महादेवी वर्मा ने क्यों कहा कि वो किसी पण्डित जसराज को नहीं जानती?

सुनीता बुद्धिराजा

संगीत के लिए एक ‘प्यारा-सा दिल’ चाहिए। उस ‘प्यारे-से दिल’ के साथ पंडित जसराज का परिचय श्रीमती महादेवी वर्मा ने करवाया। कलकत्ते में एक न्यू एम्पायर थियेटर है। पुराना, ब्रिटिश ज़माने से उसमें एक कार्यक्रम हुआ। महादेवी जी आयी थीं। ‘हम गाकर उठे और उनसे मिलने गये, बहुत खुश हुई। बोलीं-इलाहाबाद नहीं आते, मैंने कहा-आता तो हूँ। बोलीं-तब मिला करो। अगली बार जब इलाहाबाद गया तब उनसे मिलने उनके घर गया। तो कहने लगी , ‘अनुज! जसराज नहीं, पंडित जसराज नहीं, अनुज! अनुज, तुम गाते तो बहुत अच्छा हो, पर थोड़ा-सा प्यार करो न! हमको तो पहले समझ में नहीं आया। कहें, इतना अच्छा, स्पष्ट बोलते हो, पीछे भावना भी लाओ न! अब साहब, इतनी बड़ी इतनी महान् व्यक्ति ने यह बात कही तो थोड़ा-सा गौर किया। सच में क्या कि हम कुएँ पर तो ज़रूर खड़े हैं, मगर मुँडेर पर खड़े हैं, नीचे पानी में नहीं उतरे। बस आँख के आगे से पर्दा हट गया।

’ पंडित जसराज महादेवी जी के विषय में बात करते-करते आँखें पोंछते हैं। यही है उनकी विनम्रता, यही है उनका प्यारा-सा दिल जो उनके गायन में ही नहीं. व्यक्तित्व के एक-एक पक्ष में भी है। मुझे यहाँ स्वामी अवधेशानन्द की बात भी स्मरण हो आती है जो कहते हैं कि शब्द मुखरित होना चाहते हैं। भाषा अभिव्यक्ति चाहती है। अर्थ अभिव्यक्ति चाहते हैं। संगीत, एक प्यारा-सा दिल चाहता है। संगीत, शब्दों के अर्थों की तह तक जाने का नाम है।

सन् 1953 में संगीत श्यामला का वार्षिक उत्सव था। उसकी सभानेतृ थीं श्रीमती महादेवी वर्मा। स्कूल में यह तय किया गया कि पंडित जसराज कुछ छात्राओं को कुछ ऐसा गीत तैयार करा दें जो सभा के उपयुक्त लगे। एक बन्दिश तैयार करा दी- ‘मोहन मधुर आज, मुरली बजाई, सुन-सुन सखियाँ वन में आई। मोहन मधुर आज मुरली बजाई। गान गरजत मेघहा बरसत, चौंक पड़ी राधा ललिता अकुलाई।’

यह रचना पंडित जसराज जी को प्रारम्भिक बन्दिशों में से एक है। तब दोगुन, चौगुन करके लड़कियों को 10-11 मिनट का यह पद लिखा दिया। किसी ने जसराज जी को महादेवी जी की पुस्तक दी ‘स्वप्न यामिनी’, कि इसमें से भी कोई गीत तैयार करा दें। क्योंकि महादेवी जी आने वाली हैं, अच्छा लगेगा। पंडित जसराज ने एक गीत को संगीत में बाँधना शुरू किया- ‘क्या पूजा क्या अर्चन रे। इस असीम का सुन्दर मन्दिर मेरा लघुतम जीवन रे। क्या पूजा क्या अर्चन रे।’ बस इतना सा ही बना, उसके बाद वह अर्चना वहीं थम गयी।

इसके बाद महादेवी जी के साथ भेंट होती रही। महादेवी जी के साथ जसराज जी का सम्बन्ध उस श्रेणी में रखा जा सकता है जिसे भूल पाना उनके लिए सम्भव नहीं है। सन् 1978 में पंडित जसराज को इलाहाबाद में आनन्द भवन में गाने के लिए बुलाया गया। इन्होंने आयोजकों से आग्रह किया कि महादेवी जी को कार्यक्रम में बुलवायें। लेकिन वे लोग कहने लगे कि उन्हें बुलाना बहुत कठिन है और वे कहीं आती-जाती नहीं हैं। उनका कहना था कि महादेवी जी बहुत चिड़चिड़े स्वभाव की हैं, गुस्सैल हैं। जसराज जी तब व्यक्तिगत रूप से उन्हें आमंत्रित करने गये। वे कहने लगी कि अनुज तुम बहुत तंग करते हो। मुझे क्यों बन्दर सेना की तरह साथ में लेकर जाना चाहते हो? ख़ैर, गाड़ी भिजवा देना, मैं आ जाऊँगी।

महादेवी जी 6 बजे के कार्यक्रम के लिए एक घण्टा पहले ही पहुँच गयीं। वहाँ पर लोगों को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ कि महादेवी जी आयी हैं। फिर यथायोग्य सम्मान किया।
इसके बाद भी जब भी जसराज जी इलाहाबाद जाते, महादेवी जी का दर्शन अवश्य करने पहुँचते। कभी इनके कार्यक्रमों को सुनने आतीं तथा इन्हें और इनके शिष्यों एवं संगतिकारों को घर में बुलाकर सत्कार करतीं। तरह-तरह के भोजन-पकवान-मिठाई बनवाकर खिलाना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। एक बार एक कार्यक्रम में वे जसराज जी को ले गयीं। अज्ञेय जी भी वहाँ मंच पर आसीन थे। महादेवी जी ने जसराज जी को अज्ञेय जी और अपने बीच में मंच पर ही बिठा दिया।

जसराज जी कहते हैं, ‘एक बार सुना कि उनकी तबीयत बहुत खराब हो गयी है। चेहरे पर अधरंग हुआ है। किसी से मिलती-जुलती नहीं। मैं इलाहाबाद चला गया बगैर किसी को बताये हुए। जहाँ मैं ठहरता था वहाँ केवल अपना सामान रखकर महादेवी जी के पास जाने को निकला। मेरे मित्र ने कहा, पंडित जी क्या फ़ायदा, वे बाहर तो आती ही नहीं हैं, मिलेंगी नहीं आपसे। मैंने कहा, मिलेंगी न! तो मेरे साथ और भी चार-पाँच लोग वहाँ गये। मैंने भृत्य से कहा कि महादेवी जी को सूचना दे दो कि पंडित जसराज आये हैं। भृत्य ने लौटकर कहा कि महादेवी जी कहती हैं, वे किसी पंडित जसराज को नहीं जानती हैं। मैंने कहा कि कहो मुम्बई से गायक पंडित जसराज आये हैं। भृत्य ने फिर लौटकर कहा कि हम मुम्बई के किसी गायक पंडित जसराज को नहीं जानते हैं। और हमारे एक लाइट लगी, बिजली-सी कौंधी दिमाग़ में और मैंने कहा-जाकर बताओ कि अनुज आया है। बस, वह अपना टेढ़ा-सा लकवे वाला मुँह लेकर आ गयीं, ऐसे ही, बोलीं-देख लो, ऐसी हूँ। मैं किसी जसराज-वसराज को नहीं जानती। कोई गायक हो या मुम्बई से आये हो, मुझे नहीं पता। मेरा अनुज आया है तो लो, मैं आ गयी हूँ। मेरी उनके साथ यह अन्तिम भेंट थी।’

‘सन् 1987 में मैं अमेरिका में था। मैं दिन भर सब जगह ‘क्या पूजा क्या अर्चन रे’ गुनगुनाता रहा था। गाते-गाते मेरा मन कुछ अन्यमनस्क हो रहा था। मैंने दुर्गा से कहा- किसी को इलाहाबाद फ़ोन करके देखो। मुझे महादेवी जी की बहुत याद आ रही है, कुछ अच्छा नहीं लग रहा। अमेरिका की रात में फ़ोन लगा। पता चला कि कुछ समय पहले ही महादेवी जी का स्वर्गवास हो गया है।’ बात करते-करते जसराज जी का असमी लाल अंगोछा, जिसे वह हमेशा अपने पास रखते हैं, उनके आँसुओं से भीग गया है। मेरी आँखों से भी धाराप्रवाह अश्रु प्रवाहित हो रहे हैं।

केशवचन्द्र वर्मा जी ने अपनी पुस्तक ‘संगीत को समझने की कला’ में एक स्थान पर लिखा है कि गायक तो बहुत सारे, बहुत अच्छे-अच्छे हैं; किन्तु जसराज जी की एक विशेष बात यह है कि वे अपनी बन्दिशों का चुनाव बहुत सुन्दर करते हैं तथा उन्हें गाते भी उतने ही सुन्दर ढंग से हैं, बिना साहित्य को तोड़े-मरोड़े। सम्भवतः साहित्यकारों के साथ उनका नैकट्य ही इसका कारण रहा हो।

‘अज्ञेय जी के साथ हमारा परिचय महादेवी जी ने करवाया था। उन्होंने प्रयाग संगीत समिति के एक कार्यक्रम में मुझे अपने और अज्ञेय जी के बीच में मंच पर बिठा दिया। साहित्य और संगीत का यह अद्भुत मिलन था। इसके बाद अज्ञेय जी से हमारी अच्छी भेंट-मुलाक़ातें होने लगीं। उनका अपना एक बंगला था जिसके परिसर में उन्होंने एक झोंपड़ी बनायी हुई थी। वहाँ हम कई बार जाते-आते थे, वो बहुत विद्वान् सज्जन थे। वहाँ हमारी विभिन्न विषयों पर चर्चा होती, खाना-वाना होता और हमें बहुत सुख की प्राप्ति होती थी।’

केशवचन्द्र वर्मा, कुँवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल, डॉ. धर्मवीर भारती आदि ऐसे अनेक शीर्षस्थ लेखकों और कवियों को पंडित जसराज के निकटस्थ बन्धु माना जा सकता है। बहुत बार जसराज जी लखनऊ जाते तो कुँवर नारायण के यहाँ ठहरते थे। ‘हम गाते थे और ये साहित्यकार अपनी साहित्य-चर्चा करते थे। कुँवर नारायण जी की ‘छायानट’ नामक एक पत्रिका निकलती थी। बहुत श्रेष्ठ पत्रिका थी। इसमें केशवचन्द्र वर्मा, ने हमारा एक बहुत बड़ा लम्बा-चौड़ा इण्टरव्यू लिया। दो-तीन दिन तक वो हमसे गप्पें मारते रहे। केशव जी की बेटी हमारे शिष्य गिरीश से ब्याही है। धर्मवीर भारती भी हमसे बहुत प्रेम करते थे। अब वैसा जमघट्टा नहीं रहा। साहित्यकार आपस में तो सब बहुत मिलते-जलते होंगे, लेकिन हमारे साथ वैसा सम्पर्क नहीं रहा।

‘केशव जी तथा अन्य सभी साहित्यकारों के साथ इस विचार-विमर्श तथा वार्तालाप का प्रभाव पंडित जसराज पर यह पड़ा कि वह वास्तव में रचनाओं का चुनाव करते समय बहुत सोच-विचार करते थे। केशव जी और उनकी पत्नी एक-दूसरे से बहुत अधिक प्रेम करते थे। लव-बहू थे। सबने बड़ी कुल्फियों साथ में खायी हैं। केशव जी की पत्नी का देहान्त हो गया। बच्चे-बेटी सब हिल गये भीतर से कि बापू का क्या होगा। कभी एक-दूसरे से अलग नहीं हुए थे, कभी एक-दूसरे से झगड़ते नहीं थे। जैसे दो चिड़ियाएँ प्रेम करती हैं, वैसे ही उनका प्रेम था। केशव जी पत्नी का क्रियाकर्म करके आये, ऊपर कमरे में गये और धाड़ से दरवाज़ा बन्द कर लिया। माँ का तो रोना था ही, बापू की तरफ़ चिन्ता और हो गयी कि न मालूम क्या कर बैठें। भीतर जाकर केशव जी ने जसराज की का गाया तुआ नट-नारायण का कैसेट ऑटो-रिवाइंड पर लगा लिया-जब से छवि देखी। चार-पाँच घण्टे बजता रहा, बजता रहा। फिर बाहर निकले, न उनके मन में कोई मलाल बचा था, और न आँखों में आँसू।’

कुँवर नारायण जी के साथ जुड़ी हुई भी अनेक यादें हैं। सन 1953 से 1958 तक मुकुन्द लाठ और जसराज जी भारती जी के घर के सामने ही बहुत रियाज़ किया करते थे। भारती जी ज्ञानवती जी से मिलने जाती थीं। तब उन्हें संगीत में अधिक रुचि नहीं थी लेकिन कुँवर नारायण जी की, जिनसे उनका विवाह हो गया, शास्त्रीय संगीत में बहुत रुचि थी। विवाह के पश्चात् कुँवर नारायण जी ने भारती जी से पूछा कि तुम तो ज्ञान जी के यहाँ आती-जाती हो, वहाँ तो पंडित जसराज भी रहते हैं? भारती बोलीं कि हाँ, उन्हें तो हम अच्छी तरह से जानते हैं। पूछा-उनका गाना कैसा लगता है? तो ये बोली कि कितना सुन्दर रियाज़ करते हैं! हमें तो उनका गाना बहुत अच्छा लगता है। क्या करती यदि पति ही संगीत के प्रेम हों। पंडित जसराज कहते हैं, ‘लेकिन धीरे-धीरे भारती सचमुच हमारे गाने को पसन्द करने लगी। मन की बहुत अच्छी हैं। हमारा बहुत आदर करती हैं। उनके घर में साहित्यकारों का जमावड़ा लगा रहता था और हम भी उसमें गाते थे। वे दिन हमारे जीवन के बहुत सुन्दर दिन थे।

वह पहली पंक्ति में बैठनेवाली महिला

पंडित जसराज जब भी दिल्ली में गाते हैं, ऑडिटोरियम की पहली पंक्ति में एक महिला लगभग हमेशा बैठी हुई दिखायी देती हैं। वे हैं दिल्ली की पूर्व मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित। शीला दीक्षित जब मुख्यमन्त्री थीं और संगीत समारोहों में आती थीं, तब ऐसा लगता था कि मुख्यमन्त्री के रूप में उन्हें बहुत सारी जगहों पर अपनी उपस्थिति का भान कराना पड़ता है, संगीत के कार्यक्रम उनकी उसी दायित्वपूर्ति का एक अंग हैं। लेकिन मुख्यमन्त्री न रहने के बाद जब उनकी उपस्थिति और अधिक नियमित हो गयी तो मुझे लगा कि, वास्तव में उन्हें संगीत में रुचि है। तब मैंने एक दिन स्वयं पंडित जसराज से उनके विषय में पूछा तो पता चला कि इन लोगों का परिचय बहुत पुराना है। तब शीला जी से बातचीत करना तो बनता ही था।

‘पंडित जसराज एक अच्छे कलाकार और अच्छे गायक तो हैं ही, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है। लेकिन मेरी जो उनके बारे में सोच है, वह ये कि वे बहुत नेक इन्सान हैं। जिस तरह उन्होंने अपने संगीत को ऐसे सुन्दर तरीक़े से उभारा है, बनाया है, उसमें हमें कभी ऐसा नहीं लगता कि इसमें कोई कमी रह गयी, या शायद ये ऐसा करते तो वैसा होता या वैसा करते तो और अच्छा होता। उनका गाना परफेक्ट है। श्रेष्ठता की ऊँचाइयों तक पहुँच चुका है। इसलिए उनको सुनना बहुत अच्छा लगता है। सुनकर सुकून, चैन मिलता है। उनको सुनकर प्रशंसा और प्रेम की भावना मन में उठती है’ शीला दीक्षित कहती हैं।

‘हरियाणा में जन्मे एक कलाकार ने अपनी जीवन—यात्रा प्रारम्भ की और हैदराबाद, सानन्द, कलकत्ता होता हुआ वह मुम्बई पहुँच गया जहाँ प्रतिस्पर्धा ही प्रतिस्पर्धा है। हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा, शास्त्रीय संगीत, बॉलीवुड संगीत, अभिनय, व्यवसाय से लेकर जीवन जीने और उसके स्तर को बनाये रखने में प्रतिस्पर्धा है। ऐसे में पंडित जसराज ने मुम्बई जैसे शहर में अपने आप को खोजा और उसे बनाया। मैं समझती हूँ कि कोई भी जब उनको सुनता है, तो किसी और ही दुनिया में उसे ले जाते हैं। ऐसा लगता है कि पता नहीं, कहाँ से कहाँ तक वे हमें ले गये हैं। पता नहीं हम कहाँ पहुँच गये हैं। एक बहुत ही अच्छी और सुन्दर भावना उठती है। बहुत ही सुन्दर अनुभव होता है। उनकी उम्र का, उनके गाने पर कोई असर दिखायी नहीं देता, बल्कि उनका गाना और अधिक समृद्ध हो गया है। उनका वह जज़्बा काबिले तारीफ़ है, और मेरे ख़याल में और कोई नहीं कर सकता है, शीला दीक्षित कहती हैं।
शीला दीक्षित पंडित जसराज को एक कलाकार के साथ-साथ, व्यक्ति के रूप में भी जानती हैं। पंडित जसराज के विनम्र स्वभाव की वह बहुत प्रशंसक हैं। ‘कलाकार के रूप में भी वे अपनी कला के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। किसी प्रकार का अहं भाव उनमें नहीं है, यह बहुत बड़ी बात है।‘ शीला जी कहती हैं।

शीला जी बहुत पुरानी घटना का वर्णन करती हैं— ‘सन् 1970 के अन्त में या 1980 के दशक के आरम्भ में हम लोगों ने आगरा में एक संगीत समारोह किया था। उसमें पंडित जसराज आये थे। गिरिजा देवी जी भी थीं। हमने इन्हें सुना था रात के डेढ़-दो बजे। उस समय रात-रात भर संगीत सुनने की परम्परा थी। आजकल तो लोग 9-10 बजे तक उठ जाते हैं। लेकिन इन लोगों ने उस परम्परा को, जो उसमें ढले थे, एक बहुत ही ख़ूबसूरत अनुभव बनाया था। इस समय डेढ़-दो घण्टे का समय दिया जाता है। मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी भी बड़े से बड़े कलाकार को गाने-बजाने के लिए कोई निश्चित समय सीमा दी जाती थी। लेकिन अब तो यह है कि आपको डेढ़ घण्टे गाना है या दो घण्टे गाना है, उसी में आपको अपने आपको सीमित करना पड़ता है। उस सीमा में भी यदि आप अपनी बात को रख सकें, उसे समेट सकें और सब लोग बिल्कुल सम्मोहित हो जाएँ, मैं समझती हूँ कि कला में इससे बड़ा और कोई गुण नहीं हो सकता। ये कितनी खुशी लाते हैं, लाखों लोगों की। पंडित जसराज स्वयं तो गाते हैं, लेकिन खुशी कितनों को आती है! रोना कितनों को आता है! जज़्बात कितनों के निकलते हैं! और यह केवल उनके संगीत के माध्यम से! हमारे जसराज जी, इन सब ची$जों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुझे इनको सुनते हुए 30-40 हो गये, लेकिन हमेशा उनके गाने से मुझे सुकून ही मिलता है। ये हमारे पूरे परिवार के प्रिय कलाकार हैं। हमारे मन में इनके प्रति प्रशंसा का एक भाव तो है ही, लेकिन उससे भी अधिक सम्मान और प्रेम का भाव है।‘

पंडित जसराज के गायन के उस समय की भी शीला दीक्षित साक्षी रही हैं जब वे केवल शुद्ध रागदारी करते थे। बाद में जब उनके गायन में भक्ति संगीत जुड़ गया, तो उस समय की भी साक्षी वे रही हैं। उनके गायन के शास्त्रीय पक्ष तथा आध्यात्मिक पक्ष, दोनों ही के साथ शीला जी का ख़ासा परिचय रहा है। ‘एक चरण से दूसरे चरण में जाना, यह कलाकार के विकास का एक अभिन्न अंग है। इस विकास यात्रा में सुनने वाले को भी उतना ही अधिक आनन्द आये जितना कि स्वयं कलाकार को आ रहा है, तो वह उस कलाकार की सफलता है। यह नहीं कह सकते कि उनकी कला का वह पक्ष ज़्यादा अच्छा था या यह पक्ष अधिक अच्छा है। जो विकास इनके गायन का हुआ है, वह अद्भुत है। यूँ देखा जाये तो कलाकार के साथ-साथ श्रोता का भी तो विकास होता है। हमारे जैसे लोग जो संगीत को सुनना पसन्द करते हैं और स्वयं गा-बजा नहीं सकते, उनके लिए यह ची$ज अद्भुत है। सुनने वाले को चैन मिले, उसे सुकून मिले, उसको ऐसी आवाज़ मिले कि जिसे वह कभी भूले ही नहीं, वे सारे गुण इनमें हैं। उनका गाना पहले भी सुकून देता था, आज भी सुकून देता है। और एक बात और कि जो वो वह 40-50 साल पहले गा रहे थे, वही यदि आज भी गा रहे होते तो वे पंडित जसराज न होते।‘ शीला जी का अनुभव सम्भवत: पंडित जसराज के सभी श्रोताओं तथा प्रशंसकों का अनुभव है। (वाणी प्रकाशन से साभार)

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