वेलेंटाइन डेः शोक दिवस पर उत्सव क्यों

– डॉ.रामकिशोर उपाध्याय

भारत का उत्सवधर्मी जनसमुदाय प्रेम में इतना पगा हुआ है कि वह प्रेम को सदैव सम्मान और पूज्य भाव से ही देखता है | उसे इस बात की कल्पना ही नहीं है कि बाजारबाद की गला काट प्रतियोगिता ने प्रेम को भी विज्ञापन और व्यवसाय की वस्तुओं में सूचीबद्ध कर लिया है | उसे प्रेम प्रदर्शन के नाम पर उपभोक्ता बनने के लिए प्रेरित किया जा रहा है |

यूरोप में प्रेम का प्रतीक माना जाने वाला वेलेंटाइन डे भारत में भी वेलेंटाइन वीक बन गया है | किंवदंती है कि रोम का राजा क्‍लॉडियस विवाह व घर बसाने की प्रथा के विरुद्ध था | यह भी कहा जाता है कि योरप में कुछ सदी पूर्व तक विवाह की परंपरा सामान्य प्रचलन में न थी | स्त्री-पुरुष किसी के भी साथ प्रेम करने और सम्बन्ध बनाने के लिए स्वतंत्र थे | इस मुक्त संसर्ग से उत्पन्न संतति के पालन पोषण का दायित्व चर्चों के पास होता था वहाँ इनके पालक फादर कहे जाते थे | जो भी हो किन्तु यूरोपीय प्रेम की अवधारणा वाले प्रेम में पवित्रता,त्याग,समर्पण और मर्यादा के आदर्श की वैसी कल्पना नहीं थी जैसी भारत में थी और है | वेलेंटाइन चाहते थे कि वासना की स्वेच्छाचरिता को समाप्त कर लोग विवाह करें किन्तु उनके इस अभियान को वहाँ दण्डनीय माना गया परिमाण यह हुआ कि उन्हें मृत्यु दण्ड मिला | जिन युगलों के उन्होंने विवाह कराए वे प्रतिवर्ष उनकी मृत्यु के दिन श्रद्दांजलि देने लगे और इस प्रकार वेलेंटाइन डे की परंपरा बन गई | किन्तु भारत में इसका कोई औचित्य प्रतीत नहीं होता | क्यों कि हमारे यहाँ तो गृहस्थ आश्रम समाज की रीढ़ है | भारत में कोई पुत्री अपने पिता या माँ से कहे,पापा यू आर माई वेलेंटाइन तो इसका अर्थ होगा कि पिता जी आप मेरा विवाह कराने वाले व्यक्ति हैं, आपका आभार | भारत में तो माता-पिता की इच्छा से विवाह करना श्रेष्ठ माना जाता है फिर इसमें वेलेंटाइन के नाम पर क्या जोड़ें-घटाएँ यह समझ से परे है |

यदि दूसरे मिथक को मान लें जिसके अनुसार वेलेंटाइन ने किसी राजकुमारी को लिखे प्रेमपत्र के अंत में लिखा था तुम्हारा वेलेंटाइन | प्रेम करने के अपराध में उसे फाँसी दी गई तो फिर लैला मजनू,हीर-राँझा के प्यार में कौन सी कमी रह गई कि उनकी याद में प्रेम सप्ताह नहीं मनाए जाते ? हमारे यहाँ प्रेम दिवानी मीरा को पूजा जाता है किन्तु ध्यान रहे हमारा भारतीय समाज प्रेम के एवं वासना रहित प्रेम या कहें सात्विक प्रेम का ही अभिनन्दन करता है | वासना जनित प्रेम या प्रेम के नाम पर होने वाली कथित काम क्रीडाओं को यहाँ सम्मान की द्रष्टि से नहीं देखा जाता |

आधुनिक वेलेंटाइन वीक के जनक हैं यूरोपीय बाजार | उपहार बनाने-बेचने वाली कंपनियों ने जब यह देखा कि क्रिसमस के बाद वेलेंटाइन डे के आस-पास भी ग्रीटिंग कार्डों की डिमांड बढ़ जाती है | तो उन्होंने इसे प्रमोट करना आरंभ किया, वेलेंटाइन को दी जाने वाली श्रद्धांजलियाँ धीरे-धीरे उल्लास और प्रेम के उत्सव में बदल दी गईं | प्रार्थनाएँ प्रपोज डे में रूपांतरित हो गईं और देखते-ही-देखते यह उत्सव वेलेंटाइन वीक बना गाया | अब पूरे सप्ताह बाजार में रौनक रहे,बिक्री बढ़े इसके लिए एक दिन रोज डे मनाकर गुलाब बेचे गए और करोड़ों अरबों का व्यापार खड़ा कर लिया गया फिर चॉकलेट वाले इसमें कूद पड़े, एक दिन में कई महीने के बरावर चॉकलेट की विक्री होने लगी | बड़े-बड़े आकर्षक विज्ञापन गढ़े गए विवाहित लोगों के घरों में प्रेमिका की भाँति पत्नी को चॉकलेट खिलाई जाने लगीं |

अब फेसबुक आदि सोशल मीडिया ने इसे घर-घर में पहुँचा दिया | एक दिन टैडी डे बना दिया,इतने सब के बाद चौदह फरबरी को क्या करें यह सबसे बड़ी समस्या है | क्योंकि यह दिन तो शोक का दिन है तो इस दिन या तो वेलेंटाइन को श्रद्धांजलि अर्पित करो या एक सप्ताह से चले आ रहे प्रेम प्रसंग को विवाह में परिणत करो किन्तु यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं होता | जो होता है वह बहुत ही निंदनीय है, युवक-युवतियाँ और अधिकांश नाबालिग बच्चे दिन भर पार्कों,पर्यटन स्थलों पर भौंडी हरकते या कहें कि अश्लील व अमर्यादित आचरण करते दीखते हैं | सज्जन लोग आज के दिन सार्वजनिक स्थानों पर सपरिवार जाने से भी बचते हैं क्योंकि ऐसे अशोभनीय दृश्य कोई भी भला आदमी अपने बच्चों के साथ देखना पसंद नहीं करता | कई स्थानों पर पुलिस दिन भर इन कामार्त युगलों को भगाती दीखती है तो कई स्थानों पर सामाजिक कार्यकर्त्ताओं को इन्हें खदेड़ना पड़ता है | बाजारबाद ने प्रेम के नाम पर जो वितंडा खड़ा किया है वह बहुत ही भयानक है | प्रेम जीवन का संगीत है किन्तु बाजारबाद ने इसे फैशन बना दिया है | यह फैशन नई पीढ़ी को धीरे-धीरे उसी पाशविक युग की ओर ले जारह है जहाँ से वेलेंटाइन इसे निकाल कर लाए थे |

(लेखक स्वतंत्र स्तंभकार हैं )

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