‘फिल्म-स्टार बनने के लिए गायकी जरूरी थी’

सैयद एम. तौहीद

किसी ने नहीं सोचा होगा कि वकालत की डिग्री रखने वाले सुरेंद्रनाथ उर्फ सुरेंद्र हिंदी सिनेमा के बड़े स्टार बनेंगे, लेकिन ऊपर वाला उनमें अलग मिजाज देख रहा था। अभिनय और गायकी के दम पर फिल्मों में चले आए। तीस दशक के उत्तरार्ध की फिल्म ‘दक्कन की रानी’ से शुरू हुआ करियर पचास तक बुलंद रहा। महबूब खान की ‘मनमोहन’ ने उनको शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचाया।

अनिल बिश्वास ने आपसे अनेक फिल्मों में गंवा कर गायकी में पहचान बना दी। अनिल दा के साथ-साथ नौशाद अली, खेमचंद प्रकाश, सचिन देव बर्मन और राम गांगुली सरीखे संगीतकारों ने आपसे सेवाएं लीं। अनमोल घड़ी में आपको मल्लिका तरन्नुम नूरजहां के साथ ‘आवाज दे कहां’ गाने का अवसर मिला। ‘अनमोल घड़ी’ का संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ, जिसके बाद सुरेंद्र ने बहुत-सी फिल्मों में गाया। खेमचंद प्रकाश की धुनों से सजी भारथरी ने उनको काफी शोहरत दिलाई। पहले स्वतंत्रता संग्राम पर बनी फिल्म में सुरैया के साथ गाया ‘तेरी नजर में’ भी हिट रहा। भारत भूषण अभिनीत ‘बैजू बावरा’ में तानसेन की भूमिका सुरेंद्र की अदाकारी का ऊंचा मुकाम रही। यादगार ‘मुगल-ए आजम’ में भी तानसेन की भूमिका उन्होंने अदा की थी।

एक जमाने में सितारा होने के लिए गायकी होना जरूरी था। यह तीस का दशक था, जब कुंदन लाल सहगल की टक्कर में मेहबूब खान सुरेंद्र को लेकर आए। स्टूडियो ईरा की मुश्किलों के चलते समकालीन होकर भी सहगल के लिए अनिल बिश्वास संगीत नहीं दे सके। चालीस के दशक में हिंदी सिनेमा का बड़ा तबका कलकत्ता चला गया था। सहगल भी कलकत्ता का रुख कर गए। बंबई में सहगल की कमी को पूरा करने की जरूरत थी। इस कमी को सुरेंद्र ने पूरा किया। शुरुआत में किस्मत ने साथ भी दिया। महबूब खान ने कुछ बेहतरीन फिल्में दीं, जिसमें ‘मनमोहन’ काबिले जिक्र थी। कहानी में उनका किरदार देवदास से काफी प्रभावित था। यहां वे मशहूर अदाकारा बिब्बो के साथ नजर आए। इन दोनों का गाया गीत ‘तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया’ ने खूब शोहरत बटोरी।

संगीत था अशोक घोष का, लेकिन सहायक अनिल बिश्वास को क्रेडिट मिला। यह बंबई बनाम कलकत्ता अथवा सहगल बनाम सुरेंद्र नहीं होकर बंबई में न्यू थियेटर्स कलकत्ता के सहगल का विकल्प बनाना था। बाम्बे की कंपनी सागर मूवीटोन से जुड़े सुरेंद्र की आवाज सहगल से बहुत मेल खाती थी, इसलिए उनको बाम्बे सहगल भी कहा गया।

‘दक्कन की रानी’ का हिट गीत ‘बिरहा की आग लगी मोरे मन में’ सुरेंद्र का पहला गीत था। सहगल शैली से प्रभावित यह गायन अमर गीत ‘बलम आए बसो मेरे मन में’ से प्रभावित था, लेकिन सुरेंद्र की गायकी पर सहगल का प्रभाव बहुत कम अरसे के लिए बना रहा। महबूब खान की ‘मनमोहन’ का ‘तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया’ से उनकी अलहदा पहचान निखर कर आई। ताज्जुब नहीं कि सहगल की छाया से दूर सुरेंद्र ने गायकी और अदाकारी में मुकम्मल पहचान बनाई। बंबई में बनी

‘जागीरदार’ से लेकर ‘ग्रामोफोन सिंगर’, फिर ‘जीवन साथी’ और ‘अलीबाबा’ की सफलता में सुरेंद्र का अहम रोल रहा। चालीस दशक की हिट म्यूजिकल्स की चर्चा उनके जिक्र के बिना हो नहीं सकेगी। बंटवारे बाद ‘अनमोल घड़ी’ और ‘लाल हवेली’ की युगल साथी नूरजहां पाकिस्तान रुख कर गईं। मल्लिका-ए-तरन्नुम के साथ काम करने का उन्‍हें फिर से मौका नहीं मिला। इसके बाद उन्‍होंने सोलो गाना शुरू कर दिया, जिसमें ‘तेरी याद का दीपक’ खासा हिट हुआ। मेहबूब खान, अनिल बिश्वास, सुरेंद्र की एक सफल टीम उभर कर आई। तकरीबन सत्तर के करीब फिल्मों में बतौर अभिनेता नजर आने वाले सुरेंद्र ने सैकड़ों गीत गाए। अनिल दा ने सबसे ज्यादा मौका दिया। इस तरह गायन और अदाकारी दोनों में शोहरत हासिल की। कभी गायकी करने वाले सुरेंद्र बाद में चरित्र किरदारों में ढल गए। उन्होंने ‘मुगल-ए-आजम’ से लेकर ‘वक्त’ और ‘एन इवनिंग इन पेरिस’, फिर ‘मिलन’ और ‘हरियाली एवं रास्ता’ जैसे फिल्मों में चरित्र किरादर निभाए। जीवन के आखिरी वसंत में उन्‍होंने विज्ञापन एजेंसी बनाई और विज्ञापन बनाने में लग गए। साहेबजादे जीत एवं कैलाश ने पिता की इस विरासत को आगे भी जारी रखा। ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ इनकी मशहूर उपलब्धि रही।

पंजाब के बटला गांव से ताल्लुक रखने वाले सुरेंद्र को महबूब खान की खोज कहना चाहिए, क्योंकि वे ही उन्‍हें तलाश लाए थे। उन्‍होंने सहगल के जमाने में पहचान बनाने का मुश्किल काम कर दिखाया। संगीतकारों में अनिल बिश्वास ने उन्‍हें सबसे अधिक प्रोत्साहन दिया।

‘दक्कन की रानी’ का हिट गीत ‘बिरहा की आग लगी मोरे मन में’ सुरेंद्र का पहला गीत था। महबूब खान की ‘मनमोहन’ का ‘तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया’ से उनकी अलहदा पहचान निखर कर आई। ताज्जुब नहीं कि सहगल की छाया से दूर सुरेंद्र ने गायकी और अदाकारी में मुकम्मल पहचान बनाई।

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