तभी 1877 में भयंकर अकाल पड़ा और उनका लगभग पूरा परिवार खत्म हो गया। अब केवल रमाबाई और उनके भाई श्रीनिवास किशोरवय ही जीवित बचे थे।

दोनों महीनों तक ऐसे ही निर्जन भटकते रहे। कभी इन्हें अपने गांव से बेदखल होना पड़ा था, शायद ये इनका सबसे बड़ा दुख था लेकिन इस दौरान समाज की दुर्दशा को अपनी आंखों से देखकर इन्हें सामाजिक बुराई की वास्तविक स्थिति का साकार हो गया था। गांव वालों की हरकत के कारण रमाबाई ने समाज में सुधार लाने का प्रण किया ताकि ऐसा और किसी के साथ ना हो। 20 साल की उम्र में रमाबाई संस्कृत की ज्ञाता बन गईं। और अपने बड़े भाई के साथ 1878 ईं. में कोलकाता में रहने लगीं।

महिलाओं और शिक्षा पर जमकर काम किया

उस समय में महाराष्ट्र का महिला समाज भी दमनकारी नीतियों के नीचे दबा हुआ था। रमाबाई महिलाओं के उत्थान के पीछे खुद के ऊपर विश्वास को ज्यादा महत्व देती थीं. लिहाजा उन्होंने पूना में आर्य महिला समाज की स्थापना की और स्त्री-शिक्षा पर पुरजोर काम करने लगीं।

उन्हें पूना के अन्य समाजसेवियों और महिला शिक्षा के लिए कार्य करने वाले महानुभावों का भी साथ मिला। धीरे-धीरे आर्य महिला समाज की शाखाएं पूरे महाराष्ट्र में खुल गईं। सन 1882 में भारत में शिक्षा की पड़ताल करने के लिए भारत सरकार ने हंटर शिक्षा आयोग की नियुक्ति की। हंटर आयोग के द्वारा रमाबाई ने महिला शिक्षा के लिए अपनी आबाज बुलंद की, जो सीधे क्वीन विक्टोरिया के कानों तक पहुंची।

ठग्गू बाई के दुःख ने शारदा सदन शुरुआत कराई

डाक टिकट पर रमाबाई की तस्वीर. फ़ोटो सोर्स-पिंटरेस्ट


एक बार एक महिला जिसका नाम ठग्गू बाई था वह रमाबाई के घर भागते हुए पहुंची। वह महिला अपने आप को कुछ दुराचारी लोगों से अपने आपको बचाती हुई रमाबाई के शरण में पहुंची थी। रमाबाई ने उस महिला से अपनी आपबीती बताने को कहा फिर वह महिला अपनी पूरी आपबीती रमाबाई को सुनाई कि, किस प्रकर से उसे सामाजिक तिरस्कार का पात्र बनाया गया है। उस महिला ने बताया कि वह एक विधवा है जिसके कारण उसके ससुराल और मायके दोनों तरफ़ से तिरस्कृत कर दिया गया है।

ससुराल वाले इसका दोहन करते हैं और मायके के लोग उसे अभागन और कुलक्षिणी के नाम से बुलाते हैं। ठग्गू  बाई की आपबीती रमाबाई को झकझोर कर रख दिया और उन्हें विधवाओं की दुर्दशा व मनोदशा पर सोचने को मजबूर कर दिया। देश में असंख्यात महिलाएं हैं, जिन्हें विधवा समझकर समाज से तिरस्कृत कर दिया जाता है। ठग्गू बाई  की घटना के बाद रमाबाई ने निश्चय किया कि वह ठग्गू बाई  जैसी महिलाओं को उनके लिए निरंतर कार्य करती रहेंगी जब तक कि उन्हें उनका आत्म सम्मान न मिल जाये।

वह विधवाओं को गरिमापूर्ण जीवन, स्वावलंबी व आत्मा सम्मानित बनाने की कवायद में जुट गई। इस कार्य की पूर्ति के लिए वह इंग्लैंड प्रशिक्षण लेने चली गई। इंग्लैंड में जाने के कुछ समय पश्चात ही वो संस्कृत की प्रध्यापिका बन गई थी। बाद में वह अमेरिका चली गई जहां उन्होंने नई शिक्षा पद्धति का गहन अध्ययन किया।

किंडरगार्टन पद्धति प्रणाली के अंग्रेजी पुस्तकों के आधार पर मराठी पुस्तकें तैयार की और उन पुस्तकों से मिलने वाली राशि को शारदा सदन में लगाने का कार्य प्रारंभ किया, परन्तु इन पुस्तकों की राशि शारदा सदन को चलाने के लिए पर्याप्त नहीं थी इसलिए वह अमेरिकी जनता से सेवा सदन के लिए चंदा देने की अपील की, इस प्रकार से चंदे की रक़म से शारदा सदन की शुरुआत हुई, रमाबाई के अथक प्रयासों द्वारा बहुसंख्यक विधवाओं को स्वावलंबी व आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया गया।

ईसाई धर्म की स्वतंत्रता से प्रभावित हुई


अपनी बेटी मनोरमा के साथ रमाबाई. फ़ोटो सोर्स-पिंटरेस्ट



हिंदू धर्म में फैली कुरीतियां, सती प्रथा और विधवा प्रथा उन्हें कचोट रही थी। वह ईसाई धर्म में मिली स्वतंत्रता से काफी प्रभावित थीं। शायद वह हिंदू संस्कृति की रुढ़िवादिता को बर्दाश्त नहीं कर पाईं और ब्रिटेन के अपने प्रवास के दौरान ही उन्होंने हिंदू धर्म को त्याग कर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था और बाइबल का अनुवाद मराठी में किया।

रमाबाई ब्रिटेन दौरे के दौरान उन्होंने एक किताब लिखी जिसका नाम था ‘द हाई कास्ट हिन्दू विमेन’ जिसमें उन्होंने लिखा कि महिलाओं का हिंदू होना ही किसे बुरे परिणाम से कम नहीं है।


1907 में प्रकाशित ‘ए टेस्टीमोनी’ में रमाबाई बताती हैं, “महिलाओं के प्रति भेदभाव हिंदुवादी दर्शन में आंतरिक रूप से ही निहित है। दो बातों पर सभी धर्म शास्त्र, ग्रंथ, पुराण और आधुनिक कवि व लोकप्रिय उपदेशक और उच्च जाति के रूढ़िवादी लोग सहमत हैं कि उच्च जाति या निम्न जाति कि औरतें बहुत बुरी हैं और राक्षसों से भी गई-गुजरी हैं और झूठ कि तरह अपवित्र हैं।”

पंडिता रमाबाई को भारत की पहली लिबरल फेमिनिस्ट के रूप में भी जाना जाता है। वह सेप्टिक ब्रोंकाइटिस से पीड़ित थीं फिर भी सामाजिक बुराइयों से लड़ती रहीं  5 अप्रैल, 1922 को उनका निधन हो गया। अभी भी उनकी याद में यूरोप के चर्च में 5 अप्रैल को  फीस्ट डे  मनाया जाता है।

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