आखिरी मुशायरा भी इंदौर में ही पढ़ा

प्रजातंत्र डेस्क।

चाहने वालों को तो उम्मीद थी अस्पताल से राहत देने वाली खबर आएगी, पर वे रुखसत ही हो गए, आप से ऐसी उम्मीद तो नहीं थी राहत भाई…

राहत इंदौरी की जिंदगी में जब आप दाखिल होते हैं तो पहला टापू आता है, उस पर रानीपुरा की तख्ती लगी होती है। वजह- राहत इंदौरी का बड़ा वक्त गुज़रा है, यहां शायराना सोहबत भी हासिल की।
रानीपुरा की अपनी अदबी तारीख़ है, जिसे इंदौर के कई शायर आगे बढ़ाते हैं। इस इलाक़े को अगर अदब का मरकज़ कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। हालांकि अब ऐसा कुछ रहा नहीं है। जब राहत इंदौरी के सामने रानीपुरा लाया जाता है, आंखों में चमक आ जाती है। उस्ताद दिखाई देने लगते हैं, सत्तार शाद भी घूमने लगता है। ग़नी मास्टर करीब से गुज़र जाते हैं, नशिस्त की आवाज़ आने लगती है। यहां के पटियों पर उन्होंने अगर अदबी गुफ्तगू की है तो उस रस्मी रस्सी को भी लम्बा किया है, जिसमें मज़ाक़ है, तंज़ है, मज़ा है।

शायर प्रो. अज़ीज़ इंदौरी याकूब साक़ी और तारीक़ शाहीन के साथ।

कहने लगे- “रानीपुरा की यही ख़ासियत रही है। यहां अगर संजीदा अदब वजूद में रहा तो अदबी शरारतें भी कम नहीं हुई हैं। मैं जब भी दिल्ली जाया करता, वहां के शायर दोस्त और अदीब मुझसे कहते आप दिल्ली ही आ जाइए, ग़ालिब से लेकर जितने शायर हुए हैं, सबने दिल्ली को पसंद किया है, अदब का मरकज़ है, यहां रहकर आप ज्यादा खिदमत कर सकते हैं, दूर तक पहुंच सकते हैं। ऐसी बात मुझसे अक्सर कही जाती थी, लेकिन मेरे लिए इंदौर छोड़ना कभी आसान नहीं रहा। जब मुझे दिल्ली में कोई इस तरह की बातें कहता, तब मैं उन्हें शे’र सुना देता था-

मेरी दिल्ली मेरा रानीपुरा है।
गली में कुछ सुख़नवर बैठते हैं।
वैसे मैंने ये शे’र भी कहा है-
इक इम्तेहान है रानीपुरा में रहना भी
ज़रा सा चूके तो ‘सत्तार शाद’ हो जाएं

एक ही इलाक़े पर इस तरह के दो शे’र सवाल करने पर मजबूर कर देते हैं। राहत इंदौरी का जवाब होता है- “मैं सिर्फ़ पहले की बात नहीं कर रहा, अभी भी रानीपुरा दो तरह का है, कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें देखकर ही इज्जत करने को जी चाहता है, जैसे मुफ्ती वलीउल्लाह साहब। अगर निकलते हैं अपने आप सलाम निकल जाता है, कुछ ऐसे भी हैं जो गुज़रते हैं तो कुछ न कुछ ज़रूर निकलता है। रानीपुरा इसलिए ख़ास है कि यहीं मैंने अपनी पहली नशिस्त पढ़ी थी। जिस तरह की अदबी अड्डेबाजी रानीपुरा में हुआ करती थी, वैसी महफ़िलें मुल्क के कई शहरों में दिखाई देती थीं। दिल्ली जामा मस्जिद के किनारे बड़े-बड़े शायर बैठते थे। यही हाल भोपाल के पटियों का रहा है, जहां कैफ़ भोपाली, शेरी भोपाली रात गुज़ारा करते थे। रानीपुरा में भी सारे शायर आते थे। इस पार, उस पार दोनों पार के और अदबी गुफ्तगू होती थी, शायरी होती थी। जब लोग ख़त्म हो गए तो पटिये टूटना ही थे।

डिक्शनरी लेकर आता हूं…

शायर प्रो. अज़ीज़ इंदौरी याकूब साक़ी और तारीक़ शाहीन के साथ।

रानीपुरा का ज़िक्र होता है तो बज्म-ए-अदब लाइब्रेरी दिखाई देती है। मुफ्ती वलीउल्लाह साहब सामने घूमने लगते हैं और ग़नी मास्टर भी दिख ही जाते हैं। राहत इंदौरी भी उन्हें भूल नहीं पाए हैं।
कहते हैं- “दिलचस्प आदमी थे, शायरों के दोस्त और ऐसे दोस्त थे जो उन्हें छीलने का कोई मौका छोड़ते नहीं थे। नश्तर इंदौरी के बेटे की शादी थी, जिसमें मुशायरा था। इंदौर के सभी शायर थे। सुनने वालों में हमेशा की तरह ग़नी मास्टर बैठे थे। चमकीली शेरवानी में सादिक़ इंदौरी ने ग़ज़ल पढ़ी, जो मुश्किल थी, यानी कठिन उर्दू का इस्तेमाल किया था। कुछ देर तो ग़नी मास्टर सुनते रहे, उसके बाद उठकर जाने लगे। इस अंदाज़ में उठे कि सब उनकी तरफ़ मुतवज्जे हुए। सादिक़ इंदौरी ने तो पूछ ही लिया, गनी मियां कहां चल दिए? चेहरे पर शरारत बिखेरते हुए ग़नी मास्टर ने जवाब दिया- डिक्शनरी लेने जा रहा हूं। इस तरह उनके कई किस्से थे। ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का दौर था। मैं पहली बार टीवी पर आया था। कोई मुशायरा दिखाया गया था, जिसकी इंदौर में खूब चर्चा थी। शहर वाले ख़ुश थे, मुबारकबाद दे रहे थे और मुबारकबाद देने ग़नी मास्टर भी आ गए। मैं रानीपुरा में ही था। टीवी पर जो मुशायरा आया था, उसमें मैंने जो ब्लेज़र पहना था, वही पहनकर बैठा था। ग़नी मास्टर क़रीब आए। न मेरी शायरी की तारीफ़ की, सीधे बोले- यही ब्लेज़र पहनकर तुम टीवी पर आए थे न! फिर ब्लेज़र कई दिन तक चलता रहा। बहुत हसीन वक्त था, जो अब लौटकर नहीं आएगा-
ज़िंदगी भी काश मेरे साथ रहती उम्र भर
ख़ैर अब जैसी भी होनी है बसर हो जाएगी

याराना… मुनव्वर राना और राहत इंदौरी।

अब ग़नी मास्टर को अहमद निसार आगे बढ़ाते हैं, कहते हैं- “राहत साहब के साथ मैं और मंज़र भोपाली पटिये पर बैठे थे। मस्ती चल रही थी, राहत साहब ने सभी शायरों को रानीपुरा से वाक़िफ़ करा रखा था, सिर्फ़ रानीपुरा से ही नहीं, ग़नी भाई से भी। सभी उन्हें जानते थे, क्योंकि जब भी मुशायरा पढ़ने आते, मास्टर से मिल ही लेते थे। हम लोग बैठे थे, तभी ग़नी भाई का उधर से गुज़रना हुआ। राहत साहब ने आवाज़ लगाकर बुलाया और कहा कि हमारे साथ मंज़र भोपाली बैठे हैं, मुल्क के बड़े शायर हैं, बहुत अच्छा पढ़ते हैं, इनकी कुछ फ़िक्र कीजिए, इनके लिए कुछ कीजिए, हमारे शहर में आए हैं। ग़नी मास्टर ने राहत साहब की तरफ़ देखा और जेब में से दो रोटी निकालकर उनके हाथ में रख दी। कहा- पकड़, बाक़ी का इंतज़ाम और करता हूं। हमारा हंसी का ठिकाना नहीं था, अचानक जेब से रोटी कैसे निकली, जानने की बेचैनी रही। दूसरे दिन ग़नी मास्टर से पूछा तो कहने लगे- “घर से रोटी लाया था, होटल जा रहा था; वहां से सालन लेकर खाना खा लूंगा, पर वो तो तूने छीन ली। राहत इंदौरी के दोस्त तारिक़ शाहीन कहते हैं- “राहत और रानीपुरा का गहरा रिश्ता रहा है। मुल्क में पढ़ने के बावजूद उनका रानीपुरा आना जारी रहा।

एसआई ने सिगरेट भी पिलाई…

अहमद निसार कहते हैं- “राहत साहब के पास स्कूटर हुआ करती थी और अक्सर पीछे वाली सीट पर मैं बैठा होता था। जुमा के दिन वो रानीपुरा आ रहे थे, जूनी कोतवाली पर पुलिस ने उनकी गाड़ी रोक ली। लाइसेंस और दूसरे काग़ज़ मांगे, जो नहीं थे। राहत साहब ने कहा- जुमा की नमाज़ को जा रहा हूं, अभी कुछ नहीं है, पर पुलिस नहीं मानी। वो गाड़ी छोड़कर ही रानीपुरा आ गए। नमाज़ में उनका हाथ शुरू से तंग रहा। ख़ैर, भाईजान ने हमें बताया और हम पहुंच गए गाड़ी लेने। सबइंस्पेक्टर को बताया- आपको पता है आपने किसकी गाड़ी पकड़ी है? राहत इंदौरी की गाड़ी है। उसे हैरत हुई। बोला- “क्या सच में उनकी गाड़ी है?” हमने कहा- हां, उन्हीं की है। उसका कहना था- “अभी छोड़ दूंगा, बस एक बार उनसे मुलाक़ात करा दीजिए।” फिर हम राहत साहब को लेकर आए। सबइंस्पेक्टर उनसे मिलकर ख़ुश हुआ और कहा- बताइए, क्या खिदमत कर सकता हूं। राहत साहब बोले- पहले तो गाड़ी छोड़ो और उसके बाद सिगरेट भी पिलाओ। गाड़ी तो छूटी ही, सिगरेट भी पी और पहली बार देखा कि पुलिस वाले किसी को कुछ पिला रहे थे।

 

राहत ने जब शे’र पढ़ा.. दिलीप कुमार ने खड़े होकर दी थी दाद

रा हत इंदौरी जब रंग से खेला करते थे, तब भी उनके पास कई दोस्त थे, लेकिन उनकी रंगीन जिंदगी के गवाह अब ज्यादा नहीं है। जो है, उनमें ख़ूबसूरत आवाज़ के मालिक हीरा दानीवर भी हैं। इंदौर में ही रहते हैं, पर अरसे से राहत से नहीं मिल पाए थे। करीब पंद्रह साल बाद मिले और जब उनसे जवान राहत इंदौरी का ज़िक्र किया, तो उन्होंने बच्चे राहत कुरैशी से शुरुआत की। हीरानंद दानीवर जैसे ही अपने दोस्त की बात शुरू करते हैं, कुछ अलग हो जाते हैं। शे’र उन्हें ना-मालूम कितने याद हैं और वो नज्में भी याद हैं, जिन्हें शायद राहत इंदौरी भी भूल गए हैं। सिर्फ़ शायरी तक नहीं हैं, उनकी तिजोरी में शरारती राहत इंदौरी भी कैद हैं। हर किस्सा पेट पकड़ने को मजबूर कर देता है और बताता है आज का बड़ा शायर कितना खुशमिज़ाज, मस्ताना और शरारती रहा है। कई घंटे आसानी से दानीवर निकाल देते हैं और मजाल है उनकी ज़ुबान राहत इंदौरी से थोड़ी भी भटक जाए।

कहते हैं- “मैं और राहत इंदौरी उन दिनों (1966) के दोस्त हैं जब हम नूतन स्कूल में नौवीं में पढ़ा करते थे। दसवीं और ग्यारहवीं भी हमने यहीं पढ़ी। उसके बाद आर्ट्स कॉलेज में एडमिशन ले लिया। मुझे गाने का शौक़ था, चटर्जी ऑर्केस्ट्रा का मैं पहला सिंगर था, मोहम्मद रफ़ी को गाता था। कॉलेज में कॉम्पटिशन थी, तब राहत इंदौरी ने मुझसे कहा- मैं भी गाऊंगा।

मुझे नहीं पता था वो गा लेते हैं। मैंने पूछा- क्या गाओगे? बोले- ‘झूमती चली हवा याद आ गया कोई…’ मुझसे पूछा- तुम क्या गाओगे? मैंने कहा- राजा और रंक का- फिरकी वाली तू कल फिर आना…। राहत बहुत आसान नहीं थे, शरारत करते थे और हाथ भी उनका खुला था, लड़ाई-झगड़े कर लेते थे। लोगों की फिरकी लेना उनका शगल था, मस्तख़ोर थे और फ़नकार होने के सारे गुण उनमें दिखते थे… पर ईमानदारी से कहें किसी को नहीं पता था ऐसा भी होने वाला है जैसा हुआ है और जहां तक राहत पहुंचे हैं। जहां हमें गाना था, वहां किसी को गाने नहीं दिया जा रहा था, हूटिंग हो रही थी। तभी राहत पहुंचे और उन्होंने गाना बदल दिया। अब उनकी ज़ुबान पर था- ‘ये दिल न होता बेचारा…।’ पर बात बन नहीं पाई, लेकिन उन्हें समझ आ गया गाना उनका काम नहीं है। बस, इसके बाद उन्होंने लफ्ज़ बुनना शुरू कर दिए। हालात ठीक नहीं थे, इसलिए मैंने कॉलेज बदला और क्रिश्चियन कॉलेज पहुंच गया, लेकिन राहत सिर्फ़ पढ़ते नहीं थे, काम भी करते थे। जहां कभी सरोज टॉकीज हुआ करता था, बस वहीं उनकी दुकान थी। शानदार पेंटर थे। फ़िल्मों के पोस्टर तो बनाते ही थे, दुकानों के बोर्ड बनाने में उनको महारत थी। मैं टेलरिंग का काम करने लगा था। ऐसा कोई दिन नहीं था, जब उनसे मुलाक़ात न होती हो। उनकी दुकान पर वक्त गुजरता था। वो मेरी दुकान पर साइकिल से आते थे। जहां वो काम करने जाते, हम भी साथ चले जाते। वो सीढ़ियों पर चढ़कर बोर्ड बनाते और नीचे से हम सामान उठाकर देते थे। लाज़वाब पेंटर थे और ब्रश पर उनकी शानदार पकड़ थी। जहां मिल्की-वे टॉकीज हुआ करता था, वहां वो मैंने राहत के साथ कई शहरों का सफ़र किया। मुम्बई भी हम गए। जिस मुशायरे में थे, उसके मेहमाने खुसूसी दिलीप कुमार और हाजी मस्तान थे। सदारत नौशाद साहब की थी। कई यादगार सफ़र रहे हैं। इस मुशायरे में राहत को ख़ूब दाद मिली, उन्होंने पढ़ा था-

तू तो अपने मश्विरों का ज़ख्म देकर छोड़ दे
मुझको जिंदा किस तरह रहना है मुझ पर छोड़ दे

ये शे’र पढ़ा तो दिलीप कुमार खड़े होकर दाद दे रहे थे-

दिल तेरे झूठे ख़तों से बुझ चुका,

अब आ भी जा, जिस्म के गौतम से क्या उम्मीद कब घर छोड़ दे

नूर इंदौरी ने उन्हें लॉन्च किया

सिर्फ फ़िल्म और सियासत में ही जोड़ियां नहीं रही हैं, मुशायरों में भी जोड़ियों ने कमाल किया है। इसमें एक जोड़ी नूर इंदौर और राहत इंदौरी की थी। इससे इनकार नहीं। राहत से पहले नूर इंदौरी ऐसे थे, जिन्होंने इंदौर को दूर तक पहुंचाया। अब वो नहीं हैं, पर उनकी आवाज़ ज़िन्दा है। शायद ही कोई ऐसा ख़ित्ता हो, जहां नूर इंदौरी की आवाज़ न पहुंची हो। इस आवाज़ से सब वाक़िफ़ है। राहत इंदौरी के शायराना सफ़र में नूर इंदौरी का ज़िक्र राहत भरा है। बिना नूर के राहत को मुकम्मल नहीं किया जा सकता, क्योंकि मज़बूत साथ रहा है, ऐसा जो सिर्फ मुशायरों तक नहीं था, दिल का साथ था… बिना नूर इंदौरी के राहत इंदौरी का सफ़र हो नहीं पाता था। नूर इंदौरी ने राहत के सामने जो शमा रखी थी, उसमें उन्होंने इज़ाफ़ा ही किया है, लेकिन राहत इंदौरी इस शमा को किसके सामने रखेंगे, इसका इंतज़ार है, क्योंकि नूर से राहत तक का सफ़र तो हो गया, पर राहत से आगे कुछ दिखाई नहीं देता है। ख़ैर, नूर इंदौरी को कबूल करने में राहत इंदौरी ज़रा वक्त नहीं लगाते और कहते हैं- “नूर साहब ने मेरी ख़ूब मदद की, सिफ़ारिश भी की।

 

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