शशिकला ने क्‍यों लिया संन्यास, यह है वजह

नई दिल्ली । वीके. शशिकला तमिलनाडु की राजनीति में किसी पहेली से कम नहीं रहीं। पिछले 40 सालों से उनके होने के मतलब लगाए जाते रहे हैं। अब चुनाव से ठीक पहले शशिकला के फैसले ने सबको चौंका दिया है। उनके राजनीति से दूर होने पर तमिलनाडु में नए ध्रुव बनेंगे।

वीके. शशिकला ने जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे। उनका पिछले 40 साल का सफर तमिलनाडु की बनती-बिगड़ती राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। एक साधारण गृहिणी से सूबे की ताकतवर महिला बनने की यात्रा केवल शशिकला की कहानी नहीं है, बल्कि तमिलनाडु के एक विशेष कालखंड का राजनीतिक इतिहास भी है।

तमिलनाडु के पत्रकार मुरलीधरन काशीविश्वनाथन बताते हैं कि 1984 में शशिकला विनोद वीडियो विजन नाम से एक वीडियो पार्लर चलाया करती थीं। यह दुकान चेन्नई के अलवरपेट में थी। उनके पति नटराजन सरकार में जनसंपर्क अधिकारी थे और उस वक्त कड्डलुर जिले में तैनात थे और चंद्रलेखा जिले की कलक्टर थीं।

उस घटना का जिक्र करते हुए काशीविश्वनाथ लिखते हैं कि जिलाधिकारी के कहने पर ही विनोद वीडियो को वहां हो रही एक मीटिंग को रिकॉर्ड करने का अवसर मिला। उस मीटिंग को जयललिता संबोधित कर रही थीं। वहीं वीके शशिकला और जयललिता की पहली भेंट हुई। तब किसी को अंदाज नहीं था कि यह जोड़ी आने वाले समय में तमिलनाडु की राजनीति को दिशा देगी। उन दिनों शशिकला की उम्र 28 साल थी।

शशिकला 17 साल की थीं, जब एम. नटराजन से उनका विवाह हो गया। यह बात 16 अक्टूबर, 1973 की है। जयललिता से मुलाकात के बाद दोनों में निकटता आई। एमजी रामचंद्रन की मृत्यु के बाद निकटता बढ़ गई और एक दूसरे के प्रति विश्वास का भाव गहराया।

यह बताया जाता है कि पहली बार शशिकला का प्रभाव उस समय दिखा, जब दो हिस्सों में बंट चुकी अन्नाद्रमुक के एक गुट (जयललिता) ने जनरल बॉडी की बैठक बुलाई। उस बैठक में वही लोग पदाधिकारी चुने गए जो शशिकला की पसंद थे।

जब 1991 में जयललिता पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं, तो हर काम के लिए शशिकला पर निर्भर हो गईं। इससे शशिकला के परिवार का दबदबा सूबे की राजनीति में काफी बढ़ गया। स्थिति ऐसी बनी कि 1996 में जयललिता चुनाव हार गईं और उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इससे दोनों के बीच दूरी बढ़ी, लेकिन वह दूरी ज्यादा दिन नहीं रही। फिर जो रिश्ता बना वह 2011 तक चला।

एक समय ऐसा आया कि जयललिता ने शशिकला और उनके परिवार के सभी सदस्यों को पार्टी से बाहर कर दिया। यह घटना 19 दिसंबर, 2011 की है। मुरलीधरन काशीविश्वनाथन ने अपने एक रिपोर्ट में लिखा है कि घटना के तीन महीने बाद 28 मार्च, 2012 को शशिकला ने एक प्रेस रिलीज जारी की, जिसमें कहा गया कि उन्हें पार्टी में बने रहने या सांसद, विधाक बनने में कोई दिलचस्पी नहीं हैं। वह सिर्फ जयललिता की सच्ची बहन बनी रहना चाहती हैं। इस पत्र के तीन दिन बाद जयललिता ने शशिकला को फिर से पार्टी में शामिल कर लिया।

उस घटना के बाद शशिकला हमेशा जयललिता की सहयोगी बनकर रहीं। हालांकि, पार्टी में उनके प्रभाव को लोग महसूस करते थे।

दिसंबर 2016 में जयललिता के निधन के कुछ दिनों बाद एक तमिल अखबार में विज्ञापन छपा। उसमें लिखा था- “अगर पुरुचि थलाइवी अम्मा को मालूम होता कि जिंदगी और मौत की लड़ाई में मौत जीत जाएगी तो वह इस दुनिया से विदा होने से पहले चिनम्मा को गद्दी पर बिठा जातीं।” विज्ञापन में आगे लिखा था- ‘एक विश्वासी पार्टी कार्यकर्ता के अंतर्मन की आवाज।’

इसके बाद तेजी से घटनाक्रम बदला। ओ. पन्नीरसेल्वम ने कहा कि शशिकला पार्टी की जनरल सेक्रेट्री होंगी। 29 जनवरी, 2017 को पार्टी की जनरल बॉडी मीटिंग हुई, जिसमें शशिकला अन्नाद्रमुक की सेक्रेट्री जनरल चुनी गईं। फिर पन्नीरसेल्वम ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

इसके तत्काल बाद शशिकला ने राज्यपाल के पास पार्टी में बहुमत होने का दावा किया। लेकिन, राज्यपाल ने तुरंत कोई फैसला नहीं किया। इसी बीच कोर्ट ने आय से अधिक संपत्ति इकट्ठा करने के आरोप में शशिकला के खिलाफ निर्णय सुनाया। इस तरह शशिकला मुख्यमंत्री की कुर्सी के सबसे नजदीक होते हुए भी दूर रह गईं।

27 जनवरी, 2021 को जेल से रिहा होने के बाद शशिकला ने राजनीति से निश्चित दूरी बना ली थी। अब उनका चौंकाने वाला फैसला सामने आया है, उन्होंने राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी है।

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