जब प्रधानमंत्री अटलजी ने पूछा – किधर है हमारा कल्लू?

आशीष कुमार मैसी

अटल बिहारी वाजपेयी ने मार्च 1998 में एक बार फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इस दौरान यह तय किया गया कि जिन शहरों में अटलजी का यौवन बीता, उन शहरों में उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में घुमाने का कार्यक्रम तैयार किया जाए। अपने छात्र जीवन में अटलजी ने काफी वक्त ग्वालियर, आगरा व कानपुर में गुजारा था। इन शहरों में उनके छात्र जीवन की बहुत सारी यादें बसती हैं। अटलजी खान-पान के बहुत शौकीन हुआ करते थे। आगरा से जुड़ा एक किस्सा है। वहां पर बहुत छोटे पैमाने पर कारोबार करने वाला एक हलवाई हुआ करता था, जिसे कल्लू हलवाई के नाम से जाना जाता था। उसकी कचौड़ी और जलेबियां बड़ी मशहूर थीं। फक्कड़ स्वभाव के अटलजी को अक्सर पैसे के अभाव में कल्लू हलवाई के पास उधार करना पड़ जाता था। अमूमन वह उधार चुका देते थे, कभी-कभार ऐसा भी होता कि नहीं चुका पाते थे, मगर एक बात जो नियमित थी, वह यह कि कचौड़ी-जलेबी खाने के बाद अटलजी कल्लू हलवाई की प्रशंसा करना नहीं भूलते थे। अटलजी से अपनी तारीफ सुनने के बाद कल्लू हलवाई का मन बेहद प्रसन्न हो जाता। कल्लू हलवाई अटलजी को यशस्वी होने की दुआ भी देते। जब प्रधानमंत्री के रूप में अटलजी आगरा पहुंचे, तब का नजारा बिलकुल अलग था। सर्किट हाउस को एक नया रूप दिया गया था। जैसे ही अटलजी अपनी पुत्री व दामाद के साथ सर्किट हाउस पहुंचे, तो सारा नियंत्रण एसपीजी के हाथों में आ गया।

यहां तक कि स्थानीय प्रशासन के अधिकारी भी एसपीजी के अधिकारियों के दिशा-निर्देश पर काम कर रहे थे। इधर जब कल्लू हलवाई को अटलजी के आने की खबर लगी, तो उन्होंने उनकी पसंदीदा कचौड़ी-जलेबी एक कटोरे में पैक की और पहुंच गए सर्किट हाउस। वहां मौजूद अधिकारियों से बड़े रौब से कहा, ‘जाओ, अटलजी को बता दो कि कल्लू हलवाई आए हैं।’ एसपीजी की उपस्थिति में सर्किट हाउस संवादहीन हो गया था। लेकिन उस समय ड्यूटी पर तैनात एक डीआईजी लेवल के अधिकारी ने कल्लू हलवाई का कॉन्फिडेंस देखते हुए अटलजी तक यह संदेश भिजवाने की कोशिश की। उनकी यह कोशिश रंग लाई। एसपीजी ने यह खबर अटलजी को उस वक्त पहुंचाई, जब वह अपने कमरे में नहाने के बाद तैयार हो रहे थे। कल्लू हलवाई की खबर मिलते ही अटलजी अपनी धोती बांधते हुए कमरे से बाहर आ गए और पूछने लगे, ‘किधर है हमारा कल्लू/’ अटलजी का इस तरह से निकलकर पूछना सारे अधिकारियों को बदहवास कर गया। सारे के सारे कल्लू हलवाई को अंदर लाने के लिए गेट की तरफ लपके। वही कल्लू, जिसे अभी तक गेट पर नहीं ठहरने दिया जा रहा था, अचानक वीआईपी हो गया। अटलजी उसे अपने कमरे के अंदर ले गए। अंदर जो भी विशिष्टजन मौजूद थे, उन्हें कल्लू द्वारा लाई गई कचौड़ी और जलेबी खिलाई। साथ ही कल्लू से माफी भी मांगी कि प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचने के बाद सब कुछ अपने हाथ में नहीं रहता, यहां तक मिलना-जुलना भी नहीं।

पचास के दशक में संघ प्रचारक के रूप में अटलजी का यूपी के हरदोई और लखीमपुर जिलों से भी गहरा रिश्ता रहा है। आज भी इन जिलों के कई ऐसे परिवार मिल जाएंगे, जिनके साथ अटलजी की बैठकी, किस्से-कहानी और हंसी-ठिठोली चला करती थी। लखीमपुर खीरी जिले की मोहम्मदी तहसील किसी समय जिला मुख्यालय होती थी। यहां अटलजी की दांतकाटी यारी (स्वर्गीय) ओमप्रकाश रस्तोगी, नवीन गुप्ता और उमाशंकर रस्तोगी के साथ थी। एक राजपरिवार भी था वहां। उस समय राजा प्रताप सिंह (अब स्वर्गीय) का जलवा था। आज उनके पोते कुंवर लोकेंद्र प्रताप सिंह मोहम्मदी विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। प्रचारक के रूप में अटलजी के मोहम्मदी प्रवास के दौरान एक रात्रि का भोजन राजा प्रताप सिंह के आवास पर तय हुआ। भोजन के लिए ओमप्रकाश रस्तोगी व अटलजी नई एटलस साइकिल पर सवार होकर राजा साहब की कोठी पहुंचे।

राजा साहब ने अटलजी के प्रति अगाध प्यार का इजहार करते हुए स्वादिष्ट भोजन के साथ अपने बाग के कई किस्म के आम व केसर मिश्रित दूध की व्यवस्था की थी। खाना खाकर जब ये लोग वापस होने लगे, तो बूंदाबांदी शुरू हो गई। उसके बाद तेज बारिश से सड़कें जलमग्न हो गईं। सड़क के गड्ढों में पानी भर जाने के कारण साइकिल चलाना दूभर हो गया। मजबूरी में साइकिल कंधे पर रखकर दोनो हांफते-कांपते मोहम्मदी शिवालय (बड़ा मंदिर) पहुंचे, जहां उनके रुकने का ठिकाना था। वहां जब पहुंचे, तो मदद के तौर पर कुछ लोगों ने पानी का इंतजाम कर हाथ-पैर साफ कराया और फिर दावत कैसी रही, यह सवाल किया। अटलजी ने प्रेम से कहा कि राजा साहब ने भोजन तो जमकर कराया। आम भी स्वादिष्ट थे, दूध भी मजेदार था, भूख भी खूब लगी थी, लेकिन साइकिल को कंधे पर लेकर चलना उतना ही दुष्कर था। न जाने हमारे देश में संपर्क मार्ग कब और कैसे बन पाएंगे/ फिलहाल हमें प्रतीक्षा व चिंतन करना होगा।

इसके बाद वह सांसद हो गए। नए सांसद के रूप में उन्होंने गांवों में संपर्क मार्ग की आवश्यकता को रेखांकित किया, तो यूपी से ही कांग्रेस के एक सांसद ने उन्हें इस तंज के साथ चुप कराया, ‘अभी तो संसद में आए हो। संसदीय प्रक्रिया सीखो, वरिष्ठ लोगों को सुनो। जब प्रधानमंत्री बनना, तब योजनाएं बनाने की बात करना।’ शायद सांसद जी की जिह्वा पर मां सरस्वती का वास था। वह नवयुवक अटल न सिर्फ संसदीय शिष्टाचार में पारंगत सांसद बना, बल्कि तीन बार प्रधानमंत्री भी बना। प्रधानमंत्री के रूप में ‘ग्राम संपर्क योजना’ उनकी उस रात की स्मृति से निकली योजना थी।

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