अमेरिका 102 साल पुराने इलाज पर लौटा

ह्यूस्टन

कोरोना से ज्यादा प्रभावित अमेरिका में इस वायरस पर काबू पाने के लिए डॉक्‍टर अब एक नए तरीके पर काम कर रहे हैं। मशहूर ह्यूस्टन मेथोडिस्ट हॉस्पिटल के डॉक्‍टरों ने इसके लिए 102 साल पुराना तरीका अख्तियार किया है। डॉक्टरों ने कोरोना से ठीक हुए एक मरीज का खून इससे संक्रमित एक रोगी को चढ़ाया है। यह प्रयोग करने वाला यह देश और दुनिया का पहला अस्‍पताल बन गया है। इलाज का यह तरीका साल 1918 के स्पैनिश फ्लू महामारी के समय का है। अस्पताल में घातक कोरोना से दो हफ्ते से अधिक समय तक लड़कर स्‍वस्‍थ्‍य हुए शख्‍स ने अपना ब्लड प्लाज्मा कोनवालेस्सेंट सीरम थेरेपी के लिए दान दिया है।

मेथोडिस्ट्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक डॉ. एरिक सलाजार ने कहा कि कोनवालेस्सेंट सीरम थेरेपी कोरोना वायरस के इलाज का एक महत्वपूर्ण तरीका साबित हो सकती है क्योंकि रोगियों की मदद के लिए हमारे पास वक्त बहुत कम है और विश्व में जारी नैदानिक परीक्षणों के नतीजे सामने आने में अभी वक्त लगेगा। सालजार ने कहा कि हमारे पास इंतजार करने का समय नहीं है।

ह्यूस्टन हॉस्पिटल में इलाज के बरसों पुराने इस तरीके को हाल ही में इस्तेमाल किया गया क्योंकि अमेरिका अब दुनिया में कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित देशों में शामिल हो चुका है। यहां 2000 से अधिक लोगों की मौत हो गई है जिसमें टेक्सास में 34 लोगों की मौत भी शामिल है। मेथोडिस्ट हॉस्पिटल ने फिलहाल 250 मरीजों से ब्लड प्लाज्मा लिया है, जिनके कोरोना वायरस से पीड़ित होने की जानकारी जांच से सामने आई है।

रोगी की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ने की उम्मीद

दरअसल, कोरोना वायरस के संक्रमण से ठीक हुए व्‍यक्ति के प्लाज्मा में एंटी बॉडीज विकसित हो जाते हैं। ये एंटी बॉडीज प्रतिरोधक प्रणाली द्वारा वायरस पर हमला करने के लिए बनाए जाते हैं। उम्मीद है कि इस तरह के प्लाज्मा को एक रोगी में प्रवेश कराने के बाद उसमें इस जानलेवा वायरस से लड़ने के लिए एंटीबॉडी की शक्ति बढ़ाई जा सकेगी। ह्यूस्टन मेथोडिस्ट के सीईओ मार्क बूम ने कहा कि यदि कोनवालेस्सेंट सीरम थेरेपी से गंभीर रूप से बीमार किसी रोगी के जीवन को बचाने में मदद मिलती है तो यह अविश्वसनीय रूप से एक सार्थक कदम होगा।

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