निजी अस्पतालों की बेरुखी से चली गई हेड कांस्टेबल की जान

संतोष शितोले | इंदौर

इलाज के लिए दर-दर अस्पताल भटकते रहे परिजन, मौत

दुर्घटना, दंगा, कर्फ्यू में हमेशा घायलों को लेकर दौड़ पड़ते थे, पर खुद को 6 अस्पतालों में भी नहीं मिल पाया टायफाइड का इलाज

करीब 35 साल पुलिस विभाग में ईमानदारी से सेवा देने वाले, दुर्घटना, दंगा व कर्फ्यू के बीच घायलों को लेकर अस्पताल दौड़ने वाले एक रिटायर्ड बीमार हेड कांस्टेबल को लेकर परिजन दर-दर अस्पताल की ठोकरें खाते रहे लेकिन भर्ती नहीं किया। आखिरी में एमवाय अस्पताल में कोरोना टेस्ट किया और ईएसआई अस्पताल में भर्ती किया लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। तब तक हेड साहब की मौत हो गई। कोरोना और कर्फ्यू के बीच हुए इस दुखद वाकये ने एक बार फिर निजी अस्पतालों की बेरुखी व मनमानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस पुलिस विभाग के जवान 20 दिनों से दिनरात आमजन की स्वास्थ्य सुरक्षा में डटे हैं वे खुद भी सुरक्षित नहीं है।

मामला एलआईजी कॉलोनी में रहने वाले रिटायर्ड हेड कांस्टेबल राजाराम ढाकोने (63) का है। पिछले हफ्ते उन्हें बुखार था। इस पर परिजन उन्हें भण्डारी अस्पताल ले गए और बताया तो डॉक्टरों ने चेकअप कर उन्हें दवाइयां लिख दी। तीन दिन में कोई फर्क नहीं पड़ा तो परिजन फिर उसी अस्पताल ले गए तो डॉक्टरों ने फिर उन्हें दवाइयां लिखी और टायफाइड की आशंका जताई। इसके बाद भी उनकी तबीयत ठीक नहीं हुई और बुखार रहा।

हर अस्पताल ने दूसरे अस्पताल भेजा

  1. सोमवार को परिजन उन्हें राजश्री अपोलो हॉस्पिटल ले गए लेकिन वहां उन्हें देखने से ही मना कर दिया।
  2. इसके बाद उन्हें सिनर्जी अस्पताल ले गए तो वहां भी यहीं जवाब मिला और इलाज करने से मना कर दिया।
  3. यहां से उन्हें विशेष अस्पताल ले जाया गया तो वहां भी मना कर दिया और एमवाय ले जाने को कहा गया।
  4. परिजन उन्हें एमवाय अस्पताल ले गए और वहां उनका कोरोना टेस्ट कराया। यहां डॉक्टरों ने आइलोसेट होने को कहा और ईएसआई अस्पताल रैफर किया।
  5. इस बीच एमआईजी क्षेत्र स्थित त्रिवेणी अस्पताल में उनके ब्लड व यूरिन के सेम्पल की जांच कराई गई। इसमें पता चला कि उन्हें टायफाइड ही है।
  6. इधर, सोमवार शाम से ही वे ईएसआई अस्पताल के आइसोलेशन में थे। रात को उन्होंने परिजन ने मोबाइल पर बात भी की। कुछ देर बाद उन्हें सांस लेने में परेशानी हुई तो ऑक्सीजन लगाई गई।
  7. मंगलवार को भी उनकी हालत स्थिर ही रही। चूंकि आइसोलेशन में किसी को भी जाने की इजाजत नहीं है तो परिजन ने उन्हें बुधवार सुबह कई बार फोन लगाया लेकिन उन्होंने रिसीव नहीं किया।
  8. सुबह करीब 10 बजे परिजन अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों ने बताया कि रात को उनकी तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी और सुबह 8 बजे उनकी मौत हो गई। डॉक्टरों ने हार्टअटैक से मौत का संदेह जताया है जबकि कोरोना की रिपोर्ट आना बाकी है। नियमों के तहत परिजन अस्पताल से शव मुक्तिधाम ले गए जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया।

पांच दिनों में परिवार को दूसरा आघात

निजी अस्पतालों की बेरुखी का शिकार ढाकाने के मकान के पास में ही रहने वाली उनकी सास (बड़ी साली) अंबिका तन्तवाय (70) भी हुई। पांच दिन पहले वह भी बीमार हुई तो परिजन भण्डारी, सिनर्जी, विशेष सहित अन्य अस्पताल ले गए लेकिन इलाज नहीं किया और मौत हो गई। अब मामला कोरोना की जांच रिपोर्ट आने पर टिका है।

कर्फ्यू में तीन दिन तक नहीं लौटते थे घर

ढाकोने संयोगितागंज, हीरानगर, भंवरकुआ, विजय नगर आदि थानों में पदस्थ रहे। परिजन का दुख इस बात का है कानून व्यवस्था में वे तीन-तीन दिन तक घर नहीं लौटते थे और कर्फ्यू या कुछ, उन्होंने अपना फर्ज ईमानदारी से निभाया लेकिन जब वे बीमार हुए तो निजी अस्पतालों ने बेरुखी की जिससे उनकी जान चली गई। उधर, बुधवार को नगर निगम टीम उनके निवास पहुंची और वहां व आसपास के क्षेत्रों को सेनिटाइज किया।

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