प्रजातंत्र के इतिहास का वह काला धब्बा

प्रकाश हिन्दुस्तानी

स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे प्रमुख घटना है आपातकाल। 25 और 26 जून 1975 की रात को वह लागू किया गया था। करीब 21 महीने बाद 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त घोषित किया गया। आपातकाल के दौरान चुनाव स्थगित हो गए थे और सभी नागरिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया था। प्रेस की आजादी पर सेंसरशिप लग गई। सोशल मीडिया तो उस वक्त था नहीं, न ही इंटरनेट के माध्यम से सूचनाओं का आदान-प्रदान हो सकता था। आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने मनमाने काम किए थे।

1971 के आम चुनाव में कांग्रेस को जबर्दस्त विजय प्राप्त हुई थी। लोकसभा में तब 518 सीटें थी, जिनमें से दो तिहाई से ज्यादा सीटों पर कांग्रेस का कब्ज़ा था। 352 सीटों के बहुमत से जीतने वाली कांग्रेस के पास इंदिरा गांधी के अलावा और कोई बड़ा नेता नहीं था। इंदिरा गांधी का राज काज एकाधिकारवादी तरीके से चल रहा था। उनके छोटे पुत्र संजय गांधी 5 सूत्रीय फ़ॉर्मूला लेकर आ गए थे, जिसके तहत देशभर में पेड़ लगाने, दहेज़ खत्म करने, स्वच्छता, अनुशासन और नसबंदी के अभियान चलाए जा रहे थे। इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में कम से कम 4 मंत्री ऐसे थे, जो प्रधानमंत्री के बजाय संजय गांधी के निर्देशों पर काम करते थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा गांधी से पराजित होने वाले समाजवादी पार्टी के नेता राजनारायण की तरफ से शांति भूषण पैरवी कर रहे थे। शांति भूषण ने कोर्ट में तर्क दिए कि इंदिरा गांधी के सचिव यशपाल कपूर ने सरकारी सेवा में रहते हुए इंदिरा गांधी के पक्ष में चुनाव प्रचार किया था। न्यायालय ने माना कि यह सरकारी मशीनरी और संसाधनों के मामले का दुरुपयोग है, लेकिन चुनाव में धन के दुरुपयोग की बात साबित नहीं हो पाई। भ्रष्टाचार के आरोपों से इंदिरा गांधी मुक्त थीं। इंदिरा गांधी ने न्यायालय में कहा कि उन्हें नई व्यवस्था कायम करने के लिए कम से कम 3 सप्ताह का समय दिया जाए। न्यायालय ने यह 3 सप्ताह का समय उन्हें दिया और उन्होंने 3 सप्ताह में नई व्यवस्था के नाम पर अपने आप को बनाए रखने की व्यवस्था शुरू कर दी।

 

उस वक्त कांग्रेस के जो हालात थे, उसमें इंदिरा गांधी के अलावा और किसी के प्रधानमंत्री होने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। कांग्रेस के अध्यक्ष डी.के. बरूआ थे, जिन्होंने नारा दिया था इंदिरा इज़ इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा। बरूआ प्रधानमंत्री बनने को तैयार थे और उन्होंने सुझाव दिया कि इंदिरा गांधी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभाले। जिस वक्त ये चर्चा चल रही थी कहते हैं कि तभी संजय गांधी वहां आ गए और उन्होंने अपनी मां को एक तरफ ले जाकर सलाह दी कि वे प्रधानमंत्री के रूप में बनी रहें। पार्टी के किसी नेता पर भरोसा करना ठीक नहीं है। इंदिरा गांधी को संजय की बात ठीक लगी, संजय ने कहा कि अभी हमारे पास 3 सप्ताह का समय है। हम सुप्रीम कोर्ट में जाएंगे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के 11 दिन बाद यानी 23 जून को इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई। याचिका में हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की अपील करते हुए सुप्रीम कोर्ट का फैसला होने तक इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बने रहने की मोहलत मांगी गई। सुप्रीम कोर्ट के ग्रीष्मकालीन अवकाश पीठ के न्यायमूर्ति थे वी.आर. कृष्णाअय्यर। उन्होंने कहा कि वे हाईकोर्ट के फैसले पर पूर्ण रोक नहीं लगाएंगे। इंदिरा गांधी अंतिम फैसला आने तक सांसद के रूप में वोट नहीं दे सकेंगी और न ही सांसद के रूप में वे वेतन और भत्ते ले सकेंगी।

तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद इंदिरा गांधी के इशारे पर काम करते थे और जब आपातकाल लागू करने के फैसले पर हस्ताक्षर करने थे, तब वे बाथरूम में बाथ टब में थे। आपातकाल लगाने के दस्तावेज पर उन्होंने बाथ टब में बैठे-बैठे ही हस्ताक्षर कर दिए थे। आपातकाल लागू करने के बाद 26 जून 1975 की सुबह आकाशवाणी से इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम एक संदेश प्रसारित किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि मैंने आम आदमी और महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं। उन कदमों से नाराज होकर विपक्ष मेरे खिलाफ साजिश रच रहा है। आपातकाल की घोषणा के तत्काल बाद सभी विरोधी पार्टियों के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। उन दिनों जयप्रकाश नारायण का आंदोलन बिहार में जोरों पर था। आंदोलन को कुचलने के लिए उसके नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। मेंटेनेंस ऑफ इंटरनेल सिक्युरिटी एक्ट (मीसा) कानून के तहत जिन लोगों को जेल में डाला गया, उनकी जमानत की कोई व्यवस्था नहीं थी। इंदिरा गांधी ने कहा था कि जयप्रकाश नारायण ने पुलिस और सेना के जवानों को उकसाया और यह कहा कि वे शासकों के आदेश न मानें। हालांकि जयप्रकाश नारायण ने ‘असंवैधानिक’ आदेशों की बात कही थी, लेकिन उसी को तोड़-मरोड़कर जयप्रकाश नारायण की गिरफ्तारी की गई।

अटल बिहारी वाजपेयी, मोरारजी देसाई, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस आदि प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। चंद्रशेखर उन दिनों कांग्रेस में थे और इंदिरा गांधी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस कार्यकारिणी के निर्वाचित सदस्य थे। उन्होंने भी आपातकाल के फैसले का विरोध किया था। सरकार ने चंद्रशेखर को भी गिरफ्तार कर लिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गैरकानूनी संगठन घोषित किया गया और संघ के कार्यालयों पर छापे मारे जाने लगे। साथ ही संघ से जुड़े हजारों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

जून 1975 से मार्च 1977 की अवधि के बीच के 21 महीने भारत में लाखों लोगों के लिए परेशानी का कारण रहे। इसे लोकतंत्र का सबसे काला समय भी कहा जाता है, लेकिन इसी काले अध्याय की कोख से भारत की पहली गैरकांग्रेसी सरकार बनी। यह बात और है कि विभिन्न कारणों से वह सरकार नहीं चल पाई, लेकिन यह मिथक टूट गया कि कांग्रेस के अलावा कोई और सरकार नहीं बना सकता। इंदिरा गांधी को लगने लगा कि चुने हुए प्रतिनिधियों के बजाय अगर उनके सचिवालय के सदस्य कोई काम करते हैं, तो वे उनके प्रति (इंदिरा गांधी) ज़्यादा वफ़ादार होंगे। इंदिरा गांधी प्रिंसिपल सेक्रेटरी पी.एन. हक्सर ने भी इसी तरह के विचारों को बढ़ावा दिया और एक नया शब्द दिया – ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’।
सत्ता में आने के दो साल बाद ही इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को दो भागों में बंटवा दिया। कांग्रेस नई और कांग्रेस पुरानी के रूप में दो खेमे बन गए। एक खेमा इंदिरा गांधी के समर्थन में था, तो दूसरा वरिष्ठ नेता निजलिंगाप्पा के साथ था। दोनों कांग्रेस में इंदिरा गांधी की नई कांग्रेस ज्यादा शक्तिशाली बन गई। इंदिरा गांधी ने जगह-जगह अपने निजी वफादार नेताओं को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाने की शुरूआत की।
इंदिरा गांधी ने बड़े और कड़े फैसले किए, जिससे उन्हें अपार लोकप्रियता मिली। उन्होंने गरीबी हटाओ का नारा देकर यह साबित करने की कोशिश की थी कि इंदिरा गांधी गरीबों के साथ हैं। दलितों और महिलाओं में वे इंदिरा अम्मा के नाम से प्रसिद्ध होती गई। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, पुराने राजाओं को सरकार की तरफ से मिलने वाला वजीफा, जिसे प्रीवी पर्स कहा जाता था, को समाप्त करना और पाकिस्तान से युद्ध में विजयी होना, ऐसी घटनाएं थीं, जिनसे इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के बजाय भारत की साम्राज्ञी की तरह स्थापित हो गईं।

1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजनारायण की चुनाव याचिका पर फैसला देते हुए कहा कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में धांधली की थी, इसलिए उन्हें छह वर्षों के लिए कोई भी महत्वपूर्ण पद नहीं दिया जा सकता। इंदिरा गांधी ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का ऐलान किया और 25 जून की देर रात देश में आपातकाल लगा दिया।

आपातकाल के दौरान विपक्षी नेताओं को जिन हालात का सामना करना पड़ा, उन हालात ने उन्हें एक होने पर मजबूर कर दिया। दरअसल हुआ यह था कि आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी को इतना ज्यादा आत्मविश्वास आ गया था कि अगर वे लोकसभा भंग करके चुनाव करवा दें, तो स्पष्ट बहुमत मिल सकता है। 1971 में उन्हें 528 सीटों में से 352 सीटें मिली थी और वे आश्वस्त थी कि इस बार उन्हें और ज्यादा सीटें मिलेंगी।
1977 के चुनाव में सम्पूर्ण विपक्ष ने जनता पार्टी नामक महागठबंधन बनाया और चुनाव लड़ा। नतीजा यह हुआ कि जनता पार्टी को बहुमत मिला और कांग्रेस की सीटें घटकर 153 रह गई। कांग्रेस को उत्तरप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और बिहार में एक भी सीट नहीं मिली। रायबरेली से जहां इंदिरा गांधी खड़ी हुई थी, हार का सामना करना पड़ा। मध्यप्रदेश में केवल दो सीटों पर कांग्रेस जीत सकी।

जनता पार्टी की सरकार में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। हरियाणा के चौधरी चरण सिंह उप प्रधानमंत्री बने। इस नई सरकार से लोगों को बहुत अपेक्षा थी कि वह ऐसा काम करेगी, जो पूर्ववर्ती इंदिरा गांधी की सरकार नहीं कर सकी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका, दो साल के भीतर ही जनता पार्टी की सरकार गिर गई। उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने ही दोहरी सदस्यता का मुद्दा उठाया और सरकार के लोगों का आरएसएस में जाना प्रतिबंधित कराया।

जनता पार्टी की सरकार अपने खुद के विरोधाभासों में फंस गई। आपसी झगड़े आए दिन सुर्खियां बनते रहे। लोगों के मन में यह धारणा बनती गई कि विपक्ष एकजुट नहीं हो सकता। इंदिरा गांधी ने भी खुलकर मोर्चा संभाला। इमरजेंसी की जांच के दौरान जब उन्हें न्यायालय ने गिरफ्तार करने का आदेश दिया, तो वे खुद आगे बढ़कर गिरफ्तारी देने के लिए पहुंची। उन्होंने जनता पार्टी की सरकार को बेमेल खिचड़ी बताया और दावा किया कि यह सरकार केवल पैसे वालों और आरएसएस की सरकार है। इसके बाद जो चुनाव हुए, उसमें इंदिरा गांधी की कांग्रेस असली कांग्रेस का दावा करती नजर आई। चुनाव प्रचार में जनता पार्टी की सरकार का मखौल उड़ाते हुए नारा दिया गया था – ‘चुनिये उन्हें, जो सरकार चला सकें’। जाहिर है इस प्रचार का मुख्य आधार यह था कि केवल कांग्रेस ही राज करने में सक्षम पार्टी है। लोगों को कांग्रेस की यह अपील पसंद आई और उन्होंने वापस कांग्रेस को ही सत्ता में ला दिया, लेकिन विपक्षी दल सत्ता का स्वाद चख चुके थे। इसके बाद छोटी-छोटी पार्टियों ने मिलकर गठबंधन और महागठबंधन बनाना शुरू किया और फिर एक ऐसा दौर आया, जब कांग्रेस को भी यूपीए जैसा गठबंधन बनाने के लिए आगे आना पड़ा।

25 जून 1975 की रात से 21 मार्च 1977 तक 21 महीने भारत में आपातकाल रहा। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने भारतीय संविधान की धारा 352 का उपयोग करते हुए आपातकाल की घोषणा की थी। आपातकाल के बाद जब आम चुनाव हुए, तब उसमें कांग्रेस बुरी तरह हार गई और आपातकाल की सिफारिश करने वाली इंदिरा गांधी को शाह आयोग की जांच का सामना करना पड़ा।

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