हाथरस की हकीकत – सुशांत केस की कवरेज में पिछड़े चैनल सबसे आगे की हाेड़ में कायदा भूले

 

तथ्यों को नजरअंदाज कर रिपोर्टिंग के बावजूद सब कहते रहे खबर का असर

नई दिल्ली से विष्णु शर्मा की रिपोर्ट


29 सितम्बर की सुबह दिल्ली के सफदरजंग में जैसे ही लड़की की मौत की खबर आई, न्यूजरूम में सुबह की मीटिंग के लिए अखबारों से खबरें इकट्टे कर रहे इनपुट और असाइनमेंट के लोग उछल ही पड़े, केवल रिपब्लिक चैनल को छोड़कर, क्योंकि वहां सुशांत और ड्रग्स को छोड़कर किसी और मुद्दे पर चर्चा ही नहीं हो रही थी। सूत्र बताते हैं सबसे ज्यादा एक्शन में आज तक और एबीपी न्यूज के न्यूज रूम थे। अगले दो घंटे में बड़े अधिकारी या तो ऑफिस में थे या लाइव चैट से मीटिंग में जुड़ चुके थे। साफ था 2 महीने से रिपब्लिक ने जिस तरह से आज तक को नंबर एक की कुर्सी से गिरा रखा है, एबीपी न्यूज में तो संपादक को ही हटा दिया गया है और उसकी वजह भी लगातार गिरती टीआरपी और चार्ट में 7वें नंबर का चैनल बन जाना है। सभी की समस्या थी रिपब्लिक और इलाज एक ही था- सुशांत के मुद्दे के जवाब में उतना ही बड़ा मुद्दा लाना।

 

मीडिया को मिला पूरा मसाला
हाथरस के मुद्दे में उन्हें वो सब नजर आ रहा था, दलित लड़की, गैंगरेप, प्रशासन का शुरुआत में गैंगरेप की धारा न जोड़ना, गर्दन की हड्डी, रीढ़ की हड्डी तोड़ने की बात और सबसे बड़ी बात लड़की किसी को न बता सके, इसके लिए उसकी जीभ काट देना। ये वाकई में दिलचस्प था, क्योंकि एएमयू की तरफ से डॉ. एफएम हुडा ने साफ कर दिया था कि जीभ नहीं कटी या काटी है, लड़की के कई वीडियोज भी बोलते हुए आए। डॉक्टर ने कहा कि उसे जीभ का अल्सर था, चोट लगी हो सकती है, लेकिन काटी नहीं गई है। वैसे भी नोएडा फिल्म सिटी में चैनल्स के दफ्तरों से महज 2 घंटे की दूरी पर है हाथरस का वो गांव, रात में ही बड़े एंकर, रिपोर्टर और मीडिया की ओबी वैन्स रवाना कर दी गईं।

 

डीएम साहब की नासमझी
ऐसे में डीएम ने जब ये कहा कि जीभ काटने की बात गलत है, तो मीडिया उस पर चढ़ गई क्योंकि उसने मान ही लिया था कि ऐसा हुआ है। उस वक्त परिवार के लोग जो बोल रहे थे, बस वही ठीक था। यहां डीएम को नेशनल मीडिया को हैंडल करने का अनुभव भी नहीं था, सो डीएम ने ध्यान ही नहीं दिया कि वो परिवार को जो बयान न बदलने को लेकर समझा रहा है या चेतावनी दे रहा है, वो रिकॉर्ड होकर चैनल्स पर धमकी के तौर पर भी चलाया जा सकता है।

 

सवर्णों को यकीन…
एक को छोड़ बाकी लड़कों को फंसाया गया
मामला हाथ से निकलता जा रहा था, इधर सोशल मीडिया पर घूम रहे वीडियोज से सवर्णों, खासतौर पर ठाकुरों को लगने लगा है कि उनके लड़कों को गैंगरेप में फंसाया जा रहा है और ज्यादातर हाथरस वासी, यूपी वासी भी समझ रहे हैं कि केवल संदीप हत्या का जिम्मेदार है, बाकी लड़कों को फंसाया गया और गैंग रेप नहीं हुआ है। अब तक सफदरजंग हॉस्पिटल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ चुकी थी, उसमें भी रेप की पुष्टि नहीं हुई थी। मीडिया को समझ तो आ चुका था कि मामला रेप का नहीं है, लेकिन न तो मीडिया और न ही योगी-मोदी विरोधी इस मुद्दे को ठंडा पड़ने देना चाहते थे। मौका दे दिया योगी के 25 लाख, एक सरकारी नौकरी, एक सरकारी आवास और 7 दिन में एसआईटी जांच के ऐलान के बाद के घटनाक्रम ने। तय किया गया कि 2 दिन तक एसआईटी की जांच पूरी होने तक मीडिया को गांव में एंट्री नहीं मिलेगी, लेकिन न तो इसे ढंग से सरकार बता पाई और न ही मीडिया ने इस सच को तबज्जो दी कि ये जरूरी है कि मीडिया एसआईटी जांच के दौरान दूर रहे।

 

नई गाइडलाइंस भी अफसरों को पता नहीं

इसके बाद आई आगरा से एफएसएल की रिपोर्ट, जिसमें साफ कहा गया कि जो विसरा 25 को भेजा गया था, उसमें कोई भी सीमन नहीं मिला है। रेप के कोई सबूत नहीं पाए गए हैं। योगी सरकार पूरी तरह से अधिकारियों के भरोसे है, जिनमें से बहुतों को मीडिया के मिजाज और आम आदमी से डीलिंग का कोई अनुभव नहीं है। एडीजी प्रशांत को जो रिपोर्ट मीडिया को लीक करने का फॉर्मूला इस्तेमाल करना था, वो उन्होंने खुद ही मीडिया को बता दिया और कह दिया कि कोई रेप नहीं है। वो ये भूल गए कि निर्भया केस के बाद नई गाइडलाइंस में रेप की परिभाषा विस्तृत हो चुकी है, अब वजाइनल पेनीट्रेशन या इंटरकोर्स ही रेप का आधार नहीं है, बल्कि रेप के इरादे से खींच कर ले जाना भी रेप की श्रेणी में आता है, सो संदीप पर तो ये धारा लगना तय है।

 

सीएम की विदेश में छवि की ज्यादा चिंता

एक और गलती कर दी योगी सरकार ने, योगी के करीबी अधिकारियों को योगी की छवि की चिंता देश में कम, विदेश में ज्यादा थी। जिस पीआर कंपनी से योगी सरकार का करार है, कांसेप्ट पीआर, उसको बोल दिया गया कि विदेशी संवाददाताओं को प्रेस रिलीज भेजकर बताया जाए कि एफएसएल और एएमयू मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट में रेप साबित नहीं हुआ है। लेकिन बीजेपी के विरोधी भी बड़े शातिर हैं, उन्होंने फौरन ये खबर चला दी कि योगी सरकार ने रेप केस में एक नई पीआर एजेंसी हायर कर ली है।

 

मोमबत्ती गैंग वाले बिहार से लाए गए
हंगामा काट दिया गया, न तो मीडिया और न ही मोदी-योगी विरोधी ये सुनने को तैयार थे कि रेप नहीं हुआ है, उनको मौका मिल गया ये कहने का कि मीडिया पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, परिवार को प्रशासन ने बंधक बना लिया है। इधर प्रशासन ने राहुल, प्रियंका को बैरंग लौटाकर माहौल और गरमा दिया। 2 दिन बाद मीडिया को इजाजत तो मिली तो एक दिन और परिवार के आरोप उन्होंने चलाए, राहुल-प्रियंका भी आए। उधर मीडिया को मोमबत्ती गैंग वाले नहीं मिल रहे थे, तो उन्हें बिहार के अलग-अलग शहरों से लाइव लिया जा रहा था, और तमाम राजनीतिक पार्टियां इसमें मदद कर रही थीं। जाहिर है सुशांत के बाद हाथरस के ड्रामे में बिहार चुनाव भी तो निशाने पर है।

 

हकीकत सबको मालूम, लेकिन फिर भी एक ही रट
हालांकि चैनल्स को भी हाथरस की हकीकत पता चल चुकी है कि एएमयू, एसएफएल और सफदरजंग हॉस्पिटल तीनों ही रेप की बात खारिज कर चुके हैं, फिर भी वो टिके हुए हैं, कभी जयंत चौधरी को कवर करने तो अखिलेश यादव का इंतजार करने, सवर्णों या ठाकुरों की पंचायत कवर करने आदि। उधर द वायर ने एक और खेल किया, एक ऐसी रिपोर्ट चलाई जिस पर एक्सक्लूसिव लिखकर 22 तारीख के लड़की के उस सैक्सुअल असॉल्ट फॉर्म पर लिखे बयान को डॉक्टर की रिपोर्ट की तरह दिखाया, कई मीडिया वालों ने इस गलतफहमी फैलाने वाली खबर को भी उठाया। इधर एसआईटी की प्रारम्भिक रिपोर्ट के आधार पर पांच पुलिस अधिकारियों पर एक्शन ले चुकी है योगी सरकार और सीबीआई जांच का भी ऐलान कर दिया गया है। परिवार का नार्को के लिए मना करना, सीबीआई जांच के लिए मना करना और केवल डीएम को निशाने पर लेना, इस बात को और पुख्ता करता है कि इस पूरे केस की हकीकत वो नहीं है, जो आपको नेशनल मीडिया ने दिखाई है।

 

दूसरे चैनल ने पब्लिक की राय को दी तवज्जो
लेकिन अब एंट्री हो गई नंबर एक खिलाड़ी की यानी रिपब्लिक की, इस चैनल ने तय कर लिया कि अब वो लाइन लेनी है, जो पब्लिक की राय है, लेकिन चैनल्स उससे बच रहे हैं। वो सब वीडियो और ऑडियो उसने चलाए जो नरेटिव गिरने के डर से बाकी चैनल्स नहीं चला रहे थे, यानी पीड़िता के और उसकी मां के पहले दिन के वीडियोज, वो ऑडियोज जिनमें परिवार से 25 लाख पर न राजी होने की बात की जा रही है, एसआईटी से क्या बोलना है, प्रियंका से क्या बोलना है जैसी बातें हैं।

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