पहली बार तिरंगा लहराया तो नेहरू नाचने लगे थे

आनंद मोहन माथुर

सन‌् 1929 की 31 दिसम्बर को लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने मुकम्मल आजादी का प्रस्ताव पास करवाया और पहली बार तिरंगा झंडा फहराया। नेहरू इतने उत्तेजित थे कि झंडे के चारों ओर ख़ुशी से नाचे थे।

इसी लाहौर अधिवेशन में के बारे में सुभाष बोस ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त इस प्रकार की :
‘‘मैंने वामदल की ओर से प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस देश में समानांतर सरकार स्थापित करे तथा मज़दूर, किसान तथा नौजवानों को संगठित किया जाए । ये प्रस्ताव रद्द कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस के पास मुकम्मल आजादी के ध्येय तक पहुॅंचने के लिए कोई रूपरेखा नहीं थी, बहुत सोच विचार के बाद गांधी ने आंदोलन शुरू किया जिसका नाम नमक सत्याग्रह पड़ा।’’

सत्याग्रह में प्रशिक्षित साबरमती आश्रम के 68 निवासियों कि एक टोली को साथ लेकर गांधी ने 13 मार्च को अपना प्रसिद्व डाण्डी मार्च शुरू किया। 6 अप्रैल को वे समुद्र किनारे पहुॅंचे, पानी उबालकर नमक तैयार किया लेकिन कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। दो दिन के बाद देशभर की कांग्रेस कमेटियों को निर्देश दिए गए कि वे नमक सत्याग्रह शुरू करे।

यह सत्याग्रह सीमित न रहकर बड़े पैमाने पर जुलुस, प्रदर्शन और हड़ताल के शक्ल में तब्दील हो गया। बंगाल के क्रांतिकारियों ने चटगांव में फौजी शस्त्रागर पर हमला करके हथियार लूट लिए। पेशावर में नेताओं की गिरफ्तारी के विरूद्ध बड़ा प्रदर्शन हुआ। सरकार ने प्रदर्शनकारियों को डराने के लिए बख्तरबंद गाड़ियां भेजी। जिसमें से उन्होंने एक गाड़ी को आग लगा दी। इस पर अंधाधुंध गोलिया बरसाई गई और सैकड़ों निहत्थे लोग मौत के घाट उतार दिए गए। पेशावर में पदस्थ गढ़वाली सिपाहियों ने अपने निहत्थे भाइयों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया। फलस्वरूप 25 अप्रैल से 4 मई तक पेशावर नगर पर जनता का शासन रहा। सरकार ने जब हवाई सेना और गोरों की फौज बुलाई तब कहीं पेशावर पर दोबारा कब्जा हुआ।

5 मई को गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर जबरदस्त प्रदर्शन और बड़ी बड़ी हड़तालें हुई। सोलापुर के 1,40,000 आबादी के शहर में 50,000 मज़दूरों ने प्रशासन पर अपना अधिकार जमा लिया और एक हफ्ते तक सोलापूर स्वतंत्र रहा।
इन घटनाओं का जिक्र जवाहरलाल ने ‘मेरी कहानी’ में इस प्रकार किया है :

‘‘सीमा प्रांत में गढ़वालियों की इस घटना से ऐसा ख्याल पैदा हो जाता है कि सिपाहीं अपनी इच्छानुसार तभी कार्य करने की हिम्मत करता है जब उसे लगता है कि अंग्रेजी हुकुमत के आखिरी दिन आ गए है। इसका असर फौज़ पर भी पड़ा, मगर ज़ल्दी ही ये जाहिर हो गया कि निकट भविष्य में ऐसा कुछ होने वाला नहीं है।’’

यह तभी संभव हो सकता था कि देश को क्रांतिकारी शक्तियों को उभारा जाता। समांतर सरकार स्थापित होती, अपनी अदालतें कायम होती, मज़दूर, किसान और नौजवानों की सशक्त सेना तैयार की जाती, लेकिन ये कौन करता? गांधी की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। इसके बावजूद आंदोलन फैला और खूब फैला, क्योंकि ये वक्त का तकाजा था और जनता उसके लिए तैयार थी। इस आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार ने अपनी सारी ताकत लगा दी, कांग्रेस और उसकी सहायक संस्थाओं को अवैध घोषित कर दिया गया। आर्डिनेंस लाकर मार्शल लाॅ लागू कर दिया गया। लाठी चार्ज और गोली चार्ज प्रतिदिन की घटनाएं बन गई, जो लोग कांग्रेस का झंडा उठाकर चलते थे उन्हें 10-10 साल की सजाएं दी गई, गांव में किसानों के विद्रोह को कुचलने के लिए बड़ी तादाद में पुलिस और सेना तैयार की गई। गांव में सामूहिक जुर्माने किए गए। फिर भी जोश बढ़ता गया।

लाठी, गोली के घायलों के लिए अस्थायी अस्पताल खोले गए और कैदियों से जेलें भर दी गई। 1930 के अंत में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 60 हजार और कांग्रेस आंकड़ों के अनुसार 90 हजार आदमी जेल में था।

1930 के साल में गांधी का जादू देश में चल गया था और उनकी इस मोहिनी शक्ति के बारे में गोखले ने कहा था – उनमें मिट्टी से सूरमा बना देने की शक्ति है।

इसके बाद घटनाएं यूं घटी कि 20 जनवरी 1931 को, ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेमझे मेकडाॅनल्ड ने गोलमेज़ सम्मेलन की घोषणा की और ये कहा कि उनकी मज़दूर सरकार हिन्दुस्तान को ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में औपनिवेशिक पद देने को तैयार है।

26 जनवरी को गांधी और कांग्रेस कार्यकारणी के सदस्यों को जेल से रिहा कर दिया गया तथा नई दिल्ली में लम्बी चौड़ी वार्ता शुरू हुई और फलस्वरूप 4 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता हुआ।

गांधी-इरविन समझौते का नतीजा यह हुआ कि आंदोलन स्थगित कर दिया गया और गांधी ने दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में शामिल होना मंजूर कर लिया। इसी समय की बात हैं कि भगत सिंह और उनके दूसरे क्रांतिकारी साथियों को, जिन्होंने देश की राष्ट्रीय चेतना को जगाने में ज़बरदस्त भूमिका अदा की थी, गांधी ने वायसराय को पत्र लिख कर भगतसिंह एवं उनके साथियों को माफी देने के लिए लिखा। वायसराय द्वारा पत्र प्राप्त होने के पहले ही भगतसिंह व साथियों को फांसी दे दी गई थी। बाद में गांधी गोलमेज़ सम्मेलन में शामिल होने के लिए लंदन गए। वहाॅं एक फ्रांसीसी पत्रकार ने जो प्रश्न पूछा, उसके उत्तर में गांधी ने कहा ‘‘ जो फौजी गोली चलाने का हुक्म नहीं मानता वह अपनी वफादारी से मुॅंह मोड़ता है और हुकुम उदूलीकी का अपराध करता है। मैं इन लोगों को हुकुम उदुलुकी के लिए नहीं उकसा सकता क्योंकि जब सत्ता मेरे हाथ में आएगी, मैं भी इन्हीं फौजियों को इस्तेमाल करूॅंगा। अगर मैं उन्हें हुकुम उदुलुकी की शिक्षा दूंगा तो मुझे इस बात का डर है कि जब मैं सत्ता में रहुॅंगा तो वे भी ऐसा ही करेंगे ।

जवाहरलाल इस आंदोलन में दो बार जेल गए। गांधी इरविन समझौते के दौरान जवाहरलाल दिल्ली में ही थे। गांधी गोलमेज़ सम्मेलन से खाली हाथ लौटे, आंदोलन दोबारा भड़क उठा, फिर नेताओं की गिरफ्तारी हुई, फिर लाठीचार्ज हुए और फिर गोली चार्ज हुए, लेकिन इस क्रूर दमन का जनता ने वीरता से सामना किया।

ब्रिटिश सरकार मज़बूत हो चुकी थी और उसके झुकने का सवाल ही नहीं था। अतएव गांधी ने इस बार आंदोलन उपवास द्वारा समाप्त किया। जवाहरलाल पर, उनके पिता मोतीलाल का काफी असर हुआ था और दूसरी ओर जहवारलाल का मोतीलाल पर भी बहुत असर हुआ था। मोतीलाल नेहरू ऊॅंचे कद के और सुडौल शरीर के व्यक्ति थे, बुद्धि के तेज़ और विनोदी स्वभाव के थे। मोतीलाल नेहरू ने 1888 से कांग्रेस अधिवेशनों में यद्यपि शामिल होना शुरू किया था लेकिन वे सक्रिय हुए जब बंग-भंग विरोधी आंदोलन राष्ट्रव्यापी हुआ। 1906 के कोलकाता अधिवेशन में विदेशी चीजों का बहिष्कार, स्वदेशी का अंगीकार, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज, यह चार सूत्रीय कार्यक्रम राष्ट्रवादियों के सुझाव पर पारित हुआ था, लेकिन अजीब बात थी कि मोतीलाल ने इसका विरोध किया था।

प्रारंभ के दिनों में मोतीलाल भी माडरेट की तरह यह मानते थे कि अंग्रेज़ हमको असभ्य से सभ्य बनाने आया है और इसलिए उन्होंने अपना जीवन पश्चिम की जीवन पद्धती में ढाल लिया था। इसके बावजूद मोतीलाल इंग्लैंड की धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक रीति रिवाजों पर कड़ा प्रहार करते थे और यह उनके चरित्र का अंग बन गया था।

इसका एक उदाहरण यह है कि एक बार उन्होनें शिमला में उनके सम्मान में दी गई पार्टी में शराब पी। इस पर गांधी ने एतराज़ किया और उनको पत्र लिखा, इस पत्र का जवाब मोतीलाल नेहरू ने 10 जुलाई 1924 को दिया वह पढ़ने योेग्य है :

‘‘मेरा धर्म मेरा देश है, मैं इसकी सेवा ईमानदारी, सच्चाई और तन, मन, धन से अपनी रोशनी के अनुसार करने को तैयार हूॅं और इस पर धार्मिक अंधविश्वासों का कोई असर नहीं पड़ेगा। जहाॅं तक शराब पीने का संबंध है, हो सकता है मैं आगे जाकर पीऊँ या न पीऊँ यह मेरा निजी मामला है और यदि मैं पीऊँगा तो संसार में कुछ भी हो जाए इसके लिए मुझे चोरी चुपके पीने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। मैं चाहूॅंगा कि लोग जैसा मैं हूॅं उसी पर से मेरे संबंध में अपना मत बनाए न कि मैं वैसा बनूँ, जैसा लोग मुझे चाहते है।’’

1926 के चुनावी भाषण में उन्होनें कहा था, ‘‘वेद क्या, मैं किसी भी पुस्तक को ईश्वरीय ज्ञान नहीं समझता। नैतिक नियम सभी धर्म ग्रंथों में मिलते हैं, पर मैं यह नहीं मानता कि ईश्वर इंसान से बातें करता है। अतः मोतीलाल दिल के निर्भीक और प्रगतिशील व्यक्ति थे। 1899 में अपनी पहली विदेश यात्रा के बाद जब उन्हें जात से बाहर कर दिया गया और प्रायश्चित करने को कहा गया तो उन्होंने साफ मना कर दिया।

मोतीलाल नेहरू अंग्रेज़ो पर बड़ा प्रभाव रखते थे, यद्यपि वे वायसराय की काउंसिल के सदस्य नहीं रहे, लेकिन वायसराय तक से उनके अच्छे संबंध थे और इसी कड़़ी में पंजाब में सिखों का जैतों मोर्चा चल रहा था और नाभा रियासत में जवाहरलाल को गिरफ्तार कर लिया गया था, तब मोतीलाल के कहने पर वायसराय ने जवाहरलाल को नाभा जेल से छुड़वाया था।

मोतीलाल असाधारण प्रभाव के व्यक्ति थे। एक बार उन्होनें किसी को बैंक की नौकरी के लिए मैनेजर के पास चिट्ठी लेकर भेजा तो मैनेजर ने कहा कि मोतीलाल नेहरू की सिफारीश का मतलब है ‘नियुक्ति’ और उस व्यक्ति को तुरंत नियुक्ति मिल गई। मोतीलाल के संबंध में एक बड़ा आश्चर्य होता था कि इतने ठाठ बाठ से रहने वाला प्रभावशाली दबंग व्यक्ति अपनी आत्मा की आवाज़ पर रूढ़ीवादी गांधी का अनुयायी कैसे बन गया।

गांधी ने एक साल में स्वराज दिलाने के विश्वास पर सविनय भंग आंदोलन शुरू किया था। इस विश्वास का मोतीलाल पर यह असर पड़ा कि अपनी उच्चतम स्तर की वकालत छोड़कर, वो खद्दर पहनने लगे, आंदोलन में कूद पड़े और जेल चले गए। अतएव असाधारण सफलता प्राप्त करना और ऊॅंचाइयों पर उठने की महती इच्छाशक्ति जवाहरलाल को विरासत में मिली थी।

मोतीलाल और जवाहरलाल के उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि पतनमुखी साम्राज्यवादी पश्चिम सभ्यता ने पूॅंजीवादी युग में नैतिक और वैज्ञानिक मूल्यों के सत्य को ताक में रखा। इस कथन को इन शब्दों में व्यक्त किया जा सका है। ‘‘इस दुनिया का सच झूठ है और झूठ सच है’’ ब्रिटिश प्रणाली ने ऐसे ही राजनैतिज्ञ और शासक तैयार किए थे, जिनका चरित्र दोमुॅंहा था। एक बड़ी विडंबना थी कि केम्ब्रिज में जो हिन्दुस्तानी मज़लिस थी उसमें हिन्दुस्तानी विद्यार्थी भारत की राष्ट्रभक्ति के संबंध में बड़ी उग्र भाषा का प्रयोग करते थे और यहाॅं तक कि बंगाल के हिंसक आंदोलन की तारीफ करते थे, लेकिन इन्हीं लोगों में से कुछ आई.सी.एस. बन जाते थे और कुछ हाईकोर्ट जज और कुछ बैरिस्टर बन जाते थे।

यहाॅं यह उल्लेखनीय है कि दोनों, मोहनदास करमचंद गांधी और जवाहरलाल नेहरू की शिक्षा लंदन में हुई थी और कायदे से उन्हें बड़ा अफसर अथवा बड़ा नेता बनकर अपने साम्राज्यवादी हित में उसे इस्तेमाल करना था। इन आरामघर के आग-बबूलों में से बिरले ही ऐसे थे जो हिन्दुस्तान लौटने के बाद उसकी आजादी के राजनैतिक आंदोलन से जुड़े और कारगर हिस्सा लिया। सुभाष बोस और जवाहरलाल इसके अपवाद थे।

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