जब अपनी माँ के कहने पर मुगलों का सामना करने के लिए तैयार हो गए थे शिवाजी

विभव देव शुक्ला

हमारे देश के इतिहास में ऐसी तमाम कहानियाँ हैं जिनके बारे में हमने सुना है और ऐसी कहानियों का बुरा पहलू भी यही है कि हमने ऐसी कहानियाँ बस सुनी हैं। हम उन कहानियों को एक सीमित पैमाने पर ही जानते हैं, एक हद तक ही उन कहानियों को समझते हैं। हमने आज तक उन कहानियों के लिबास में लिपटे जज़्बातों को करीब से महसूस नहीं किया है। ऐसी ही एक दास्तान है शिवाजी की माता जीजाबाई की।

कम उम्र में हो गया था विवाह
महाराष्ट्र में एक प्रांत है विदर्भ और यहाँ का एक ज़िला है बुलढाणा। जीजाबाई बुलढाणा ज़िले के नजदीक स्थित मेहकर नाम की जगह के पास पैदा हुई थीं। जाधववंश में जन्मी जीजाबाई का विवाह बहुत कम उम्र में शाहजी भोंसले के साथ तय कर दिया गया था। जिसके कुछ ही समय बाद शाहजी अफ़जल खान से युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए थे। इस घटना ने जीजाबाई पर इतना प्रभाव डाला कि वह अग्नि में सती होने वाली थीं।

होने वाली थीं सती
जीजाबाई ने सती होने का पूरा मन बना लिया था और जब वह ऐसा करने गईं तभी उनके पुत्र शिवाजी ने उन्हें ऐसा करने से रोका। ऐसा माना जाता है कि इस घटना के बाद जीजाबाई का विश्वास शिवाजी पर दृढ़ हो गया। उन्हें आभास हो चुका था कि शिवाजी मराठा साम्राज्य के शिरोमणि साबित हो सकते हैं। जिसके बाद उन्होंने शिवाजी के पालन-पोषण में अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी, उन्होंने शिवाजी के पालन-पोषण में अपने गुरु समर्थ गुरु रामदास का भी पूरा सहयोग लिया।

फहराना होगा सिंहगढ़ पर ध्वज
जीजाबाई शिवाजी को राजा, महाराजा और सम्राटों की वीरता के किस्से सुनाती थीं। जिससे शिवाजी के व्यक्तित्व में भी वैसी ही वीरता रहे, किसी भी शत्रु के सामने उनका मनोबल और साहस बरकरार रहे। जीजाबाई और शिवाजी से जुड़ा एक किस्सा काफी प्रचलित है, जिसमें उन्होंने शिवाजी के सामने शर्त रख दी। या तो शिवाजी जी उनकी इच्छा पूरी करें या खुद को कायर मान कर मौन धारण करके बैठ जाएँ।
जीजाबाई ने शिवाजी से कहा ‘तुम्हें सिंहगढ़ के ऊपर फहराते बाहरी शासकों के झंडे को उखाड़ कर फेंकना होगा। चाहे किसी भी प्रकार की परिस्थितियों का सामना करना पड़े लेकिन तुम्हें उस स्थान पर हमारे साम्राज्य का ध्वज फहराना। अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं तुम्हें अपना पुत्र स्वीकार नहीं करूंगी, मैं तुमसे अपना सम्बन्ध अस्वीकार कर दूँगी। इसलिए तुम्हें मेरी यह इच्छा पूरी करनी ही होगी।

शिवाजी ने लड़ा था भीषण युद्ध
पूरी बात सुनने के बाद शिवाजी ने कहा, मुगल सेना बहुत विशाल है। मुगल शासक क्रूर और आततायी हैं, वह स्वभाव से ही नृशंस और वीभत्स हैं। उनका मुक़ाबला करना इतना आसान नहीं होगा, हमारा ध्वज फहराना तो फिर भी कठिन कार्य हैं। हमें पहले खुद को मज़बूत करना होगा उसके बाद हम उनका सामना कर पाएंगे।
यह सब सुन कर जीजाबाई ने घोर असहमति जताई और शिवाजी की हर बात को सिरे से खारिज कर दिया। उनकी असहमति बूझ कर शिवाजी ने तत्काल युद्ध की योजना बनाई और एक भीषण युद्ध लड़ा। कहना गलत नहीं होगा कि शिवाजी के अंदर वीरता को आयाम देने में एकमात्र योगदान उनकी माता जी का था। ऐसा माना जाता है कि 17 जून साल 1674 में जीजाबाई की मृत्यु हुई थी।

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