अमेरिका-ईरान वार्ता से क्या संबंधों में घुल पाएगी मिठास?

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अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडन की शीर्ष प्राथमिकता में ईरान के साथ टकराव नहीं बल्कि रिश्ते में मिठास घोलना है। बाइडन चाहते हैं कि पूर्ववर्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा परमाणु समझौते से अलग होने के बाद उपजी तनावपूर्ण परिस्थितियों को खत्म करने के लिए 2015 के समझौते को नए सिरे से आकार दिया जाए।

– अरविंद जयतिलक, वरिष्ठ पत्रकार

अमेरिकी राष्ट्रपति जोसफ रॉबिनेट बाइडन द्वारा ईरान के साथ परमाणु कार्यक्रम पर वार्ता के लिए तैयार होना रेखांकित करता है कि मौजूदा राष्ट्रपति की शीर्ष प्राथमिकता में ईरान के साथ टकराव नहीं बल्कि रिश्ते में मिठास घोलना है। बाइडन चाहते हैं कि पूर्ववर्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा परमाणु समझौते से अलग होने के बाद उपजी तनावपूर्ण परिस्थितियों को खत्म करने के लिए 2015 के समझौते को नए सिरे से आकार दिया जाए।

गौरतलब है कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को ईरान के साथ इस समझौते से अलग कर लिया था। हालांकि तब ईरान ने इस समझौते के तहत 2025 तक अपने परमाणु कार्यक्रम को बहुत अधिक सीमित करने पर सहमति जतायी थी, लेकिन हालात सुधरने के बजाए बिगड़ते गए। तनाव उस समय चरम पर पहुंच गया जब जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या से आक्रोशित ईरान ने इराक स्थित दो अमेरिकी सैन्य बेस पर 22 मिसाइलों से हमला कर दिया। दोनों देशों के बीच युद्ध की नौबत आ पड़ी। अब जब अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने परमाणु समझौते पर वार्ता की नई पेशकश की है तो उम्मीद किया जाना चाहिए कि परिणाम सुखद होंगे। लेकिन सवाल यह है कि बाइडन प्रशासन द्वारा ईरान से परमाणु कार्यक्रम पर वार्ता को लेकर इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का रुख क्या होगा। ये वे देश हैं जिन्हें ईरान फूटी आंख भी नहीं सुहाता।

फिलहाल इजरायल ने बाइडन प्रशासन की ईरान से वार्ता पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने देने से रोकने के प्रति उसका रुख पहले जैसा ही है। दरअसल इजरायल इस नतीजे पर है कि ईरान के साथ पुराने समझौते को अमलीजामा पहनाना एक किस्म से तेहरान को परमाणु हथियार उपलब्ध कराने जैसा होगा।

याद होगा 2015 से पहले जब ईरान का अमेरिका समेत अन्य शक्तिशाली देशों के साथ परमाणु समझौता हुआ तब इजरायल ने इसे ऐतिहासिक गलती करार दिया। अभी भी इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अमीरात ईरान को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। जहां तक वार्ता को लेकर इन देशों के रुख का सवाल है तो वे इस पर अपनी सहमति तभी देंगे जब ईरान अपने परमाणु तथा प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम पर रोक लगाने के साथ-साथ इराक, लेबनान, यमन तथा अन्य दूसरे देशों के लड़ाकों को सैन्य व आर्थिक मदद देने से गुरेज करेगा। फिलहाल इजरायल ने बाइडन प्रशासन की ईरान से वार्ता पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने देने से रोकने के प्रति उसका रुख पहले जैसा ही है। दरअसल इजरायल इस नतीजे पर है कि ईरान के साथ पुराने समझौते को अमलीजामा पहनाना एक किस्म से तेहरान को परमाणु हथियार उपलब्ध कराने जैसा होगा। इजरायल वार्ता के विरोध में नहीं है लेकिन वह चाहता है कि मौजूदा समझौता 2015 के समझौते से बेहतर हो। 2015 के समझौते के मुताबिक अगले डेढ़ दशक में ईरान की परमाणु गतिविधियों पर लगे प्रतिबंध समाप्त हो जाने का प्रावधान था, जिसे लेकर इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने नाखुशी जाहिर की थी।

इसके अलावा पश्चिम एशिया में ईरान की परमाणु गतिविधियों पर रोक लगाने का भी कोई प्रावधान नहीं था। अब इन देशों की मंशा है कि ईरान के साथ अगर परमाणु समझौता हो तो वह समझौता पांच दशक तक बाध्यकारी हो। साथ ही ईरान से खाड़ी देशों की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। दरअसल सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ईरान के आक्रामक और विस्तारवादी रुख को लेकर सशंकित हैं। दूसरी ओर यूरोप, रुस और चीन जैसे देश बाइडन प्रशासन के वार्ता प्रस्ताव को ईरान के लिए बेहतर मौका मान रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि इन देशों ने 2015 के समझौते का समर्थन किया था। फिलहाल वार्ता को लेकर ईरान की ओर से अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। लेकिन अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान को उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वार्ता की टेबल पर आने के लिए उसकी कोई शर्त मानी जाएगी। अतीत में जाएं तो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के आखिरी कार्यकाल में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु डील हुई थी।

परमाणु डील के बाद अमेरिका ने ईरान को खाद्य और फर्मास्युटिकल क्षेत्र में व्यापार की अनुमति दी। प्रतिबंध हटते ही ईरान को वैश्विक क्षितिज पर उड़ान भरने का मौका मिल गया। उसने अपने पुनर्निर्माण के लिए खुलकर कच्चा तेल बेचने के साथ विदेशी बैंकों में जमा 100 अरब डॉलर की जब्त संपत्तियों का उपभोग करने लगा। हालांकि एक नए घटनाक्रम में अमेरिका ने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण को लेकर उसके विरुद्ध कड़ा कदम उठाते हुए इस कार्यक्रम से जुड़ी 11 कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया। गौर करें तो ईरान का नाभिकीय कार्यक्रम का इतिहास बहुत दिलचस्प है। 1950 में आइजन हावर प्रशासन के ‘एटम फॉर पीस’ कार्यक्रम के तहत पहली सहायता मिली। लेकिन 1979 में अयातुल्ला खोमानी द्वारा शाह शासन द्वारा प्रारंभ किए गए सभी नाभिकीय उर्जा संयंत्रों एवं परियाजनाओं को निरस्त कर दिया गया। यह वह समय था जब ईरान की इस्लामिक क्रांति उफान पर थी और शहरों में तेल के पैसों से समृद्धि थी वहीं गांवों में गरीबी दहाड़ मार रही थी।

सत्तर के दशक का सूखा और शाह द्वारा यूरोपीय तथा बाकी देशों के प्रतिनिधियों को दिए गए भोज जिसमें अकूत पैसा खर्च किया गया था, ने ईरान की गरीब जनता को शाह के विरुद्ध भड़का दिया। आधुनिकीकरण के हिमायती शाह को ईरान की जनता पश्चिमी देशों की पिठ्ठू के रुप में समझने लगी। 1979 में अभूतपूर्व हिंसक प्रदर्शन हुए और अमेरिकी दूतावास को घेर लिया गया। शाह के समर्थकों और जनता के बीच संघर्ष चलता रहा और अंततः ईरान एक इस्लामिक गणराज्य बन गया। इराक युद्ध एवं सद्दाम हुसैन के दृष्टिकोण के कारण ईरान अपने नाभिकीय कार्यक्रम पर विचार के लिए बाध्य हुआ और वे 4500 नाभिकीय वैज्ञानिक जो इस्लामिक क्रांति के दौरान देश छोड़कर जा चुके थे, में से 80 फीसद को वापस बुला लिया। 1986 में तेहरान द्वारा नाभिकीय सुविधाएं स्थापित करने में सहायता के अनुरोध पर पाकिस्तान के अणु बम के जनक और बदनाम वैज्ञानिक ए क्यू खान का ईरान दौरा हुआ और 1991 में इराक की पराजय ने ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम के संकल्प को और मजबूती दे दी।

अमेरिका की ईरान पर भौंहे तब तनी जब 1995 में ईरान ने रुस के साथ क्रांति के उपरांत रद्द हुए बुशेर नाभिकीय रिएक्टर को स्थापित करने हेतु 800 मिलियन डॉलर का समझौता किया। यह समझौता अमेरिका को बेहद नागवार गुजरा। ईरान के लिए संकट तब खड़ा हुआ जब ईरान विरोधी मुजाहिदीन खल्क संगठन ने दुनिया को यह जानकारी दी कि ईरान नातांज में यूरेनियम संवर्धन संयंत्र एवं अराक में भारी जल उत्पाद संयंत्र बिना अंतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी (आईएईए) की जानकारी के स्थापित कर चुका है। 2003 में अमेरिका ने ईरान को ‘शैतान की धुरी’ में शामिल राष्ट्र में मान लिया और ‘ऑपरेशन इराकी फ्रीडम’ से ठीक पहले आइएइए द्वारा उसके नाभिकीय प्रतिष्ठानों का निरीक्षण किया गया। दबाव स्वरुप ईरान ने यूरोपीय यूनियन के साथ परमाणु ईंधन चक्र गतिविधियों को निलंबित करने का समझौता किया फिर भी बात नहीं बनी। 2007 में आइएइए ने तर्क दिया कि ईरान यूरेनियम संवर्धन का कार्य स्थगित किए जाने की समय सीमा का पालन करने में विफल रहा लिहाजा उस पर प्रतिबंध अवश्यंभावी है।

अप्रैल 2007 में ईरान के राष्ट्रपति अहमदी नेजाद ने दावा किया कि ईरान औद्योगिक स्तर पर परमाणु ईंधन उत्पादित कर सकता है। अक्टूबर, 2007 में अमेरिका ने ईरान के विरुद्ध कड़े प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी। फरवरी 2008 में ईरान ने एक नवनिर्मित अंतरिक्ष केंद्र की शुरुआत करते हुए एक अनुसंधान रॉकेट प्रक्षेपित किया जिससे तनाव और बढ़ गया। इसी दौरान चुनाव में रुढ़िवादियों की जीत हुई और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान पर आर्थिक एवं व्यापारिक प्रतिबंध कड़े कर दिए। बावजूद इसके ईरान ने शाहब-3 नामक लंबी दूरी तक मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों के नए संस्करण का परीक्षण किया और दावा किया कि यह प्रक्षेपास्त्र इजरायली क्षेत्र को निशाना बनाने में सक्षम है। ईरान के इस गुस्ताखी से अमेरिका का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। अब अच्छी बात यह होगी कि दोनों देश बातचीत की टेबल पर बैठे। यह दोनों देशों के अलावा विश्व के हित में होगा। दुनिया में तेल के कुल प्रवाह का पांचवा हिस्सा फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच होरमुज स्टेªट के रास्ते जाता है। अगर दोनों देशों के बीच संबंध बिगड़ता है तो युद्ध जैसे हालात पैदा होंगे जो कि विश्व समुदाय के लिए कष्टकारी होगा।

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