नेहरू की नीति के कारण नहीं हुआ तीसरा महायुद्ध

आनंद मोहन माथुर

हिन्दुस्तान आजाद हो चुका था, दो महाशक्तियां द्वितीय युद्ध के बाद अंरर्राष्ट्रीय सीन पर प्रकट हुई एक थी सोवियत संघ और उसकी समाजवादी विचारधारा जिसमें निजी इन्टरप्राइज को कोई स्थान नहीं। दूसरी थी दक्षिण पंथी विचारधारा जिसका आशय था प्रायवेट इन्टरप्राइज मतलब देश का सारा उद्योग व्यापार निजी हाथों में आ जाए। इस पूंजीवादी विचारधारा का पोषक था अमेरिका।

सदियों से सामंतवादी व्यवस्था को यह देश झेल रहा था, इस व्यवस्था में बराबरी का कोई स्थान नहीं था, एक मालिक था और दूसरा गुलाम, जिसको किसी तरह के कोई प्राकृतिक नैतिक या मौलिक अधिकार नहीं होते थे। ब्रिटिश राज आने के बाद देशी राजाओं की जनता तो गुलाम की गुलाम थी। ब्रिटिश सम्राट के गुलाम थे देशी रियासत के राजा और इन गुलामों की गुलाम थी इनके राज में रहने वाली जनता। लगभग 300-350 वर्ष के अंग्रेजी राज में इस देश के उद्योग-धंधे चौपट हो गए थे। जमीन जोतने वाला किसान जमीन का मालिक नहीं था बल्कि वह या तो किरायेदार होता था या खेतीहर मजदूर, हिन्दुस्तान का कपड़ा उद्योग युद्ध और विदेषों के लिए कपड़े तैयार करता था। यहां जो भी कच्चा माल पैदा होता था चाहे वो कपास हो, लोहा हो या कोयला हो सब इंग्लैंड की मिलों के लिए जाता था और वहां से पक्का माल बना हुआ हिन्दुस्तान आकर महॅंगे दर पर बिकता था। भारत के नागरिकों में या तो अमीर थे या गरीब क्योंकि दोनों की आय में बहुत अंतर था। भारत के प्रशासन में भारतीयों का कोई सम्मानजनक स्थान नहीं था। चारों तरफ जमींदारों और जागीदारों, ताल्लूकेदारों, राजाओं, महाराजाओं की विलासता का आलम था। प्रत्येक भारतीय मान सम्मान से वंचित था उसे किसी प्रकार की बोलने की, पढ़ने की, लिखने की, सभाएं करने की, जुलूस निकालने की, सम्पत्ति की, घूमने फिरने की, कहीं भी निवास करने की और कहीं भी उद्योग धंधा करने की स्वतंत्रता नहीं थी। हर हिन्दुस्तानी एक हाड़ मांस का पुतला था लेकिन न उसमें आत्मा थी और न आत्मसम्मान। भारतीय मिल मालिक भी मजदूरो का पूरा शोषण करते थे, मिल में उनको 12 घंटे काम करना पड़ता था, कोई छुट्टी नहीं मिलती थी, कोई मजदूरी की ग्यारंटी नहीं थी, कोई पीएफ या ग्रेच्युटी की सुविधा नहीं थी। खाद्यान भी इतना पैदा नहीं होता था कि देश में सबका पेट भर सके, इसलिए अकाल होते रहते थे। कपड़ा बनाने वाले के तन पर कपड़ा नहीं था। भारत की जनता गरीब, भूखी, प्यासी, बेरोजगार, अशिक्षित, अंधविश्वासी, अकरमण्य, आलसी और निराश थी। जो जमींदार थे या जिनके पास पैसा था उनके बच्चे ही ब्रिटेन से डॉक्टर बन कर आते थे। कुछ वहां से आईसीएस बनकर आते थे, कुछ हाईकोर्ट जज बनकर आते थे और कुछ बैरिस्टर बनकर आते थे।

नेहरू राष्ट्र निर्माता के रूप में : देश में न मशीनें बनती थीं, न मशीन बनाने वाली मशीनें, एक सूई भी हिन्दुस्तान में नहीं बनती थी, ऐसी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था नेहरू को विरासत में मिली थी। नेहरू ने समानता लाने के लिए सामंतवाद को खत्म किया और गरीब किसान को यह तोहफा दिया कि ‘‘जो जोते उसकी जमीन’’ कृषि भूमि का बराबर का बंटवारा, कृषि उपज बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े बांधों के निर्माण जिनसे पानी और बिजली मिल सके। मशीन बनाने वाली मशीनें बनाने के लिए भेल जैसा संस्थान बनाया, शिक्षा के विकास के लिए आयोग बनाए जिसमें विश्वविद्यालयों की स्थापना की। स्वास्थय के क्षेत्र में दिल्ली में एम्स जैसा संस्थान बनाए। शिक्षा के लिए अनुदान आयोग बनाया और उच्च शिक्षा तथा तकनीकी शिक्षा पर नियंत्रण के लिए आयोग बनाया। कृषि की आवश्यकता के लिए खाद के बड़े कारखाने बनाये। हिन्दुस्तान के प्रमुख वैज्ञानिक जैसे सी.वी. रमन, होमी भाभा, शांति स्वरूप भट्नागर एवं अन्य धुरंधर विद्वानों की सहायता से सी.वी. रमन इंस्ट्टीयूट बनाया, होमी भाभा इंस्टीट्यूट बनाया, एस.एस. भटनागर केन्द्र बनाया। बंबई के वर्ली में नेहरू तारामंडल बनाया। 1952 के चुनाव सिर पर थे इसलिए चुनाव आयोग का गठन किया तथा 1952-1957 के आम चुनाव सफलता पूर्वक सम्पन्न करवाया। गणतंत्र होने से भारत की आमदनी को केन्द्र और राज्यों में उचित रूप से बांटना था उसके लिए वित्त आयोग बनाया और इन सबके ऊपर संविधान पास करवा कर उसको लागू करवाया। संविधान में महिला, बच्चे, पिछड़ा वर्ग, दलित, आदिवासी और धार्मिक तथा भाषाई अल्पसंख्यकों को संरक्षण दिलवाया। समता को इस देश का आधार बनाया। अवसर की प्राप्ति के लिए आरक्षण दिलवाया और दोनों महाशक्तियों से बराबरी का फासला रखकर एक स्वतंत्र विदेशी नीति बनाई। इन सारे कामों का बोझ नेहरू ने उठाया क्योंकि ये ही इस भारत के निर्माण का आधार थे।

नेहरू की विदेश नीति – पंचशील : नेहरू ने विदेश नीति में पंचशील का सिद्धांत प्रतिपादित किया है इसके अन्तर्गत भारत निरगुट देश रहेगा और उसमें तीसरी शक्ति जिसे निरगुट पक्ष कहा जा सकता है वह बनाई और उसमें नई नई आजादी पाए देशों को शामिल किया। उस समय जैसे हालात थे उसने एक महाशक्ति अमेरिका एक गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और दूसरी महाषक्ति सोवियत संघ दूसरे गुट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और दोनों गुटों में बेहतर महाशक्ति बनने के लिए चल रहा था। किसी भी गुट में शामिल होना उस महाशक्ति के साथ रहना एक तरह की गुलामी थी, जो आपसे ताकतवर है उससे आप कभी भी मतभेद नहीं रख सकते है क्योंकि आपकी सारभौम सत्ता तो उसके अधीन हो गई है। नेहरू ने भाखड़ नागल बांध का प्रोजेक्ट अमेरिका को दिया था तो भिलाई स्ट्रीट प्लांट का प्रोजेक्ट सोवियत संघ को दिया था।

अतएव भारत पर किसी की भी हुकुमत नहीं चल सकती थी और दोनों ही अपने व्यापारिक हितों के लिए भारत की आजादी और विकास में सहयोग कर रहे थे। नेहरू ने पंचशील का सिद्धांत विदेश नीति में प्रतिपादित किया था। ये नीति 5 निम्न सिद्धांतों पर आधारित थी।
1. एक दूसरे का सम्मान अपने देश की सीमा, एकता और सारभौमिकता कायम रखना।
2. आपसी हमला न करने का करार।
3. एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखलअंदाजी नही।
4. समान और आपसी हितों का फायदा।
5. शांतिपूर्ण सहअस्तित्व।

इस तीसरे गुट में दुनिया के हाल ही में आजाद हुए, उपनिवेशों से मुक्ति पाये हुए विकासशील देश थे, जिनमें मिश्र, मलेशिया, चीन, बर्मा और भारत थे।
इन सब देशों में चीन बहुत चालक देश था, वो एशिया में अपना प्रभुत्व चाहता था न कि भारत का, इस प्रभुत्व को पाने के लिए उसने एकाएक भारत पर हमला कर दिया। इस युद्ध का उद्देश्य भारत को अमेरिका या सोवियत संघ किसी दो में से एक गुट में जाने के लिए विवश करना था। जब चीन युद्ध हुआ तो भारत के पास दो विकल्प थे या तो वो अमेरिका के पूंजीवादी गुट में चला जाता या सोवियत संघ के समाजवादी गुट में। भारत का संविधान यह कहता है समाजवाद देश के इस संविधान का आधार होगा।

नेहरू के सामने दो अर्थव्यवस्थाएं थीं पूंजीवादी अथवा समाजवादी। दो में से एक को चुनना था। भारत के संविधान की प्रस्तावना में ये लिखा गया है कि भारत का विकास समाजवादी विचारधारा से होगा। नेहरू ने दोनों विचारधाराओं को सख्त रूप में नहीं अपनाया। नेहरू ने मिश्रित अर्थव्यवस्था को तरजीह दी। जो भी रणनीति संबंधी मामले होंगे उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र में रखा जाएगा और जो उपभोक्ता संबंधी हैं उनके लिए प्रायवेट सेक्टर (नीजी उद्योगों) को उद्योग धंधा लगाने के लिए इजाजत दी थी। कृषि, रक्षा, संचार, बुनियादी तथा भारी उद्योग आदि सार्वजनिक क्षेत्र अर्थात पब्लिक सेक्टर के अन्तर्गत रखे गए थे क्योंकि संविधान के आर्टिकल 38 तथा आर्टिकल 39 में नीति निर्धारित सिद्धांत दिए हुए हैं। आर्टिकल 38 का आशय यह था कि भारत में सभी को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय मिलेगा और राज्य विभिन्न नागरिको में आमदनी के समानता का प्रयत्न करेगा तथा आमदनी में जो एक भारी अंतर है उसको कम करेगा। देश में भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियमन इस प्रकार होगा कि समाज के सभी वर्गो को उसका लाभ मिले और सभी के उपयोग में आये। एक और महत्वपूर्ण प्रावधान है कि देश की आर्थिक व्यवस्था इस तरह चलाई जायेगी कि किसी के भी हाथों में सम्पत्ति और उत्पादनों के साधनों का जनता की मंशा के विरूद्ध दुरूपयोग नहीं होगा। प्रस्तावना एवं नीति निर्धारित सिद्धांतो को देखते हुए एक निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों के बीच में एक संतुलन कायम रखा जाएगा। अतएव नेहरू की आर्थिक नीति मिश्रित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की थी न कि अमेरिका की पूंजीवादी और सोवियत संघ की साम्यवादी व्यवस्थाओं की नकल करने का था।

नेहरू की विदेश नीति का यह नतीजा यह हुआ कि तीसरा महायुद्ध नहीं हुआ गया एवं कोई बड़ा युद्ध विश्व में कहीं नहीं हुआ। तीसरा गुट बनाने और उसमें रहने में अपनी आजादी, अपनी सारभौमिकता, अपने विकल्पों का संरक्षण हो सकता था। चीन से युद्ध में हार के बाद भारत के सभी नागरिकों का आत्मसम्मान जाग उठा और उन्होनें इस युद्ध में अपना तन, मन, धन लगा दिया तथा फिर से भारतीय कौम जाग उठी, जो अभी सुप्त अवस्था में आ गई थी।

वर्तमान विदेश नीति : जो विदेश नीति पिछले 70 बरस से चल रही थी उसमें प्रधानमंत्री मोदी ने एकदम उल्टा कर दिया। मोदी ने जब 2014 में सत्ता संभाली तो एकआध वर्ष पाकिस्तान से बहुत अच्छे रिश्ते रहे और उम्मीद कर रहे थे कि सभी पड़ोसी देशों से अच्छे रिश्ते कायम रहेंगे। एकाएक इस नीति में परिवर्तन कर दिया गया और मोदी ने भारत को पूंजीवादी देश अमेरिकन गुट में प्रवेश करा दिया। भारत और अमेरिकी के बीच में एक संधी हुई जिसके अन्तर्गत जरूरत पड़ने पर भारत के सैनिक अड्डे अमेरिका उपयोग में ला सकता है और इसी प्रकार भारत अमेरिकी नौसेनिक अड्डे का इस्तेमाल कर सकता है। अतः अमेरिका जैसे ताकतवर देश को भारत की रक्षा नीति एवं उपकरणों कि पूरी जानकारी हो गई है। ये किसी भी देश के लिए उसके हित एवं सुरक्षा के लिए उचित नहीं है। मोदी ने ट्रम्प से व्यक्तिगत संबंध बढ़ाए और ट्रम्प ने पिछले चुनाव में मोदी की मदद की, इसी प्रकार कोरोना से ठीक पहले ट्रम्प को अपने व्यक्तिगत दौरे के लिए परिवार सहित बुलाया और दुनिया को दर्शाया की भारत अमेरिका के समक्ष पूरा आत्मसमर्पण कर चुका है। यह कहावत है कि अमीर और गरीब की रिश्तेदारी अच्छी नहीं होती है। भारत की जो भी नीतियां आर्थिक या सामाजिक या तकनीकी हों उसकी पूरी जानकारी अमेरिका को देना खतरे से खाली नहीं है। अमेरिका पर भारत बहुत विश्वास नहीं कर सकता क्योंकि जब बाग्लादेश वाला युद्ध हुआ था तब पाकिस्तान की मदद करने के लिए और भारत को सबक सिखाने के लिए अमेरिका का सातवां बेड़ा हिन्द महासागर में आ गया था। वो तो अच्छा हुआ कि प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी और रूस के नेताओं के अच्छे संबंध थे कि उन्होंने अमेरिका को चेतावनी दी की अमेरिकी बेड़े के नीचे अत्याधुनिक रीति से बनाई गई पनडुब्बियां सातवें बेड़े के नीचे लगा दी गई हैं और सातवें बेड़े ने भारत पर कोई आक्रमण किया तो सातवां बेड़ा ध्वस्त कर दिया जायेगा ये धमकी के बाद सातवां बेड़ा वापस हो गया।

भारत पाकिस्तान युद्ध में भारत जीत गया और पूर्वी पाकिस्तान एक स्वतंत्र देश बन गया, जिसका नाम रखा गया बांग्लादेश। अभी हाल ही में कोरोना मे लॉकडाउन कि घोषणा मोदी ने की थी। हिन्दुस्तान में हाइड्रोक्लोरोक्वीन दवा भारत में मलेरिया के लिए बरसों से दी जाती रही है, यह दवा कोरोना में भी कारगर है। अतएव मोदी ने इसके निर्यात पर पाबंदी लगा दी, तुरंत ट्रम्प का बयान आया कि भारत को इस दवा से पाबंदी उठा लेना चाहिए और अगर दो एक दिन में यह नहीं हटाई गई तो भारत को इसके बुरे परिणाम भुगतना होंगे। महाशक्ति अमेरिका द्वारा अपने छोटे भाई, कम शक्तिशाली देश भारत को चेतावनी दी और धमकाया। मोदी ने तुरंत ही इस दवा के निर्यात पर से पाबंदी हटा दी। यह जताता है कि अमेरिकी गुट में जाने के बाद भारत का वो सम्मान नहीं रह गया जो 2014 के पहले था। भारत अपनी सार्वभौमिकता खो बैठा है।

भारत के अमेरिकी गुट का हिस्सा बनने के बाद पड़ोसी देश नेपाल ने सीमा विवाद खड़ा किया और अपना एक नक्शा जिसमें उसकी भूमि पर भारत का कब्जा बताया गया है उसे संसद मे पास किया गया। मोदी ने नागरिकता कानून में जो संशोधन किया है उसके द्वारा पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से शरणार्थी के रूप में आने वाले गैर मुस्लिम व्यक्तियों को नागरिकता देने का कानून पास किया है। इस संशोधन से इन देशों के मुसलमानों पर प्रभाव पड़ा है। अतएव भारत से पाकिस्तान, बंग्लादेश एवं अफगानिस्तान तीनों ही बहुत नाराज है। बर्मा (मयांमार) तो चीन के साथ है ही।

चीन और अमेरिका के रिश्ते दिन प्रतिदिन खराब होते जा रहे हैं और एक दूसरे से टकराने की संभावना है। यदि ऐसा हुआ तो अमेरिका चीन से युद्ध हमारे देश की भूमि पर लड़ेगा। चीन जो भी हमला करेगा उसका नुकसान हमें होगा अमेरिका को नहीं और अमेरिका का हमारे नौसेनिक अड्डे इस्तेमाल करते हुए चीन पर हमला करेगा और उसका जो जवाब होगा उससे भारत के कई शहर तबाह हो जायेंगे। नतीजा यह है कि तथस्त विदेश नीति के बजाए गुटों की राजनीति करने का यह परिणाम है कि देश युद्ध के मुहाने पर खड़ा है और कभी भी इसकी भूमि अमेरिकी चीनी युद्ध में उपयोग की जा सकती है। नेहरू की नीति परिस्थितियों, संवैधानिक आदर्शों तथा हमारे हितों की रक्षा करते हुए बनाई गई थी लेकिन उस नीति में जो बदलाव हुआ है उससे देश के हितों को बहुत बड़ी हानि हुई है और होगी।

नेहरू ने बेरोजगारी कम की : पहली पंचवर्षीय योजना के अंत तक उस समय की जनसंख्या को देखते हुए, तीन लाख बेरोजगार कम हुए, इसके विपरीत मोदी सरकार सन् 2014 में आने के बाद और मार्च 2020 में कोरोना महामारी फैलने के बाद बेरोजगारों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। 11 करोड़ बेरोजगार तो कोरोना के दरमियान बढ़े हैं। इसके अतिरिक्त 2014 से 2019 तक जो बेरोजगारी बड़ी है उसका आकलन करें तो अतिरिक्त 20-25 करोड़ बेरोजगार आज भारत में है। दुनिया के शीर्ष अर्थशास्त्रियों का यह कहना है कि भारत में ऐसी मंदी आयेगी कि जीडीपी माइनस में चली जायेगी। कोरोना के दौरान जो मजदूर कार्यस्थल से अपने गांव चले गए हैं, इस कारण उद्योगों का चलना मुश्किल है, मजदूरों का मिलना मुश्किल है। उत्पादन कम होने की पूरी संभावना है। इन सबका नतीजा बेरोजगारी होगा।

admin