पटना में लगे नीतीश और लालू के पोस्टर के पीछे असल वजह क्या हो सकती है?

विभव देव शुक्ला

देश की राजधानी में चला एक महीने का चुनावी समर खत्म हो चुका है। राजधानी की जनता ने आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल को एक बार फिर मुख्यमंत्री चुना है। पूरे महीने चली चुनावी उठा-पटक अब खत्म हो चुकी है लेकिन हमारे देश के चुनावों का मिजाज़ इतना हल्का नहीं होता है। चाहे चुनाव हों या त्यौहार, एक के जाते ही दूसरा हाजिरी लगा ही देता है। इसी कड़ी में अब बिहार राज्य में चुनाव होने हैं और वहाँ होने वाली छोटी से छोटी राजनीतिक हलचल सुर्खियों की वजह बन रही है।

जिस पोस्टर में नीतीश हैं
चुनाव को मद्देनजर रखते हुए राजनीतिक दलों के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। इन तैयारियों के बीच अक्सर ऐसी घटनाएँ होती हैं जिनका पूरे चुनाव पर असर पड़ता है। बिहार की राजधानी पटना में कुछ पोस्टर लगाए गए हैं, पोस्टर में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नज़र आ रहे हैं और दूसरे में लालू प्रसाद यादव। आम तौर पर नेताओं के पोस्टर उनके समर्थन में लगाए जाते हैं लेकिन इन पोस्टर्स के साथ ऐसा नहीं है।
पहले पोस्टर में नीतीश कुमार हैं, उनके हाथ में एक तीर है और आस पास बहुत से तीर मौजूद हैं। हर तीर पर तमाम शब्द लिखे हुए हैं जैसे भ्रष्टाचार, घोटाला, जर्जर कानून व्यवस्था, बेरोजगारी, ठप्प विकास, अशिक्षा। इसके अलावा बहुत से तीर ज़मीन के एक बड़े हिस्से में धँसे हुए हैं और उन तीरों के सहारे वह ज़मीन उठी हुई है। साथ ही साथ उससे बहुत सारा खून निकल रहा है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार सिंहासन पर बेफिक्र और खुश होकर बैठे हुए हैं।

दूसरे पोस्टर में हथियार और खून
दूसरे पोस्टर में मौजूद हैं लालू प्रसाद यादव और यह पोस्टर पूरा फिल्मी है। पोस्टर के ऊपर लिखा है ठग्स ऑफ बिहार और पूरे पोस्टर में फिल्म की रील नज़र आ रही है। रील में ऐसी तस्वीरें दिख रही हैं जिनमें हथियार, खून, तोड़-फोड़, टूटी सड़कें और लाशें नज़र आ रही हैं। पोस्टर के ठीक नीचे लिखा हुआ है ‘जरा याद करो, वो कहानी पुरानी’ और पोस्टर के ठीक बीचोंबीच लालू प्रसाद यादव की बड़ी से तस्वीर नज़र आ रही है। पोस्टर भले राजनीतिक हो पर मिजाज़ में पूरी तरह फिल्मी है।
लेकिन इस तरह के हर काम की ठोस वजह होती है, बिहार पहले ही इस मामले में तमाम आलोचनाओं का सामना करता है। हाल ही में आई राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट भी कुछ अलग कहानी बयां नहीं करती है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत के 19 मेट्रोपोलेटिन शहरों में होने वाली मौतों में बिहार की राजधानी पटना सबसे ऊपर थी। वहीं अपराध के मामले में बिहार पांचवें पायदान पर आता है। दंगों के मामले में भी बीते वर्ष बिहार देश के सभी राज्यों में सबसे आगे रहा था।

क्या कहते हैं राज्य के आंकड़ें
वहीं हनीमून किडनैपिंग के मामले भी खूब सामने आए। कुछ समय पहले की बात करें तो बिहार राज्य में होने वाले अपराधों की रफ्तार इतनी ज़्यादा नहीं थी। अपराध के मामले में साल 2015 के दौरान बिहार नौंवे पायदान पर था वहीं साल 2016 में आठवें पायदान पर था। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक पटना में महिलाओं के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है।
साल 2018 में महिला अपराध के लगभग 16920 मामले दर्ज किए गए। जो कि साल 2017 में 14711 थे और साल 2016 में 13400 थे इतना ही नहीं एक और हैरानी वाली बात यही थी कि 98 फीसदी मामलों में अपराध के लिए ज़िम्मेदार जानने वाले थे। दहेज के चलते होने वाली हत्याओं के मामले में भी बिहार पहले पायदान पर आता है। शहरों के लिहाज़ से बिहार की राजधानी पटना दहेज हत्या में पहले पायदान पर आती है।
वहीं, बिहार में साल 2018 में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के 179 मामले सामने आए हैं, जिसमें 231 पीड़ितों की व्यथा और दुश्वारियां सामने आयीं हैं। इसमें भी देश भर में बिहार के मामले सर्वाधिक होने का रिकॉर्ड है। रिपोर्ट के हिसाब से 2018 में बिहार में देश भर में सबसे ज्यादा 6608 सम्पति विवाद के केस सामने आए हैं। यहां एक लाख की आबादी पर 5.8 लोगों ने सम्पति विवाद के मामले दर्ज कराए हैं।

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