हर तरफ नफरत के माहौल में ये खबर आपको थोड़ा सुकून पहुंचाएगी

नेहा श्रीवास्तव, इंदौर। कुछ दिनों से राजस्थान में दलितों को लेकर एक से एक भयानक घटना सामने आ रही है केवल राजस्थान में ही नहीं बल्कि हर जगह से, इसी बीच एक मंदिर के पुजारी ने एक दलित युवक को अपने कंधों पर बिठाया, और श्री रंगनाथ मंदिर के भीतर लेकर गए। पुजारी ने मंदिर के भीतर पहुंचकर इस युवक को गले लगाते हुए उसे पूजा में भी शामिल किया गया। ये वाक्या अपने आप में एक मिसाल है।

यह वाक्या तेलंगाना के खम्मम स्थित रंगनायकुला गुट्टा का है। खम्मम में स्थित ऐतिहासिक श्री लक्ष्मी रंगनाथ स्वामी मंदिर (रंगनायकुला गुट्टा) में सामाजिक समरसता वेदिका, नरसिंह वाहिनी और अन्य संगठनों के साथ मंदिर संरक्षण आंदोलन का आयोजन किया गया।

भद्राचलम नरसिहं स्वामी मंदिर के पुजारी कृष्ण चैतन्य ने तिरुप्पानलवार की वेशभूषा धारण किए हुए दलित समुदाय से आने वाले रवि को अपने कंधे पर उठा लिया और उन्हें मंदिर में ले गये। उस वक़्त चिल्कुर बालाजी मंदिर के पुजारी सीएस रंगराजन भी मौजूद थे।

पिछले साल इसकी शुरुआत रंगराजन ने ही किया था। उन्होंने इस बारे में बताया था, “यह 2700 साल पुरानी एक घटना को दोहराने जैसा है। इस परंपरा को सनातन धर्म का असली संदेश पहुंचाने और समाज में बराबरी का संदेश के लिए निभाया जाता है। मौजूदा समय में कई लोग अपने स्वार्थों के चलते देश का माहौल खराब कर रहे हैं।”

जब रंजराजन से पूछा गया था कि उन्हें दलित युवक को कंधे पर उठाने का विचार कहां से आया तो उन्होंने कहा, “जनवरी महीने में मैं उस्मानिया विश्वविद्यालय में आयोजित एक सम्मेलन में गया था, जहां इस बात की चर्चा की गई कि किस तरह पिछड़ी जातियों के लोगों को मंदिर में घुसने नहीं दिया जाता है। तभी मुझे इसका खयाल आया।

वहीं पिछले साल रंगराजन ने आदित्य पारासरी को अपने कंधे पर बैठा कर मंदिर दर्शन करवाया था। उन्होंने बताया कि उन्हें अपने गृह नगर महबूबनगर में ही हनुमान मंदिर में घुसने नहीं दिया गया था। दलित होने की वजह से मेरा परिवार इस घटना से उत्पीड़ित और अपमानित महसूस कर रहा था। कई मंदिरों में अब भी यह सब जारी है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि यह बदलाव की शुरुआत है। इससे लोगों की मानसिकता बदलेगी।

यह परम्परा लगभग 2700 साल पुरानी है, और तमिलनाडु में पुजारी द्वारा दलित युवक को कंधों पर बिठाकर मंदिर ले जाने की इस प्रथा को ‘मुनि वाहन सेवा’ के नाम से जाना जाता है। इस पहल के पीछे का मकसद दलितों के साथ हो रही उत्पीड़न की घटनाओं को रोकना और विभिन्न वर्गों में बंधुत्व की भावना जाग्रत करना है। अब यदि ये दिखावे की भी परंपरा है तो ऐसी परम्पराएं चलती रहनी चाहिए।

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