अमर्यादित आंदोलनों का नया अंदाज

– डॉ दिलीप अग्निहोत्री

पिछले कुछ वर्षों में आंदोलनों का अजीब स्वरूप देखने को मिल रहा है। बिना किसी आधार के आंदोलन शुरू होता है,विपक्ष की अनेक पार्टियों को उन्हें समर्थन मिल जाता है,विदेशों से भी सहानुभूति दिखाने वाले सक्रिय हो जाते है। महीनों तक चलने वाले ऐसे आंदोलन समय के साथ चर्चा से बाहर भी हो जाते है। सीएए में नागरिकता छीन लेने का आरोप लगाकर आंदोलन शुरू किया गया। विदेशों तक चर्चा हुई,फिर शाहीन बाग घण्टाघर के आंदोलन ना जाने कहाँ चले गए। कृषि कानून में किसानों को अधिकार दिए गए। आंदोलन इसलिए चल रहा है कि अधिकार छीन लिए गए। अब जमीन भी छीनी जाएगी। पिछली सरकारों के मुकाबले कृषि मंडी व्यवस्था में सुधार हुआ,एमएसपी में अब तक कि सर्वाधिक वृद्धि हुई।

इस संबन्ध में जिन सरकारों का बेहतर रिकार्ड नहीं रहा,उसके नेता आंदोलन का समर्थन कर रहे है। बात यहीं तक सीमित नहीं है। ऐसे आंदोलनों के समर्थक विदेशियों पर तो मेहरबान रहते है,लेकिन राष्ट्रीय स्वाभिमान के अनुरूप टिपण्णी करने वालों के पीछे पड़ जाते है। ये लोग लता मंगेशकर और सचिन तेंदुलकर के ट्वीट की जांच कराएंगे। क्योंकि उन्होंने विदेशियों के भारत में हस्तक्षेप को अनुचित करार दिया था। लेकिन इन्हें विदेशियों के हस्तक्षेप पर कोई आपत्ति नहीं है। इनके अनुसार लता मंगेशकर व सचिन तेंदुलकर आदि को तो संभल कर बोलना चाहिए,लेकिन अली खलीफा,रिहाना ग्रेटा थनबर्ग और कनाडा पाकिस्तान के भारत विरोधी बेअन्दाज होकर कुछ भी बोल सकते है।

शरद पवार अपने को भी देखें। वह क्रिकेट नहीं राजनीति के खिलाड़ी रहे है,लेकिन वर्षों तक बीसीसीआई के अध्यक्ष रहे। इस प्रकार का समर्थन देने वाले अपनी व आंदोलन दोनों की गरिमा गिरा रहे है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आन्दोलनजीवी शब्द क्या प्रयोग किया,कुछ लोग सीधे राष्ट्रीय आंदोलन तक जा पहुंचे। जबकि इनकी स्वतन्त्रता काल के आंदोलन से तुलना बेमानी है। वस्तुतः यह हमारे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों का अपमान है। इतना ही नहीं इस प्रसंग में कुछ नेताओं ने जय प्रकाश नारायण व अन्ना हजारे की भी चर्चा की है। लेकिन इन आंदोलनों की भी शाहीन बाग घण्टाघर सिंधु आंदोलनों से नही हो सकती। क्योंकि वह सभी आंदोलन सिद्धान्त व सत्य पर आधारित थे। इनका नेतृत्व करने वाले महान लोग थे। जिन्हें अपने आंदोलन में अराजक तत्वों का प्रवेश स्वीकार नहीं था। इनके लिए देश ही सर्वोच्च था। विपक्ष में रहते हुए जनसंघ और भाजपा ने भी बहुत आंदोलन किये। लेकिन इनमें से किसी में भी कभी देश विरोधी शब्द सुनाई नहीं दिए। इनके किसी भी आंदोलन को पाकिस्तान व कुछ अन्य मुल्कों के भारत विरोधी तत्वों का समर्थन नहीं मिला। इसका कारण था कि इनके आंदोलनों में देश की भलाई समाहित थी,इनके आंदोलन में सरकार का विरोध था,लेकिन संविधान और देश के प्रति सम्मान भाव था। यही वह प्रेरणा थी जिसके चलते 1962 व 1965 के युद्ध में आरएसएस के स्वयंसेवकों ने आगे बढ़ कर आंतरिक व्यवस्था में सरकार का सहयोग किया था,यही वह भावना थी जिसके कारण 1971 के युद्ध में जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को केवल समर्थन ही नहीं दिया था,बल्कि प्रभावी शब्दों में उनकी प्रशंसा भी की थी।

आज के आन्दोलनजीवियों पर गौर करिए। ये वही लोग है जिन्होंने पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाए थेकई आन्दोलनजीवियों ने सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे थे। इस प्रकार के प्रश्न भारतीय सेना के शौर्य सम्मान व मनोबल को गिराने वाले थे। किसी ने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक के पहले विपक्ष को विश्वास में नहीं लिया गया। इस प्रकार की बात वही कर सकता है,जिसको राष्ट्रीय सुरक्षा की कोई समझ ना हो यदि ये लोग आन्दोलनजीवी ना होते तो उस समय खुल कर सरकार का समर्थन करते। लेकिन इनकी दिलचस्पी सेना के मनोबल को बढ़ाने में नहीं,सरकार से हिसाब बराबर करने में थी। यह काम तो बाद में भी हो सकता था। लेकिन जब पाकिस्तान को भारत से एकजुट सन्देश पहुंचना चाहिए था तब आन्दोलनजीवी इस एकता से बाहर थे। अंततः पाकिस्तान ने माना कि सर्जिकल स्ट्राइक हुई थी। जिसमें बड़ी संख्या में आतंकी शिविर तबाह हुए थे। अमेरिका ने भी माना था कि भारत की सर्जिकल स्ट्राइक में उसका एफ सोलह युद्धक विमान नष्ट हो गया था। इसको पाकिस्तान ने खरीदा था।

इसके बाद डोकलाम तनाव पर भी आन्दोलनजीवियों की यही मनोदशा दिखाई दी। यहां भारत चीन के सैनिक आमने सामने थे। दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति थी। हालात बेहद गंभीर थे। इस नाजुक मौके पर भी पूरे भारत को एक स्वर में चीन को सन्देश देना चाहिए था। उसे भी लगता कि भारत एकजुट है। उसका उत्साह सेना का मनोबल बढ़ाने का काम करेगा। नरेंद्र मोदी ने कहा भी था कि सैनिकों को लगना चाहिए कि पूरा देश उनके पीछे है। देश की जनता तो सैनिकों के पीछे थी। लेकिन आन्दोलनजीवी इसमें भी शामिल नहीं थे। उनको यह नरेंद्र मोदी के विरोध का बेहतर अवसर दिखाई दे रहा था। महात्मा गांधी के आंदोलन में शामिल लोग सत्याग्रही थे,अंग्रेजों की पुलिस हिंसक थी। वह सत्याग्रहियों को प्रताड़ित करती थी। किसानों के नाम पर आंदोलन चलाने वाले हिंसा पर उतारू थे,यहां पुलिस सत्याग्रही की मुद्रा में थी। जाहिर है कि इसकी तुलना पहले के आंदोलन से संभव ही नहीं है। जो ऐसा कर रहे है उनको पहले के आंदोलनों की भावभूमि की कल्पना तक नहीं है।

ऐसे ही चीन ने गलवान घाटी में अपना असली चेहरा दिखाया था। उसने भारतीय सीमा में घुसने का प्रयास किया। तब हमारे जांबाज सैनिकों ने बलिदान देकर अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखा और चीन को उसकी जगह भी दिखाई थी। पूरे देश में चीन के विरुद्ध नाराजगी थी। नरेंद्र मोदी ने लेह की दुर्गम पोस्ट पर जाकर चीन को भारत का मंसूबा बता दिया था। उस समय भी कांग्रेस देश की इस एकजुटता से अलग ही दिखाई दे रही थी। वह चीन की जगह अपनी ही सरकार पर हमला बोल रही थी।

किसानों के नाम पर चल रही विदेशी प्रतिक्रियाओं भारतीय सम्प्रभुता के प्रतिकूल है। इनका तो प्रत्येक स्तर पर होना चाहिए था। इनको बताना चाहिए था कि भारत के आंतरिक मसलों पर उनके बयान अनावश्यक है। भारत को अपने मसले सुलझाने के लिए इस प्रकार के लोगों को कोई जरूरत नहीं है। यह तो राष्ट्रीय सहमति का विषय होना चाहिए था। लेकिन आंदोलन से जुड़े लोग इस राष्ट्रीय सहमति में शामिल नहीं है। किसी ने भी इन छिछले बयानों की निंदा नहीं की। इसके विपरीत यह लोग देश की सम्मानित हस्तियों पर हमला बोल रहे है।

कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार किसानों को खालिस्तानी और आतंकवादी कहकर आंदोलन को बदनाम कर रही है। यह प्रदर्शनकारी किसान हैं जो हमारे देश का पेट भरते हैं। इसलिए इन्हें खालिस्तानी या आतंकवादी कहना उचित नहीं है। जबकि यह असत्य है। किसी ने भी किसानों को खालिस्तानी या आतंकवादी नहीं कहा। लेकिन यह सच्चाई है कि इसी आंदोलन में खालिस्तान के झंडे दिखाई दिए थे,यह भी सच है कि इसी आंदोलन के लोगों ने लालकिले पर अराजकता फैलाई थी। इसके लिए शरारती ढंग से गणतंत्र दिवस का दिन चुना गया था। ऐसे लोग किसान नहीं हो सकते। देश या सरकार की नाराजगी इन्हीं के प्रति थी।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं )

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