कल है गणेश चतुर्थी व्रत, ऐसे करें पूजा अर्चना, सब विघ्‍न होंगे दूर

आप तो जानतें ही हैं कि हर शुभ कार्य करने से पहले भगवान श्री गणेश जी की पूजा का विधान है । सनातन धर्म में विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश (Shri Ganesh) चतुर्थी व्रत की धार्मिक मान्यता रही है।हर महीने में दो चतुर्थी आती हैं और दोनों ही चतुर्थी भगवान गणेश (Shri Ganesh) को समर्पित मानी जाती हैं। अब फाल्गुन के महीने (Phalgun mas) की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी कल यानी 2 मार्च को मनाई जाने वाली है। इस बार मंगलवार के दिन चतुर्थी पड़ने से इसे अंगारकी चतुर्थी कहा जा रहा है और इसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी भी कह सकते हैं।

वहीं फाल्गुन मास (Phalgun mas) की इस संकष्टी चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी भी कह सकते है। वैसे इस दिन गणपति के द्विजप्रिय रूप की आराधना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि, ‘विघ्नहर्ता द्विजप्रिय गणेश के चार मस्तक और चार भुजाएं हैं।’ इनका पूजन किया जाए और व्रत किया जाए तो सभी तरह के कष्ट दूर हो जाते हैं। इसके अलावा अच्छी सेहत और सुख समृद्धि मिलती है।

श्री गणेश (Shri Ganesh) की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी महिमा में यशगान के रूप में श्रीगणेश (Shri Ganesh) स्तुति, संकटनाशन, श्रीगणेश स्त्रोत, श्री गणेश अथर्वशीर्ष, श्रीगणेश (Shri Ganesh) सहस्रनाम, श्री गणेश चालीसा (Shri Ganesh Chalisa) एवं श्री (Shri Ganesh) गणेश जी से संबंधित अन्य स्त्रोत आदि का पाठ करना चाहिए। संबंधित मंत्र का जाप करने के अलावा मान्यता है कि श्री गणेश (Shri Ganesh)अथर्वशीर्ष का सुबह पाठ करने के रात्रि के सभी पापों का नाश होता है। संध्या पाठ करने पर दिन के पापों का नाश होता है, विधि विधानपूर्वक एक हजार पाठ करने पर मनोरथ की पूर्ति के साथ धर्म अर्थ काम और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

ऐसे करें श्री गणेश की पूजा –
इस दिन सुबह जल्दी उठकर नहा ले और उसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर ले। अब भगवान गणेश (Shri Ganesh) का स्मरण करें और उनके समक्ष व्रत का संकल्प लें। इसके बाद आप श्री गणेश (Shri Ganesh) की प्रतिमा को जल, रोली, अक्षत, दूर्वा, लड्डू, पान, धूप आदि अर्पित करें। इसके बाद केले का एक पत्ता या एक थाली ले लें। उस पर रोली से त्रिकोण बनाएं और त्रिकोण के अग्र भाग पर एक घी का दीपक रखें। इसके बाद बीच में मसूर की दाल व सात लाल साबुत मिर्च रखें। अब अग्ने सखस्य बोधि नः मंत्र या गणपति के किसी और मंत्र का का कम से कम 108 बार जाप करें। अंत में व्रत कथा कहें या सुनें, उसके बाद आरती करें। अब शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलें।

नोट– उपरोक्त दी गई जानकारी व सूचना सामान्य उद्देश्य के लिए दी गई है। हम इसकी सत्यता की जांच का दावा नही करतें हैं यह जानकारी विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, धर्मग्रंथों, पंचाग आदि से ली गई है । इस उपयोग करने वाले की स्वयं की जिम्मेंदारी होगी ।

admin