जब संपादक की मृत्यु पर पाठक रोता था

ओमप्रकाश श्रीवास्तव

संपादक संस्था क्यों खत्म हो गई और इसका क्या प्रभाव पत्रकारिता और पाठक जगत पर पड़ा यह पाठक की दृष्टि से यह मेरे लिए चिन्ता का विषय है। संपादक संस्था के समाप्त होने से अखबारों में से बौद्धिक तत्व समाप्त-सा हो गया है।

देश का कोई भी ख्यातनाम अखबार लीजिए जिसे आप पढ़ते हों। उसके संपादक का नाम बताइये। चकरा गये न। जरा फिर सोचिए। मेरा अनुमान है कि 95 प्रतिशत पाठक नहीं बता पाऍंगे। यदि मेरा अनुमान गलत हो जाए तो सबसे ज्‍यादा प्रसन्‍नता मुझे ही होगी। अब संपादक का नाम जानना हो तो अंतिम पृष्‍ठ पर नीचे छपी प्रिंट लाइन देखना पड़ेगी। परंतु सदैव ऐसा न था । एक समय था जब नवभारत टाइम्स को राजेन्द्र माथुर, जनसत्ता को प्रभाष जोशी और द हिन्दु को एन. राम के नाम से जाना जाता था। ऐसे कितने ही और संपादक भी थे। यह तो बड़े अखबारों की बात है। छोटे और आंचलिक अखबारों के संपादकों को छोटे कस्बों और शहरों में तकरीबन सभी पढ़े-लिखे लोग जानते थे और सम्‍मान देते थे। अब भी कुछ समाचार पत्र व उनके संपादक बचे हैं जो इस परंपरा के वाहक हैं परंतु वह उँगलियों पर गिने जाने लायक हैं। बाजार के कुचक्र में फँसी पत्रिकारिता में यह गिनती भी दिनों दिन कम होती जा रही है।

संपादक संस्था क्‍यों खत्‍म हो गई और इसका क्या प्रभाव पत्रकारिता और पाठक जगत पर पड़ा यह विवेचन करना मेरा कार्य नहीं है और न ही मैं इसके लिए आधिकारिक व्यक्ति हूँ। परंतु पाठक की दृष्टि से यह मेरे लिए चिन्ता का विषय है। संपादक संस्था के समाप्त होने से अखबारों में से बौद्धिक तत्त्व समाप्त-सा हो गया है। अब जो बचा है वह मात्र जानकारी है, विज्ञापन है या मनोरंजन है।

नवभारत टाइम्स के संपादक राजेंद्र माथुर इसी विलुप्‍त होती परंपरा के स्वनामधन्य संपादक थे। उन्हें मैनें कभी देखा नहीं था । मेरा उनसे रिश्ता पूर्णत: संपादक और पाठक का था। उनका कोई भी लेख मैं पढ़े बिना नहीं छोड़ता था। तब टीकमगढ़ जैसे छोटे कस्बाई जिले में नवभारत टाइम्स दो दिन बाद वितरित होता था। मैं सबेरे से ही जिला पुस्तकालय पहुँच जाता था। सबसे बड़ा आकर्षण होता था राजेंद्र माथुर जी के लेख पढ़ना। मैनें वर्ष 1989 में लोकसेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण की तो इसमें बड़ा श्रेय राजेंद्र माथुर को जाता था जिनके लेखों ने मुझे तथ्य के साथ-साथ उन पर विचार कर अपने निष्कर्ष निकालने के लिए प्रशिक्षित किया।

प्रशिक्षिण के पश्चात मैं डिप्‍टी कलेक्टर के रूप में दमोह में पदस्थ था। अफसरों को मिलने वाले नए-नए सम्मान से अभिभूत था। वेतन भी इतनी थी जितनी मैनें कभी सोची भी न थी। शादी भी तय हो गई थी। स्वाभाविक रूप से मैं सातवें आसमान पर रहने लगा था। ऐसे बसंत के बीच मुझे 10 अप्रैल 91 का दिन अभी तक याद है। रेडियो पर सुना कि राजेंद्र माथुर नहीं रहे। वज्रपात सा हो गया। मेरे आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मेरे सहकर्मी एकत्र हो गये। उन्हें लगा कि परिवार में कोई दुर्घटना हो गई है। वे तो सोच भी नहीं सकते थे कि मैं उस व्यक्ति के लिए रो रहा था जिसे न तो मैनें देखा था न उससे कभी मिला था। यह उस संपादक की कलम की ताकत थी जो एक पाठक को रोने पर विवश कर रही थी।

हाल में ही मुझे राजेंद्र माथुर के लेखों का संकलन मिला। मैनें उसे फिर से पढ़ा। उनके लेखों में विषय के तथ्य, पक्ष-विपक्ष का विवेचन तो होता था परंतु अंतिम निष्कर्ष पाठक पर छोड़ दिया जाता था। जो पाठक को सोचने पर विवश करता था, उसे सामाजिक सरोकारों से जोड़ता था, उसकी तर्कणा शक्ति को बढ़ाता था। यही निरपेक्ष पत्रकारिता थी। जब मैं इसकी तुलना वर्तमान संपादकीय लेखों (कुछ को छोड़कर जो उँगलियों पर गिने जाने लायक हैं) करता हूँ तो पाता हूँ कि अब अधिकतर लेखों के शीर्षक ही बता देते हैं कि उनका निष्कर्ष क्या है। यह निष्कर्ष सामान्यत: पूर्वधारणाग्रस्त होते हैं। पका-पकाया माल होता है। इनमें पाठक को सोचने-विचारने के लिए कुछ नहीं होता। ऐसे लेखों की विचारधारा से यदि पाठक सहमत होगा तो वह उस संपादक / समाचारपत्र का अंधभक्त बन जाता है और असहमत होने पर दुश्मन। दोनों ही स्थितियों में न तो निरपेक्ष संपादक बचता है न निरपेक्ष पत्रिकारिता और न ही निरपेक्ष पाठक।

संचालक जनसंपर्क के रूप में मुझे लगभग 4 माह के संक्षिप्त कार्यकाल का सौभाग्य मिला। इस दौरान समाचार पत्र, उनके मालिक, संपादक, पत्रकार, संवाददाता सभी से संपर्क में आया। मुझे लगता है कि घोर अंधेरे में कुछ लोग प‍त्रकारिता की मशाल जलाए हुए हैं। अभी भी कुछ अच्छे संपादक हैं। बड़े मीडिया घरानों से परे छोटे प्रकाशन हैं जो अभी भी संपादक के नाम को जिन्‍दा रखे हुए हैं। ईश्वर करे यह संपादकगण जीवेत शरद: शतम् को सिद्ध करें । फिर भी जब दुनिया से जाएं तो उनके कार्य की सार्थकता की कसौटी यही होगी कि उन्होंने अपने पीछे रोते हुए पाठक छोड़े हैं या नहीं?

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