नीति आयोग के सदस्य बोले ‘कश्मीर के लोग गन्दी फ़िल्में देखते हैं।’

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद लागू किए गए इंटरनेट पर प्रतिबंध धीरे-धीरे हटाए जा रहे हैं। इसी बीच नीति आयोग के एक सदस्य ने इस मामले को सही ठहराते हुए इसे गंदी फ़िल्म से जोड़ दिया।

दरअसल सारस्वत से सवाल पूछा गया था, जिसमें कहा गया था कि जम्मू और कश्मीर इंटरनेट सेवा पर रोक क्यों लगाई गई। जबकि संचार भारत के विकास की चाभी है?

नीति आयोग ने सदस्य वीके सारस्वत ने जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट बैन को सही ठहराते हुए एक विवादित बयान दे दिया। वीके सारस्वत ने कहा, “ये जितने नेता वहां जाना चाहते हैं, वो किसलिए जाना चाहते हैं? वह जैसे आंदोलन दिल्ली की सड़कों पर हो रहे हैं, वो कश्मीर की सड़कों पर लाना चाहते हैं। जो सोशल मीडिया है उसको वे आग की तरह इस्तेमाल करते हैं, तो आपको वहां इंटरनेट ना हो तो क्या अंतर पड़ता है? और वैसे भी आप इंटरनेट में वहां क्या देखते हैं? वहां गंदी फिल्में देखने के अलावा कुछ नहीं करते आप लोग।”

हालांकि थोड़ी देर बाद बात को संभालते हुए सारस्वत ने कहा कि मैं यह बात बता रहा हूं कि अगर इंटरनेट सुविधा वहां नहीं है तो उससे अर्थव्यवस्था पर कुछ खास अंतर नहीं पड़ेगा।

सारस्वत का यह बयान ऐसे समय आया है जब जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने घाटी में प्रीपेड मोबाइल सेवाओं पर पांच महीने से लगी रोक को हटाने का आदेश दिया है। एक आधिकारिक प्रवक्ता ने बताया कि इसके अलावा पूरे जम्मू क्षेत्र में पोस्टपेड कनेक्शनों पर 2जी मोबाइल डेटा सेवा भी बहाल कर दी गई।

वहीं कश्मीर में पोस्टपेड मोबाइलों पर 2जी मोबाइल डेटा सेवा केवल दो जिलों-कुपवाड़ा और बांदीपोरा में शुरू की गई हैं। प्रशासन ने घाटी में सॉफ्टवेयर सेवाएं देने वाली कंपनियों से फिक्स्ड लाइन इंटरनेट संचार सेवा को सावधानीपूर्वक शुरू करने का भी आदेश दिया है।

राजनीति का अड्डा बना जेएनयू

जेएनयू में जारी विरोध प्रदर्शनों पर, सारस्वत ने कहा, “जेएनयू के चांसलर ने कहा है कि जेएनयू एक राजनीतिक युद्ध का मैदान बन गया है। यह 10 रुपये से लेकर 300 रुपये तक फीस वृद्धि का मुद्दा नहीं है। हर कोई स्कोर तय करने की कोशिश कर रहा था। मैं राजनीतिक दलों का नाम नहीं लूंगा।”

आगे उन्होंने कहा कि जेएनयू एक ‘वाम-झुकाव’ संस्थान के रूप में आगे बढ़ रहा है। 600 शिक्षकों में से 300 शिक्षर कट्टर वामपंथी समूह से संबंध रखते हैं।

जेएनयू को बंद करना कोई रास्ता नहीं

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सारस्वत ने कहा कि जेएनयू को बंद करना कोई समाधान नहीं है। हम एक लोकतंत्र हैं और हमें लोकतांत्रिक तरीके से इस समस्या को हल करना होगा। हमारी सरकार, शिक्षा विभाग और इससे जुड़े सभी लोग इस समस्या को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।

हम ऐसे कठोर कदम नहीं उठा सकते। लेकिन इन्हीं कारणों से 1980 के दशक में, जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कुलाधिपति थीं तब जेएनयू को 45 दिनों के लिए बंद कर दिया गया था। उस समय तिहाड़ में 800 छात्रों को जेल में डाल दिया गया था। उन्होंने कहा कि जेएनयू के कुलपति एम जगदीश कुमार अच्छा काम कर रहे थे।

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